सरल अर्थ — फिर परशुराम ने विदेह (राजा जनक) की ओर देखकर कहा — “कहो, यह इतनी भीड़ किस कारण है?” वे सब कुछ जानते हुए भी अनजान की तरह पूछ रहे थे, क्योंकि क्रोध उनके सारे शरीर में व्याप्त हो चुका था।
भाव: यह दोहा कथा का पहला संवाद है और परशुराम का पहला वाक्य। ध्यान दीजिए, वे प्रश्न पूछ रहे हैं — पर प्रश्न असली नहीं है। मार्ग में उन्हें समाचार मिल ही चुका था कि शिव-धनुष टूट गया। फिर भी वे पूछते हैं। तुलसी स्वयं इसका कारण बता देते हैं — “ब्यापेउ कोपु सरीर”। क्रोध केवल मन में नहीं है, सारे शरीर में फैल चुका है; ऐसे में मनुष्य वही करता है जो परशुराम कर रहे हैं — जानते हुए भी पूछता है, ताकि सामने वाला अपने मुँह से कहे और उसे बरसने का बहाना मिले। इसीलिए इस दोहे को पढ़ते ही सभा का तनाव पाठक तक पहुँच जाता है। ‘बिदेह’ संबोधन भी अर्थपूर्ण है — जनक का यही प्रसिद्ध नाम है, पर अगली ही चौपाई में यही मुनि उन्हें ‘जड़’ कह देंगे।
ध्यान दीजिए: पुस्तक पाठ को इसी क्रम में छापती है — आठ चौपाइयों के बाद एक दोहा। ‘व्याकरण की बात’ में पुस्तक ने स्वयं इसे कविता की एक विशेषता बताया है — “दोहा-चौपाई का क्रम से होना”। चौपाई कथा को आगे बढ़ाती है और दोहा उस खंड पर मुहर लगाकर उसे समेट देता है।