गंगा अध्याय 9 चौपाई 1–8 और दोहा 1

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — परशुराम का भयानक वेष देखते ही सभा में बैठे सभी राजा भय से व्याकुल होकर उठ खड़े हुए।

पदअर्थ
देखतदेखते ही
भृगुपतिभृगुकुल के स्वामी — परशुराम
बेषुवेष, रूप-सज्जा
करालाभयानक, डरावना
सकलसब, सारे
बिकलव्याकुल, बेचैन
भुआलाराजा, महीप, भूपाल
भाव: यह पाठ की पहली ही पंक्ति है और तुलसी इसमें पूरा वातावरण एक साथ खड़ा कर देते हैं। ध्यान दीजिए, परशुराम ने अभी कुछ कहा नहीं है — केवल दिखाई दिए हैं। फिर भी सभा में बैठे राजा उठ खड़े होते हैं। यानी भय शब्दों से नहीं, उपस्थिति से पैदा हुआ है। ‘बिकल’ शब्द बहुत सटीक है — वे केवल डरे नहीं, बेचैन हो गए; बैठे रहना भी उन्हें असंभव लगा। और ‘सकल’ कहकर कवि बताता है कि एक भी राजा अपवाद नहीं था। इस एक पंक्ति में उस पूरे राज-समाज की दुर्बलता उघड़ जाती है, जो थोड़ी देर पहले धनुष उठाने का दावा कर रहा था।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “भृगुपति … बिकल भुआला” में ‘भ’ और ‘ब’ वर्णों की बार-बार आवृत्ति है। पुस्तक की अपनी परिभाषा — “एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति” (पृष्ठ 161)। इस भारी-भरकम ध्वनि से ही भय का प्रभाव बनता है।
छंदचौपाई — प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ। गिनकर देखिए — दे(2)+ख(1)+त(1)+भृ(1)+गु(1)+प(1)+ति(1)+बे(2)+षु(1)+क(1)+रा(2)+ला(2) = 16। दूसरे चरण में भी उ(1)+ठे(2)+स(1)+क(1)+ल(1)+भ(1)+य(1)+बि(1)+क(1)+ल(1)+भु(1)+आ(2)+ला(2) = 16
रसभयानक रस का आरंभ। आलंबन — परशुराम का कराल वेष; आश्रय — सभा के राजा; अनुभाव — उठ खड़ा होना, व्याकुल होना।
बिंबदृश्य बिंब — फरसा उठाए, जटा-जूट वाले तपस्वी की भयानक आकृति और उसके सामने एक साथ खड़ी हो जाती हुई राजाओं की पंक्ति।
तुक और लयचरणांत तुक — कराला – भुआला। ‘आ’ की लंबी ध्वनि पर दोनों चरण खत्म होते हैं, जिससे पंक्ति गाने में गूँजती है।
अवधी की विशेषता‘बेषु’ (वेष), ‘कराला’ (कराल), ‘भुआला’ (भूपाल) — अवधी में शब्दांत पर ‘उ’ और ‘आ’ जुड़ जाते हैं। यही रूप पंक्ति को लय भी देते हैं।
प्र2.
“पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — सब राजा अपने पिता के नाम सहित अपना-अपना नाम कह-कहकर परशुराम को दंडवत् प्रणाम करने लगे।

