गंगा अध्याय 9 चौपाई 17–24 और दोहा 3

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — (राम ने कहा —) हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा।

पदअर्थ
नाथस्वामी — आदरसूचक संबोधन
संभुधनुशंभु (शिव) का धनुष
भंजनिहाराभंग करने वाला, तोड़ने वाला
होइहिहोगा
केउ एककोई एक
दास तुम्हाराआपका सेवक
भाव: यह पूरे पाठ की सबसे संयत पंक्ति है, और अभ्यास का चौथा बहुविकल्पी प्रश्न इसी पर है। इस एक वाक्य में तीन काम एक साथ हो रहे हैं। पहला — राम सच बोल रहे हैं (हाँ, धनुष टूटा है)। दूसरा — वे अपना नाम नहीं लेते; कहते हैं ‘कोई एक’। तीसरा — जो कहते हैं, उसमें भी स्वयं को ऊपर नहीं, परशुराम का ‘दास’ बताते हैं। यानी वे झूठ भी नहीं बोलते और टकराव भी नहीं बढ़ाते। ध्यान दीजिए, यही बात यदि लक्ष्मण के ढंग से कही जाती — ‘धनुष मैंने तोड़ा, क्या कर लोगे?’ — तो सभा में युद्ध छिड़ जाता। यही अंतर विनम्रता और मर्यादा का है। और विनम्रता यहाँ कमज़ोरी नहीं है: सच कहने का साहस पूरा है, केवल कहने का ढंग शालीन है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
कथन-शैलीबिना वक्ता का नाम बताए कथन — पिछले दोहे में ‘बोले श्रीरघुबीरु’ कहकर कवि चुप हो गया था; यहाँ सीधे राम की वाणी आ जाती है। पुस्तक ने इसे कविता की एक विशेषता माना है।
अलंकारअनुप्रास — “संभुधनु भंजनिहारा” में ‘अनुस्वार + भ’ की आवृत्ति; “होइहि … तुम्हारा” में ‘ह’ की।
शब्द-चयननाथ’ और ‘दास’ — पहला शब्द सामने वाले को ऊपर उठाता है, दूसरा स्वयं को नीचे रखता है। एक ही चौपाई में दोनों काम।
अनिश्चय का प्रयोगकेउ एक’ (कोई एक) और ‘होइहि’ (होगा) — दोनों में अनिश्चय है। राम जान-बूझकर वाक्य को खुला छोड़ देते हैं, ताकि आरोप किसी एक पर न टिके।
तुकभंजनिहारा – तुम्हारा।
गद्य-रूप से जोड़पुस्तक ने ‘गद्य-रूप’ के उदाहरण में इसी चौपाई का गद्य-रूपांतर स्वयं दिया है (पृष्ठ 162)।
प्र2.
“आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — (राम ने आगे कहा —) आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? यह सुनकर क्रोधी मुनि परशुराम क्रोध में भरकर बोले।

पदअर्थ
आयसुआज्ञा, आदेश
काहक्या
कहिअ किनक्यों नहीं कहते
मोहीमुझसे
रिसाइक्रोध करके
कोहीक्रोधी
भाव: यहाँ राम एक कदम और आगे जाते हैं। पहले उन्होंने आरोप को टाला, अब वे स्वयं को प्रस्तुत कर देते हैं — ‘आज्ञा मुझसे क्यों नहीं कहते’। यानी वे झगड़े से भाग नहीं रहे; वे केवल झगड़े को आज्ञा-पालन में बदल रहे हैं। यह विनम्रता का सबसे कठिन रूप है — जो सामने वाले के क्रोध को अपने ऊपर ले लेता है, पर उसे भड़कने का कोई कारण नहीं देता। दूसरे चरण में तुलसी एक ही शब्द में परशुराम का चित्र खींच देते हैं — ‘मुनि कोही’। मुनि और क्रोधी — दोनों बातें एक ही व्यक्ति में। परशुराम का सारा द्वंद्व इसी दो-शब्दों की जोड़ी में है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “काहिअ किन” में ‘क’ की तीन आवृत्तियाँ; “मोही … मुनि” में ‘म’ की।
विरोधाभासमुनि कोही’ — मुनि का स्वभाव शांति है, फिर भी वे क्रोधी हैं। यह विरोधाभास पूरे पाठ के तनाव का स्रोत है।
प्रश्न-शैली‘कहिअ किन मोही’ — प्रश्न है, पर उत्तर की माँग नहीं; यह निवेदन है। परशुराम का प्रश्न (‘कहहु काह अति भीर’) चुनौती था, राम का प्रश्न प्रार्थना है। दोनों की तुलना कीजिए — चरित्र-भेद स्पष्ट हो जाएगा।
वक्ता-परिवर्तनएक ही चौपाई में वक्ता बदल जाता है — पहला चरण राम का, दूसरा कवि का। कवि बीच में आकर बता देता है कि अब कौन बोलेगा।
तुकमोही – कोही।
अवधी की विशेषता‘मोही’ (मुझसे), ‘कहिअ’ (कहिए/कहते हैं), ‘काह’ (क्या), ‘किन’ (क्यों नहीं) — शुद्ध अवधी रूप, जिनका खड़ी बोली में कोई सीधा जोड़ नहीं मिलता।
प्र3.
“सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — (परशुराम ने कहा —) सेवक वही होता है जो सेवा का काम करे। शत्रु जैसी करतूत करके तो लड़ाई ही की जाती है — अर्थात् जिसने यह किया है वह मेरा दास नहीं, शत्रु है, और उससे युद्ध ही होगा।

पदअर्थ
सेवकुसेवक, दास
सेवकाईसेवा का काम
अरिशत्रु
करनीकरतूत, कर्म
करिअकी जाती है
लराईलड़ाई
भाव: परशुराम राम के ही शब्द (‘दास तुम्हारा’) को पकड़कर उलट देते हैं। राम ने कहा था — तोड़ने वाला आपका दास होगा। परशुराम कहते हैं — दास वह होता है जो सेवा करे; जो शत्रु जैसा काम करे, वह दास नहीं। यह तर्क है, केवल क्रोध नहीं — और यही इस चौपाई को महत्वपूर्ण बनाता है। परशुराम मूर्ख नहीं हैं; वे बात को काटना जानते हैं। यहीं से संवाद तर्क-प्रतितर्क का रूप ले लेता है, जो आगे लक्ष्मण के आने पर व्यंग्य में बदल जाएगा। पहला चरण एक सूक्ति जैसा है, जिसे संदर्भ से अलग करके भी उद्धृत किया जा सकता है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास अलंकार — “अरि करनी करि करिअ लराई” में ‘कर’ ध्वनि तीन बार आई है। यह पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 161)। साथ ही पहले चरण में ‘सेवकु … सेवकाई’ की आवृत्ति भी अनुप्रास ही है।
सूक्ति-शैली“सेवकु सो जो करै सेवकाई” — यह परिभाषा के ढंग का वाक्य है, इसीलिए कहावत की तरह याद रह जाता है।
तर्क-संरचनापहला चरण विधान (सेवक क्या है), दूसरा चरण निषेध का परिणाम (जो सेवक नहीं, उसके साथ क्या होगा)। दो चरणों में पूरा तर्क पूरा हो जाता है।
रसरौद्र — पर यहाँ क्रोध शांत, नुकीले तर्क का रूप ले चुका है। यह ‘ठंडा क्रोध’ पहले वाले गरम क्रोध से अधिक ख़तरनाक लगता है।
तुकसेवकाई – लराई।
गतिविधि से जोड़‘गतिविधियाँ’ की तालिका में “सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे।” कथन इसी चौपाई से लिया गया है और वह परशुराम का है।
प्र4.
“सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — हे राम! सुनो — जिसने शिव का धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।

पदअर्थ
सुनहुसुनो
जेहिंजिसने
सिवधनुशिव का धनुष
तोरातोड़ा
सहसबाहुसहस्रबाहु — पौराणिक कथा का वह राजा जिसका वध परशुराम ने किया था
समके समान
रिपु मोरामेरा शत्रु
भाव: यह चौपाई कविता में पौराणिक संदर्भ का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। परशुराम केवल यह नहीं कह रहे कि ‘वह मेरा शत्रु है’; वे उसे सहस्रबाहु के बराबर रख रहे हैं — और यह तुलना धमकी को कई गुना बड़ा कर देती है, क्योंकि सुनने वाले जानते हैं कि सहस्रबाहु का क्या हुआ था। यानी वाक्य में सज़ा का नाम लिए बिना सज़ा सुना दी गई है। यह भी ध्यान दीजिए कि परशुराम अब सीधे राम को संबोधित कर रहे हैं — जनक को नहीं। संवाद का केंद्र बदल चुका है, और इसी बदलाव से आगे लक्ष्मण के बीच में कूदने की भूमिका बनती है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1उपमा अलंकार — ‘सम’ उपमावाचक शब्द है। उपमेय — धनुष तोड़ने वाला; उपमान — सहस्रबाहु; साधारण धर्म — परशुराम का शत्रु होना।
अलंकार 2अनुप्रास — “िवधनु … हसबाहु सो” में ‘स’ की चार आवृत्तियाँ।
पौराणिक संदर्भसहस्रबाहु (कार्तवीर्य अर्जुन) की कथा परशुराम-प्रसंग की सबसे प्रसिद्ध कथा है। इस एक नाम से पूरी कथा पाठक के मन में खुल जाती है — इसे संदर्भ-संकेत कहते हैं। पुस्तक ने ‘कविता का सौंदर्य’ में ‘पौराणिक संदर्भ’ को संवादों की एक विशेषता बताया है; यह उसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
शब्द-संपदा की टिप्पणीपुस्तक की शब्द-संपदा में ‘सहसबाहु’ के कोश-अर्थ दिए गए हैं — “सहस्रबाहु, बाणासुर, शिव, स्कंद का एक अनुचर”। यहाँ प्रसंग के अनुसार अर्थ सहस्रबाहु ही लेना उचित है।
तुकतोरा – मोरा।
अवधी की विशेषता‘मोरा’ (मेरा), ‘जेहिं’ (जिसने), ‘सुनहु’ (सुनो) — अवधी के विशिष्ट रूप।
प्र5.
“सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — वह (धनुष तोड़ने वाला) इस सभा को छोड़कर अलग हो जाए, नहीं तो यहाँ उपस्थित सब राजा मारे जाएँगे।

पदअर्थ
सोवह
बिलगाउअलग हो जाए
बिहाइछोड़कर
समाजासभा, समूह
न तनहीं तो
मारे जैहहिंमारे जाएँगे
भाव: यह पाठ की सबसे भारी चेतावनी है और अभ्यास इसी पर पूरा प्रश्न पूछता है। ध्यान दीजिए, धमकी की बनावट कितनी चतुर है — दंड अपराधी को नहीं, पूरे समाज को दिया जा रहा है। इससे दो काम एक साथ होते हैं। पहला — अपराधी पर सामाजिक दबाव पड़ता है; अब सब उसे खोजेंगे, क्योंकि सबकी जान खतरे में है। दूसरा — सभा में बैठा हर व्यक्ति एक साथ भयभीत हो जाता है, इसलिए कोई विरोध में नहीं बोलेगा। परशुराम केवल क्रोधी नहीं, रणनीति जानने वाले भी हैं। पर इसका एक नैतिक पक्ष भी है — निर्दोष को दोषी के साथ दंड देना अन्याय है, और शायद यही बात लक्ष्मण को चुप नहीं रहने देती। अगली ही चौपाई में वे बोल पड़ते हैं।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “बिलगाउ बिहाइ” में ‘बि’ की सीधी आवृत्ति; “माजा … ब” में ‘स’ की।
वाक्य-रचनाशर्तवाची वाक्य — ‘न त’ (नहीं तो) से जुड़ा हुआ। ऐसे वाक्य में सारा भार दूसरे चरण पर पड़ता है, और यहाँ दूसरा चरण मृत्यु की घोषणा है।
रसरौद्र प्रधान, भयानक गौण — क्रोध बोलने वाले का, भय सुनने वालों का।
नाटकीय प्रभावयह चौपाई मंच पर सबसे ऊँचे स्वर की चौपाई है। इसके ठीक बाद लक्ष्मण की ‘मुसकान’ आती है — सबसे धीमा भाव। तुलसी ऊँचे स्वर के तुरंत बाद सबसे मुलायम भाव रखकर विस्फोट की तैयारी करते हैं।
तुकसमाजा – राजा।
अवधी की विशेषता‘जैहहिं’ (जाएँगे) — अवधी का बहुवचन भविष्यत् रूप; ‘बिलगाउ’, ‘बिहाइ’ — ‘व’ के स्थान पर ‘ब’।
प्र6.
“सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — मुनि परशुराम के ये वचन सुनकर लक्ष्मण मुसकराए और परशुराम का अपमान करते हुए (व्यंग्य-भरे वचन) बोले।

पदअर्थ
सुनि मुनि बचनमुनि के वचन सुनकर
लखनलक्ष्मण
मुसुकानेमुसकराए
परसुधरहिपरशुराम को (फरसा धारण करने वाले को)
अपमानेअपमानित करते हुए
भाव: यह पूरे पाठ का निर्णायक मोड़ है और अभ्यास का पाँचवाँ बहुविकल्पी प्रश्न इसी पर है। सारा भार एक शब्द पर है — ‘मुसुकाने’। सभा में सब काँप रहे हैं, राजा चुप हैं, जनक निरुत्तर हैं — और लक्ष्मण मुसकरा रहे हैं। मुसकान यहाँ प्रसन्नता नहीं है; यह अस्वीकार है। इसका अर्थ है — मैं तुम्हारी धमकी को धमकी मानता ही नहीं। यही कारण है कि तुलसी अगले ही चरण में साफ़ लिख देते हैं — ‘अपमाने’। यानी कवि यह छिपाता नहीं कि लक्ष्मण अपमान कर रहे हैं। यहाँ से कविता में व्यंग्य (वक्रोक्ति) प्रवेश करता है, जो रौद्र के सामने खड़ा होकर नाटकीयता को चरम पर पहुँचा देता है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “सुनि मुनि … मुसुकाने” में ‘नि’ और ‘मु’ की आवृत्ति। ‘सुनि–मुनि’ की तुक-सी जोड़ी पंक्ति को गति देती है।
रस-परिवर्तनयहाँ रौद्र के भीतर हास्य-व्यंग्य प्रवेश करता है। दो विरोधी रस आमने-सामने आ जाते हैं — इसी टकराव से कविता का नाटकीय तनाव बनता है।
चरित्र-चित्रणएक ही क्रिया — मुसकराना — से लक्ष्मण का पूरा चरित्र खुल जाता है: निर्भीक, आत्मविश्वासी, उग्र और वाक्-पटु
नामकरण की व्यंग्य-शक्तिकवि ने यहाँ परशुराम को ‘परसुधर’ कहा है — यानी ‘फरसा धारण करने वाला’। ठीक उस क्षण, जब उन्हें मुनि नहीं, शस्त्रधारी के रूप में देखा जा रहा है। पुस्तक ने ‘व्याकरण की बात’ में इसी नाम-वैविध्य की ओर ध्यान खींचा है।
तुकमुसुकाने – अपमाने।
प्र7.
“बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — (लक्ष्मण ने कहा —) हमने बचपन में बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं, पर हे गोसाईं! आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया।

पदअर्थ
बहु धनुहींबहुत-सी छोटी धनुहियाँ (खिलौना धनुष)
तोरींतोड़ीं
लरिकाईंलड़कपन में, बचपन में
कबहुँ नकभी नहीं
असि रिसऐसा क्रोध
कीन्हिकिया
गोसाईंस्वामी, महाराज (यहाँ व्यंग्य में आदर-संबोधन)
भाव: यह पाठ का सबसे प्रसिद्ध व्यंग्य है। लक्ष्मण एक चाल चलते हैं — वे शिव-धनुष का नाम ही नहीं लेते; उसे ‘धनुही’ यानी बच्चों के खिलौना-धनुष की श्रेणी में रख देते हैं। इससे दो चोटें एक साथ लगती हैं। पहली — शिव-धनुष की महिमा घट जाती है, इसलिए उसे तोड़ना कोई अपराध नहीं रह जाता। दूसरी — परशुराम का क्रोध बेतुका साबित हो जाता है, क्योंकि खिलौना टूटने पर कोई इतना क्रोध नहीं करता। और सबसे नुकीली बात है ‘गोसाईं’ — शब्द पूरा आदर का है, पर स्वर पूरा उपहास का। जिस बात को सीधे कहा जाए तो झगड़ा हो, उसे आदर की चादर में लपेटकर कहना — यही व्यंग्य की सबसे बड़ी कला है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1वक्रोक्ति (व्यंग्य) — कथन का ऊपरी अर्थ कुछ और है, आशय कुछ और। ‘गोसाईं’ का आदर-सूचक प्रयोग इसका सबसे साफ़ प्रमाण है।
अलंकार 2अनुप्रास — “बहुँ न … कीन्हि” में ‘क’ की, और “हु … नुहीं … तोरीं” में वर्ण-संगति।
अलंकार 3श्लेष जैसी स्थिति — ‘धनुही’ शब्द में दोनों अर्थ एक साथ चलते हैं: बच्चों का धनुष, और (व्यंग्य में) शिव का धनुष।
रसहास्य और वीर का मेल। लक्ष्मण हँसते भी हैं और चुनौती भी देते हैं।
शब्द-रचना‘धनुष’ से ‘धनुही’ — यह अल्पार्थक (छोटा बताने वाला) रूप है, जैसे ‘टोकरी’ से ‘टोकनी’। एक ही प्रत्यय से किसी वस्तु का महत्व घटा देना भाषा का बड़ा कौशल है।
तुकलरिकाईं – गोसाईं।
गतिविधि से जोड़‘गतिविधियाँ’ की तालिका का कथन “बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं।” इसी चौपाई से है और वह लक्ष्मण का है।
प्र8.
“एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — (लक्ष्मण ने आगे कहा —) इस धनुष पर इतनी ममता किस कारण है? यह सुनकर भृगुकुल के ध्वज (परशुराम) क्रोधित होकर बोले।

पदअर्थ
एहि धनु परइस धनुष पर
ममतामोह, लगाव
केहि हेतूकिस कारण
रिसाइक्रोध करके
भृगुकुलकेतूभृगुकुल का ध्वज/दीपक — परशुराम
भाव: लक्ष्मण दूसरी चोट करते हैं, और यह पहली से भी गहरी है। पहले उन्होंने धनुष को छोटा बताया था; अब वे परशुराम की भावना पर ही प्रश्न उठा देते हैं — ‘ममता किस कारण?’ ‘ममता’ शब्द जान-बूझकर चुना गया है, क्योंकि यह शब्द प्रायः माँ-बच्चे के लगाव के लिए आता है। एक निर्जीव धनुष के प्रति ऐसे लगाव की ओर संकेत करके लक्ष्मण मुनि के क्रोध को बचकाना ठहरा देते हैं। साथ ही एक और बात है — मुनि होकर किसी वस्तु से मोह रखना, यह तो वैराग्य के विरुद्ध है। इसलिए यह व्यंग्य केवल चिढ़ाने वाला नहीं, तर्क-भरा भी है। दूसरे चरण में कवि ‘भृगुकुलकेतू’ जैसा भव्य नाम रखकर विरोध और बढ़ा देता है — इतने बड़े व्यक्तित्व का इतनी छोटी बात पर क्रोध।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1रूपक — ‘भृगुकुलकेतू’ में परशुराम पर ‘केतु’ (ध्वज/दीपक) का आरोप है। पुस्तक की परिभाषा — “रूप का आरोपण करना”। यह पुस्तक के अपने उदाहरण ‘पद सरोज’ के अतिरिक्त रूपक का दूसरा अच्छा उदाहरण है।
अलंकार 2वक्रोक्ति (व्यंग्य) — प्रश्न पूछने के ढंग में उपहास छिपा है; उत्तर की अपेक्षा नहीं है।
अलंकार 3अनुप्रास — “केहि हेतू … केतू” में ‘के/हे’ ध्वनियों की आवृत्ति।
शब्द-चयनममता’ — एक कोमल, घरेलू शब्द को कठोर संदर्भ में रखकर व्यंग्य पैदा किया गया है।
तुकहेतू – केतू। यह तुक इतनी चुस्त है कि व्यंग्य और प्रत्युत्तर एक ही साँस में बँध जाते हैं।
गतिविधि से जोड़‘गतिविधियाँ’ की तालिका का कथन “इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों!” इसी चौपाई का है और वह लक्ष्मण का है।
प्र9.
