गंगा अध्याय 9 चौपाई 9–16 और दोहा 2

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — राजा जनक ने परशुराम को वह सारा समाचार कह सुनाया, जिस कारण से ये सब राजा यहाँ आए हुए थे — अर्थात् सीता-स्वयंवर और शिव-धनुष की प्रतिज्ञा की बात।

पदअर्थ
समाचार कहि सुनाएसारा वृत्तांत कह सुनाया
जेहि कारनजिस कारण से
महीपराजा, भूपति
भाव: जनक की यह प्रतिक्रिया उनकी शिष्टता की दूसरी कड़ी है। परशुराम ने ताना-सा प्रश्न पूछा था (‘कहहु काह अति भीर’), पर जनक ताने का उत्तर ताने से नहीं देते; वे सीधा, पूरा और सच्चा उत्तर देते हैं। यहाँ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि जनक ने कुछ छिपाया नहीं — इसीलिए आगे परशुराम के क्रोध का कारण ‘जनक द्वारा समाचार छिपाना’ नहीं हो सकता। तुलसी ने बहुत कम शब्दों में यह जता दिया कि गलती जनक की ओर से नहीं हुई; जो होना है वह केवल इसलिए होगा कि सामने वाला क्रोध में है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
कथन-शैलीअप्रत्यक्ष कथन — जनक ने क्या कहा, यह ज्यों-का-त्यों नहीं दिया गया, केवल सार दिया गया है। जो बात पाठक पहले से जानता है, उसे दोहराने से कवि बचता है — यह कथा-कौशल है।
अलंकारअनुप्रास — “माचार … सुनाए … ब” में ‘स’ की आवृत्ति; “हि … कारन” में ‘क’ की।
तुकसुनाए – आए।
अवधी की विशेषता‘जेहि’ (जिस), ‘महीप’ (राजा) — अवधी में सर्वनाम ‘जेहि/तेहि/केहि’ के रूप में चलते हैं। आगे ‘केहि हेतू’ में भी यही रूप मिलेगा।
संरचनायह चौपाई सूचना-सेतु है — इसके बाद ही परशुराम की दृष्टि टूटे धनुष पर पड़ेगी और कविता का सबसे तीव्र भाग शुरू होगा।
प्र2.
“सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — जनक की बात सुनते ही परशुराम ने मुड़कर दूसरी ओर देखा और धरती पर पड़े हुए धनुष के टुकड़े देखे।

पदअर्थ
सुनत बचनवचन सुनते ही
फिरिमुड़कर
अनतअन्यत्र, दूसरी ओर
निहारेदेखा
चापखंडधनुष के टुकड़े
महि डारेधरती पर पड़े हुए
भाव: यह पूरे पाठ की सबसे बड़ी घड़ी-भर की चुप्पी है। परशुराम कुछ बोलते नहीं — बस मुड़ते हैं और देखते हैं। और जो देखते हैं, वह उनके आराध्य शिव का धनुष है, टुकड़े-टुकड़े होकर धरती पर पड़ा हुआ। कवि ने ‘महि डारे’ शब्द जान-बूझकर रखे हैं — टुकड़े केवल टूटे नहीं हैं, ज़मीन पर बिखरे पड़े हैं; यानी उन्हें उठाकर सम्मान से रखा भी नहीं गया। एक भक्त के लिए यह दृश्य असहनीय है। यही वह क्षण है जिसके बाद कविता का ताप एकदम चढ़ जाता है। यह भी ध्यान दीजिए कि सारी बात सुनने के बाद भी क्रोध शब्द से नहीं, दृश्य से फूटा — देखना बोलने से अधिक भारी पड़ा।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
बिंबदृश्य बिंब — धरती पर बिखरे धनुष के टुकड़े। पूरे पाठ में यही एक ठोस वस्तु है जिस पर सारा झगड़ा टिका है, और तुलसी उसे एक ही बार, ठीक सही जगह पर दिखाते हैं।
अलंकारअनुप्रास — “देखे … डारे” में ‘द/ड’ की और “निहारे … ” की आवृत्ति।
क्रिया-गतितीन क्रियाएँ लगातार — सुनत, फिरि, निहारे, देखे। इससे दृश्य कैमरे की तरह घूमता है: पहले जनक पर, फिर मुनि पर, फिर धरती पर।
नाटकीयतायह मोड़-बिंदु (turning point) है। ‘कविता का सौंदर्य’ में जिस नाटकीयता की बात है, उसका सबसे साफ़ उदाहरण यही चौपाई है।
तुकनिहारे – डारे।
प्र3.
“अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — अत्यंत क्रोध में भरकर परशुराम कठोर वचन बोले — “अरे मूर्ख जनक! बता, यह धनुष किसने तोड़ा?”

पदअर्थ
अति रिसअत्यंत क्रोध में
बचन कठोराकठोर वचन
कहुकहो, बताओ
जड़मूर्ख, जड़बुद्धि
कै तोराकिसने तोड़ा
भाव: यह पाठ की सबसे तीखी पंक्ति है और अभ्यास का तीसरा बहुविकल्पी प्रश्न इसी पर है। दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। पहली — क्रोध का मूल कारण ठीक पिछली चौपाई में मिल जाता है: “देखे चापखंड महि डारे”। यानी क्रोध का कारण अपमान या आदर-सत्कार नहीं, शिव-धनुष का खंडित होना है। दूसरी — परशुराम एक राजा को, वह भी भरी सभा में, ‘जड़’ कहकर संबोधित करते हैं। यह केवल क्रोध नहीं, मर्यादा का उल्लंघन भी है, और तुलसी इसे छिपाते नहीं। इसी से यह भी समझ आता है कि आगे लक्ष्मण का पलटकर बोलना अकारण उद्दंडता नहीं है — वातावरण पहले ही अपमान से भर चुका है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
रसरौद्र रस — स्थायी भाव ‘क्रोध’। आलंबन — धनुष तोड़ने वाला; उद्दीपन — धरती पर बिखरे चापखंड; अनुभाव — कठोर वचन, अपमानसूचक संबोधन।
अलंकारअनुप्रास — “हु ड़ नक” में ‘ज’ की दो और ‘क’ की दो आवृत्तियाँ; “ोले चन” में ‘ब’ की।
शब्द-शक्ति‘जड़’ केवल गाली नहीं है — इसका शब्दार्थ है ‘चेतनाहीन’। परशुराम कह रहे हैं कि जो अपने राज्य में शिव-धनुष टूटने दे, वह चेतनाहीन ही है। इसलिए यह तर्कयुक्त अपमान है।
वाक्य-रचनादूसरा चरण पूरी तरह आदेश और प्रश्न है। कोई विशेषण नहीं, कोई अलंकरण नहीं — केवल पाँच शब्द। क्रोध की भाषा ऐसी ही छोटी और नुकीली होती है।
तुककठोरा – तोरा।
भाषा संगम से जोड़यही पंक्ति पुस्तक के भाषा संगम बॉक्स (पृष्ठ 163) में ली गई है, जहाँ ‘धनुष’ शब्द के अनेक भारतीय भाषाओं के रूप दिए गए हैं।
प्र4.
“बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — “मूर्ख! शीघ्र दिखा (कि किसने तोड़ा), नहीं तो आज जहाँ तक तेरा राज्य फैला है, उस सारी पृथ्वी को मैं उलट-पुलट कर दूँगा।”

पदअर्थ
बेगिशीघ्र, जल्दी
देखाउदिखाओ
मूढ़मूर्ख
न तनहीं तो
आजूआज
उलटउँउलट दूँगा
महिपृथ्वी
जहँ लहिजहाँ तक
तव राजूतुम्हारा राज्य
भाव: क्रोध यहाँ धमकी में बदल जाता है, और धमकी भी नाप-तौल कर दी गई है — “जहाँ तक तेरा राज्य है, उतनी पृथ्वी उलट दूँगा।” यानी दंड केवल अपराधी को नहीं, पूरे राज्य को मिलेगा। यह सामूहिक दंड की धमकी है, और इसी से सभा में बैठे हर व्यक्ति की जान सूख जाती है — अगली दो चौपाइयों में उसी का चित्र है। ध्यान दीजिए, परशुराम अभी भी यह नहीं जानते कि धनुष किसने तोड़ा; वे केवल जानना चाहते हैं। लेकिन क्रोधी व्यक्ति जानने से पहले ही दंड घोषित कर देता है — यह मनुष्य-स्वभाव का सच्चा चित्र है। ‘बेगि’ (शीघ्र) शब्द भी बताता है कि उनके पास प्रतीक्षा का धैर्य बिलकुल नहीं बचा।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1अतिशयोक्ति — पृथ्वी को उलट देने की बात स्पष्ट रूप से बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है। पुस्तक की परिभाषा से यह अतिशयोक्ति अलंकार का सुंदर उदाहरण है (पुस्तक ने ‘अरध निमेष कलप सम बीता’ दिया है; यह उसका दूसरा उदाहरण है)।
अलंकार 2अनुप्रास — “ूढ़ … हि” में ‘म’ की, “जहँ हि” में ‘ह’ की आवृत्ति।
रसरौद्र रस की पराकाष्ठा। इसके आगे क्रोध केवल शब्दों में और बढ़ सकता है, कर्म में नहीं।
संबोधन‘जड़’ के बाद अब ‘मूढ़’ — अपमान की मात्रा बढ़ती जा रही है। दो चौपाइयों में दो बार राजा का अपमान।
तुक और लयआजू – राजू। ‘ऊ’ की लंबी, भारी ध्वनि धमकी को और गूँजदार बना देती है।
अवधी की विशेषता‘उलटउँ’ (उलट दूँगा) — अवधी का उत्तम पुरुष भविष्यत् रूप; ‘तव’ (तुम्हारा), ‘राजू’ (राज्य), ‘आजू’ (आज)।
प्र5.
“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — अत्यधिक भय के कारण राजा जनक कोई उत्तर नहीं दे पा रहे थे; और यह देखकर सभा में बैठे कुटिल राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे।

पदअर्थ
अति डरुअत्यधिक भय के कारण
उतरुउत्तर
नृपुराजा (जनक)
कुटिल भूपदुष्ट/छल-भरे राजा
हरषे मन माहींमन ही मन प्रसन्न हुए
भाव: तुलसी यहाँ एक ही पंक्ति में दो बिलकुल उलटी मनःस्थितियाँ रख देते हैं — एक ओर मौन में जमा हुआ भय, दूसरी ओर उसी भय पर छिपी हुई प्रसन्नता। दूसरा चरण मनुष्य-स्वभाव की एक कड़वी सच्चाई खोलता है: बहुत-से लोग दूसरे की मुसीबत में भीतर-भीतर खुश होते हैं। ये वही राजा हैं जो स्वयं धनुष नहीं उठा पाए थे और स्वयंवर में अपमानित होकर बैठे थे; इसलिए जनक का संकट उन्हें अपने अपमान का बदला-सा लगता है। यह ईर्ष्या है, और ईर्ष्या का सबसे साफ़ लक्षण यही है कि वह मुँह से नहीं, मन से बोलती है — इसीलिए कवि ने ‘मन माहीं’ लिखा। इस एक चरण से पूरे राज-समाज का नैतिक चेहरा उजागर हो जाता है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
विरोधी युग्मभय ↔ हर्ष — दो विपरीत भाव आमने-सामने रखकर विषम स्थिति (कंट्रास्ट) पैदा की गई है। यही इस चौपाई की सबसे बड़ी शक्ति है।
अलंकारअनुप्रास — “माहीं” में ‘म’ की और “कुटिल … भूप … रषे” में क्रमशः वर्ण-आवृत्ति।
चरित्र-चित्रण‘कुटिल’ विशेषण कवि का अपना निर्णय है। तुलसी तटस्थ नहीं रहते — वे बता देते हैं कि यह हर्ष निंदनीय है।
अभ्यास से जोड़यही पंक्ति ‘मेरी कल्पना मेरे अनुमान’ के प्रश्न 2 का आधार है और ‘भाव-पहचान’ तालिका में ईर्ष्या/कुटिलता का उदाहरण भी यही है। ‘गद्य-रूप’ में भी यही चौपाई दी गई है।
तुकनाहीं – माहीं।
अवधी की विशेषता‘डरु’, ‘उतरु’, ‘नृपु’ — तीनों में अंत्य ‘उ’; ‘माहीं’ (में) — अवधी का संबंध-सूचक रूप।
प्र6.
“सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — देवता, मुनि, नाग तथा नगर के सभी स्त्री-पुरुष — सब हृदय में भारी भय लिए चिंतित हो रहे थे।

पदअर्थ
सुरदेवता
नागनागलोक के प्राणी
नर नारीस्त्री-पुरुष
सोचहिंचिंता कर रहे थे
सकलसब
त्रास उर भारीहृदय में भारी भय
भाव: पिछली चौपाई में भय सभा तक सीमित था; यहाँ वह तीनों लोकों तक फैल जाता है। देवता, मुनि, नाग, और नगर के साधारण स्त्री-पुरुष — कोई बचा नहीं। कवि यह दिखाना चाहता है कि परशुराम का क्रोध किसी एक व्यक्ति का निजी मामला नहीं रह गया, वह एक सार्वभौमिक संकट बन गया है। ‘उर भारी’ शब्द-योजना बहुत सटीक है — भय की सबसे पहचानी हुई अनुभूति यही है कि छाती पर बोझ-सा लगे। और ‘सोचहिं’ में केवल डर नहीं, चिंता भी है — यानी लोग यह भी सोच रहे हैं कि अब आगे क्या होगा, कहीं इन सुंदर राजकुमारों पर आपत्ति न आ जाए।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास अलंकार का श्रेष्ठ उदाहरण — “सुर मुनि नागर नारी” में ‘न’ वर्ण चार बार आया है। पुस्तक की परिभाषा — “एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति”। पूरे पाठ में इससे स्पष्ट अनुप्रास दूसरा नहीं है।
रसभयानक रस — स्थायी भाव ‘भय’; आश्रय — देवता से लेकर साधारण नागरिक तक; अनुभाव — चिंता, हृदय का भारीपन।
समास और गणनापहला चरण पूरा का पूरा नामों की सूची है, बिना किसी क्रिया के। सूची जितनी लंबी होती जाती है, संकट का दायरा उतना बड़ा दिखता जाता है।
लोक-दृष्टितुलसी ‘नगर नर नारी’ को देवताओं और मुनियों के साथ एक ही पंक्ति में रखते हैं। यह उनकी लोकधर्मी दृष्टि है — संकट में सब बराबर हैं।
तुकनारी – भारी।
गद्य-रूप से जोड़पुस्तक ने ‘गद्य-रूप’ के अभ्यास में यही चौपाई पिछली चौपाई के साथ दी है (पृष्ठ 162)।
प्र7.
“मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — सीता की माता (सुनयना) मन-ही-मन पछता रही थीं कि विधाता ने अब बनी-बनाई बात बिगाड़ दी।

पदअर्थ
पछितातिपछता रही थीं
सीय महतारीसीता की माता — सुनयना
बिधिविधाता, ईश्वर
सँवरी बातबनी-बनाई बात
बिगारीबिगाड़ दी
भाव: यह पंक्ति एक माँ की चिंता की पंक्ति है, और पुस्तक ने ‘भाव-पहचान’ तालिका में इसे स्वयं ‘चिंता’ का उदाहरण बनाया है। सुनयना के लिए यह क्षण दोहरा है — कुछ देर पहले तक सब कुछ ठीक था: धनुष टूटा, वर मिल गया, पुत्री का विवाह तय हो गया। और अब वही ‘सँवरी बात’ बिगड़ती दिख रही है। ध्यान दीजिए, वे किसी व्यक्ति को दोष नहीं देतीं — न परशुराम को, न राम को, न पति को। वे विधाता को दोष देती हैं, क्योंकि साधारण मनुष्य की पहुँच से बाहर की विपत्ति के लिए हमारे लोक-मन में यही भाषा है। यह वात्सल्य-मिश्रित असहायता का बहुत सच्चा चित्र है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “बिधि … बाबिगारी” में ‘ब’ की तीन आवृत्तियाँ; ‘ँवरी … सीय’ में ‘स’ की।
लोकोक्ति का प्रयोगबनी-बनाई बात बिगड़ जाना’ आज भी घर-घर में बोला जाने वाला लोक-प्रयोग है। पुस्तक ने ‘व्याकरण की बात’ में कविता की एक विशेषता ‘मुहावरों का उपयोग करना’ बताई है — यह उसका सीधा उदाहरण है।
ध्वनि और भाव‘सँवरी’ और ‘बिगारी’ — दो विपरीत अर्थ वाले शब्द एक ही चरण में। बनने और बिगड़ने की दूरी इसी एक चरण में तय हो जाती है।
कथन-शैलीदूसरा चरण बिना वक्ता का नाम बताए सीधे सुनयना का कथन है — पुस्तक ने इसे भी कविता की एक विशेषता माना है।
तुकमहतारी – बिगारी। (पिछली चौपाई की ‘नारी – भारी’ के साथ मिलकर ‘आरी’ की ध्वनि लगातार चार बार आती है, जिससे शोक का स्वर गहरा हो जाता है।)
प्र8.
“भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — परशुराम के (क्रोधी) स्वभाव के बारे में सुनकर सीता को आधा क्षण भी एक कल्प के समान लंबा बीत रहा था।

पदअर्थ
भृगुपति कर सुभाउपरशुराम का स्वभाव
सुनिसुनकर
अरध निमेषआधा क्षण, आधा पलक झपकने जितना समय
कलपकल्प — ब्रह्मा का एक दिन, एक हज़ार महायुग (लगभग 4 अरब 32 करोड़ मानव-वर्ष)
सम बीताके समान बीता
भाव: यह पूरे पाठ की सबसे सुंदर मनोवैज्ञानिक पंक्ति है। सीता कुछ बोलती नहीं, कुछ करती नहीं — वे केवल सुनती हैं और प्रतीक्षा करती हैं। और उसी प्रतीक्षा में समय का माप ही बदल जाता है। तुलसी ने डर का वर्णन नहीं किया; उन्होंने डर का प्रभाव दिखा दिया। ध्यान दीजिए कि सीता की चिंता अपने लिए नहीं है — धनुष राम ने तोड़ा है, और परशुराम तोड़ने वाले को शत्रु घोषित करने वाले हैं। सीता मन-ही-मन राम का वरण कर चुकी हैं; इसलिए उनका भय प्रेम से उपजा भय है। यही कारण है कि पुस्तक ‘मेरी समझ मेरे विचार’ में इसी पंक्ति पर प्रश्न पूछती है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1अतिशयोक्ति अलंकार — यह पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 161): “बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना”। आधा पल और एक कल्प — दो छोरों को एक साथ रखकर बात को अत्यंत बढ़ा दिया गया है।
अलंकार 2उपमा — ‘सम’ उपमावाचक शब्द है। उपमेय — अरध निमेष; उपमान — कलप; साधारण धर्म — लंबा लगना।
बिंबसमय का बिंब — इसमें कुछ दिखाई नहीं देता, केवल महसूस होता है। हिंदी कविता में ऐसे ‘आंतरिक बिंब’ कम मिलते हैं, इसीलिए यह पंक्ति विशेष है।
संख्या का प्रयोगपुस्तक की शब्द-संपदा में ‘कलप’ का माप तक दिया गया है — 4 अरब 32 करोड़ मानव-वर्ष। इस संख्या को आधे पल के सामने रखिए, तो अतिशयोक्ति का पूरा असर समझ आ जाता है।
अनुप्राससुभाउ सुनि सीता” में ‘स’ की तीन आवृत्तियाँ; “लप … बीता” के साथ ‘क’ की।
तुकसीता – बीता।
प्र9.
“सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” — इस दोहे का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — श्रीराम ने सब लोगों को भयभीत देखा और जानकी (सीता) को भी डरी हुई जान लिया। तब वे बोले — किंतु उनके हृदय में न हर्ष था, न विषाद।

पदअर्थ
सभय बिलोकेभयभीत देखा
जानिजानकर
जानकीसीता (जनक की पुत्री)
भीरुभयभीत, डरी हुई
हृदयँहृदय में
हरषुहर्ष, प्रसन्नता
बिषादुविषाद, दुख
श्रीरघुबीरुरघुकुल के वीर — श्रीराम
भाव: यह दोहा राम के चरित्र की कुंजी है, और अभ्यास का एक पूरा प्रश्न इसी पर है। दो बातें साथ-साथ चल रही हैं। पहली — राम देख रहे हैं: सभा का भय भी और सीता का भय भी। यानी वे स्थिति से कटे हुए नहीं, पूरी तरह सचेत हैं। दूसरी — फिर भी उनके हृदय में न हर्ष है, न विषाद। यह उदासीनता नहीं, समभाव है। हर्ष होता तो वे अपने पराक्रम का श्रेय लेते; विषाद होता तो घबरा जाते। दोनों में से कुछ न होने के कारण ही वे अगली चौपाई में इतना संतुलित उत्तर दे पाते हैं। तुलसी यह भी बता देते हैं कि वे बोलने से पहले इस स्थिति में पहुँच चुके थे — यही धीरोदात्त नायक का लक्षण है।
शिल्प का पक्षदोहे में कैसे काम कर रहा है
छंददोहा — 13 + 11 मात्राएँ। गिनिए — स(1)भ(1)य(1) + बि(1)लो(2)के(2) + लो(2)ग(1) + स(1)ब(1) = 13; जा(2)नि(1) + जा(2)न(1)की(2) + भी(2)रु(1) = 11
अलंकार 1अनुप्रास — “जानि जानकी” में ‘जान’ ध्वनि की सीधी आवृत्ति, और “ृदयँ न रषु” में ‘ह’ की।
ध्वनि-साम्यजानि’ (जानना) और ‘जानकी’ (सीता) — ध्वनि एक-सी, अर्थ अलग। इससे पंक्ति में चमत्कार पैदा होता है और सीता का नाम कान में अटक जाता है।
विरोधी युग्म‘हरषु’ और ‘बिषादु’ — दोनों का एक साथ निषेध। दो छोर काटकर बीच का बिंदु दिखाया गया है, और वही बिंदु राम हैं।
रसयहाँ कोई उग्र रस नहीं है — शांत स्वर है, जो रौद्र और भयानक के ठीक बीच में रखा गया है। यही तुलसी की संयोजन-कुशलता है।
तुकभीरु – श्रीरघुबीरु। कवि ‘भीरु’ (डरा हुआ) के ठीक सामने ‘रघुबीरु’ (वीर) रख देते हैं — तुक ही अर्थ का विरोध बन जाती है।
जोड़ लीजिए: इस दोहे में राम ‘बोले’ तो सही, पर उन्होंने क्या कहा — यह अगली चौपाई में आता है। दोहे को इस तरह अधूरा छोड़कर अगली चौपाई से जोड़ना तुलसी की जानी-पहचानी युक्ति है; इससे पाठक बिना रुके आगे बढ़ता है।
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