पदअर्थ
पितु समेतपिता के नाम सहित
कहि कहिकह-कहकर, बार-बार कहकर
निज नामाअपना नाम
दंड प्रनामादंडवत् प्रणाम, ज़मीन पर लेटकर किया जाने वाला साष्टांग प्रणाम
भाव: यह पंक्ति सभा के लोगों की मनःस्थिति बताती है और अभ्यास का पहला बहुविकल्पी प्रश्न ठीक इसी पर है। ऊपर से देखने पर यह आदर-सत्कार लगता है — नाम बताना, दंडवत् करना। पर पिछली पंक्ति साथ रखकर पढ़िए — “उठे सकल भय बिकल भुआला”। यानी यह शिष्टाचार भय से उपजा शिष्टाचार है, श्रद्धा से नहीं। ‘पितु समेत’ भी अकारण नहीं है — कुल-परिचय देकर वे यह जताना चाहते हैं कि हम कुलीन हैं, हमसे कोई अपराध नहीं हुआ। और ‘कहि कहि’ की पुनरुक्ति बताती है कि यह काम जल्दी-जल्दी, घबराहट में हो रहा था। तुलसी ने एक भी बार ‘डर’ शब्द दोहराए बिना पूरी सभा का डर दिखा दिया।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1पुनरुक्ति प्रकाश — ‘कहि कहि’ में एक ही शब्द की आवृत्ति से क्रिया की बारंबारता और घबराहट दोनों व्यक्त हुई हैं।
अलंकार 2अनुप्रास — “निनामा” में ‘न’ की और “ितु … प्रनामा” में ‘प’ की आवृत्ति।
छंद और तुकचौपाई; तुक — नामा – प्रनामा। दोनों तुक-शब्द ‘नाम’ धातु से बने हैं, इसलिए ध्वनि और अर्थ दोनों जुड़ जाते हैं।
भावभय और शिष्टाचार — यही इस पंक्ति का उत्तर है। बाहर से आदर, भीतर से भय।
अवधी की विशेषता‘पितु’ (पिता), ‘निज’ (अपना), ‘करन’ (करने), ‘प्रनामा’ (प्रणाम) — तत्सम शब्दों का अवधी में ढला हुआ रूप।
प्र3.
“जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — परशुराम जिस किसी को अपने सहज स्वभाव से, उसे अपना हितैषी जानकर भी देख लेते, वह समझता कि मानो अब उसकी आयु ही समाप्त हो आई है।

पदअर्थ
जेहिजिसे, जिसकी ओर
सुभायँस्वभाव से, सहज भाव से
चितवहिंदेखते हैं, निरखते हैं
हितु जानीहितैषी जानकर, अपना समझकर
जनुमानो
आइ खुटानीआ पहुँची समाप्ति, आयु पूरी हो गई
भाव: यह पूरे पाठ की सबसे चतुर पंक्तियों में से एक है। तुलसी यहाँ यह नहीं कहते कि परशुराम ने किसी को घूरकर देखा। वे इसका ठीक उलटा कहते हैं — वे तो हितैषी जानकर, स्नेह से देख रहे थे। और फिर भी देखा गया व्यक्ति काँप जाता था। सोचिए, जिसकी प्रेम-भरी दृष्टि मृत्यु जैसी लगे, उसका क्रोध कैसा होगा! कवि ने क्रोध का वर्णन किए बिना क्रोध का अनुमान करा दिया — यही काव्य की सूक्ष्मता है। साथ ही यह पंक्ति यह भी बताती है कि सभा के लोगों का डर परशुराम के व्यवहार से नहीं, उनकी ख्याति से पैदा हुआ था; वे पहले से जानते थे कि यह मुनि क्या कर सकते हैं।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1उत्प्रेक्षा — ‘जनु’ (मानो) उत्प्रेक्षा का पहचाना हुआ वाचक शब्द है। यहाँ संभावना की कल्पना की गई है — मानो आयु ही समाप्त हो आई हो।
अलंकार 2अतिशयोक्ति — बात बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है (केवल देख लेने से मृत्यु का आभास)। पुस्तक की परिभाषा — “बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना”।
अलंकार 3अनुप्रास — “जेहि … जानी … जानइ नु” में ‘ज’ चार बार आया है।
विरोधाभास का प्रभाव‘हितु जानी’ (स्नेह) और ‘खुटानी’ (मृत्यु) — दो बिलकुल विपरीत भाव एक ही पंक्ति में। इसी टकराहट से पंक्ति का असर बनता है।
तुकजानी – खुटानी।
अवधी की विशेषता‘जेहि’ (जिसे), ‘चितवहिं’ (देखते हैं), ‘जानइ’ (जानता है), ‘खुटानी’ (समाप्त होना) — क्रिया-रूपों में ‘हिं’ और ‘इ’ की अवधी प्रत्यय-योजना।
प्र4.
“जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — इसके बाद राजा जनक ने आकर सिर नवाया (प्रणाम किया) और सीता को बुलाकर उनसे भी परशुराम को प्रणाम करवाया।