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥” — इस दोहे का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — अरे राजा के बालक! तू काल के वश में होकर बोल रहा है, तुझे अपनी सुध ही नहीं है। क्या त्रिपुरारि (शिव) का धनुष धनुही के समान है? उसकी महिमा तो सारा संसार जानता है।

पदअर्थ
रेअरे — तिरस्कारपूर्ण संबोधन
नृप बालकराजा का बालक, राजकुमार
काल बसकाल (मृत्यु) के वश में होकर
तोहि न सँभारतुझे अपनी सुध-बुध नहीं है
धनुही समधनुही के समान
तिपुरारि धनुत्रिपुरारि (शिव) का धनुष
बिदित सकल संसारसारा संसार जानता है
भाव: परशुराम अब सीधे लक्ष्मण पर उतर आते हैं। ‘रे’ और ‘तोहि’ — दोनों अपमानसूचक संबोधन हैं; एक राजकुमार के लिए भरी सभा में इनका प्रयोग सबसे कड़ी बात है। ‘काल बस बोलत’ में तो सीधी मृत्यु-सूचना है — जो व्यक्ति मरने वाला होता है, वही ऐसी बात कहता है। और दूसरी पंक्ति लक्ष्मण की ही बात लौटाकर मारती है: तुमने शिव-धनुष को ‘धनुही’ कहा? उसका महत्व तो सारा संसार जानता है। यानी परशुराम व्यंग्य का उत्तर व्यंग्य से देते हैं। पाठ यहीं समाप्त हो जाता है, पर तनाव समाप्त नहीं होता — पुस्तक ने पाठ के नीचे स्वयं लिख दिया है कि आगे यह व्यंग्योक्तिपूर्ण संवाद और बढ़ता है, और अंततः राम की विनय तथा विश्वामित्र के समझाने पर परशुराम का आक्रोश शांत होता है।
शिल्प का पक्षदोहे में कैसे काम कर रहा है
छंददोहा — 13 + 11 मात्राओं का अर्धसम मात्रिक छंद, चरणांत गुरु-लघु। पहला चरण गिनिए — रे(2)+नृ(1)+प(1)+बा(2)+ल(1)+क(1)+का(2)+ल(1)+ब(1)+स(1) = 13
अलंकार 1उपमा — ‘सम’ वाचक शब्द के साथ ‘धनुही’ उपमान और ‘तिपुरारि धनु’ उपमेय। पर यह उपमा व्यंग्य में प्रयुक्त है — परशुराम इसे स्वीकार नहीं कर रहे, वे लक्ष्मण की कही उपमा को दोहराकर उसका उपहास कर रहे हैं।
अलंकार 2अनुप्रास — “बालक … बोलत” में ‘ब’ की तीन आवृत्तियाँ; “म … कल संसार” में ‘स’ की तीन।
अलंकार 3अतिशयोक्ति — ‘बिदित सकल संसार’ में ‘सारा संसार’ कहकर बात बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है।
रसरौद्र रस — और साथ में वीर रस की छाया, क्योंकि दोनों पक्ष अब आमने-सामने हैं।
संबोधन की शक्तिपूरे पाठ में अपमान की सीढ़ी देखिए — ‘जड़’ (जनक के लिए) → ‘मूढ़’ (जनक के लिए) → ‘रे नृप बालक’ (लक्ष्मण के लिए)। क्रोध हर बार एक पायदान ऊपर चढ़ता है।
तुकसँभार – संसार।
अर्थ का एक और पाठ: कुछ टीकाकार दूसरी पंक्ति को व्यंग्य-प्रश्न न मानकर सीधा कथन मानते हैं — “क्या तुझे शिव का धनुष धनुही जैसा लगता है, जबकि उसकी महिमा सारा संसार जानता है?” दोनों पाठों में आशय एक ही रहता है — लक्ष्मण की तुलना का खंडन। परीक्षा में आप इनमें से कोई भी अर्थ लिख सकते हैं, बस आशय स्पष्ट कर दीजिए।
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