सरल अर्थ — श्रीराम ने सब लोगों को भयभीत देखा और जानकी (सीता) को भी डरी हुई जान लिया। तब वे बोले — किंतु उनके हृदय में न हर्ष था, न विषाद।
भाव: यह दोहा राम के चरित्र की कुंजी है, और अभ्यास का एक पूरा प्रश्न इसी पर है। दो बातें साथ-साथ चल रही हैं। पहली — राम देख रहे हैं: सभा का भय भी और सीता का भय भी। यानी वे स्थिति से कटे हुए नहीं, पूरी तरह सचेत हैं। दूसरी — फिर भी उनके हृदय में न हर्ष है, न विषाद। यह उदासीनता नहीं, समभाव है। हर्ष होता तो वे अपने पराक्रम का श्रेय लेते; विषाद होता तो घबरा जाते। दोनों में से कुछ न होने के कारण ही वे अगली चौपाई में इतना संतुलित उत्तर दे पाते हैं। तुलसी यह भी बता देते हैं कि वे बोलने से पहले इस स्थिति में पहुँच चुके थे — यही धीरोदात्त नायक का लक्षण है।
जोड़ लीजिए: इस दोहे में राम ‘बोले’ तो सही, पर उन्होंने क्या कहा — यह अगली चौपाई में आता है। दोहे को इस तरह अधूरा छोड़कर अगली चौपाई से जोड़ना तुलसी की जानी-पहचानी युक्ति है; इससे पाठक बिना रुके आगे बढ़ता है।