पदअर्थ
बहोरिफिर, इसके बाद, तदनंतर
आइआकर
सिरु नावासिर नवाया, प्रणाम किया
सीयसीता
बोलाइबुलाकर
करावाकरवाया
भाव: यहाँ जनक का चरित्र खुलता है और अभ्यास का दूसरा बहुविकल्पी प्रश्न इसी पर है। ध्यान दीजिए, जनक इस सभा के मेज़बान और राजा हैं — चाहते तो अपने सिंहासन पर बैठे रहते। पर वे स्वयं उठकर आते हैं, सिर नवाते हैं, और फिर पुत्री को बुलाकर उससे भी प्रणाम करवाते हैं। यह शिष्टता है — अतिथि और गुरुजन के प्रति उचित मर्यादा का निर्वाह, वह भी बिना किसी हिचक के। इसमें भय भी हो सकता है, पर पंक्ति में डर का कोई शब्द नहीं है; है तो केवल औपचारिक सम्मान का पूरा-पूरा निर्वाह। और पुत्री से प्रणाम करवाना उस परंपरा का हिस्सा है जिसमें घर के बड़े अतिथि को आशीर्वाद देने का अवसर देते हैं — जिसका फल अगली ही चौपाई में मिलता है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “सीय … प्रनामु … रावा” में क्रम से ‘स’, ‘न’ और ‘र’ की आवृत्ति; “बहोरि … बोलाइ” में ‘ब’ की आवृत्ति।
क्रिया-शृंखलाचार क्रियाएँ एक साथ — आइ, नावा, बोलाइ, करावा। इससे दृश्य में गति आती है; पाठक को लगता है कि सब कुछ आँखों के सामने तेज़ी से घट रहा है।
चरित्र-चित्रणएक ही पंक्ति में जनक की शिष्टता स्थापित हो जाती है — बिना किसी विशेषण के, केवल उनके कर्म से।
तुकनावा – करावा। दोनों ‘आवा’ में समाप्त होकर लय बाँधते हैं।
अवधी की विशेषता‘सिरु’ (सिर), ‘सीय’ (सीता), ‘प्रनामु’ (प्रणाम) — संज्ञाओं के अंत में ‘उ’ अवधी का प्रसिद्ध लक्षण है।
प्र5.
“आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — परशुराम ने सीता को आशीर्वाद दिया, जिससे सखियाँ हर्ष से भर उठीं; और समझदार सखियाँ सीता को अपनी मंडली में वापस ले गईं।

पदअर्थ
आसिषआशीर्वाद
दीन्हिदिया
सखींसखियाँ, सहेलियाँ
हरषानींहर्षित हुईं, प्रसन्न हुईं
निज समाजअपनी मंडली, अपने समूह में
सयानींसमझदार, चतुर
भाव: यह कविता का सबसे राहत भरा क्षण है — और सबसे छोटा भी। परशुराम का आशीर्वाद पाते ही सखियाँ खिल उठती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि जो मुनि सबको डरा रहे थे, वे सीता पर प्रसन्न हैं। पर तुलसी इस राहत को टिकने नहीं देते। एक ही शब्द — ‘सयानीं’ — पूरे दृश्य का रुख बदल देता है। सखियाँ केवल हर्षित नहीं हैं, समझदार भी हैं; वे जानती हैं कि यह वातावरण किसी भी क्षण बिगड़ सकता है, इसलिए सीता को वहाँ से हटा ले जाती हैं। यानी हर्ष के भीतर भी सतर्कता बनी हुई है। स्त्री-पात्रों की यह सूझ-बूझ आगे सुनयना की चिंता और सीता की व्यग्रता तक चलती जाती है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “खीं … माज … यानीं” में ‘स’ की तीन आवृत्तियाँ, जो पंक्ति को मुलायम और गीत जैसा बना देती हैं।
शब्द-चयनसयानीं’ पूरे चरण का प्राण है। इसे हटा दीजिए तो केवल घटना बचती है; इसके रहते घटना के साथ चरित्र भी बनता है।
तुक और लयहरषानीं – सयानीं। दोनों में अनुनासिक ‘ईं’ की ध्वनि है, जिससे स्त्री-स्वर की कोमलता सुनाई देती है।
दृश्य-संयोजनयह चौपाई एक दृश्य-परिवर्तन का काम करती है — स्त्री-पात्र मंच से हट जाती हैं और अब सभा में केवल पुरुष-पात्र बचते हैं, जिनके बीच टकराव होना है।
अवधी की विशेषता‘दीन्हि’ (दिया), ‘लै गईं’ (ले गईं), ‘हरषानीं’ (हर्षित हुईं) — अवधी की क्रियाओं में अनुनासिक बहुवचन रूप।
प्र6.
“बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — इसके बाद विश्वामित्र आकर परशुराम से मिले और उन्होंने दोनों भाइयों (राम और लक्ष्मण) को परशुराम के चरण-कमलों में डाल दिया, अर्थात् उनसे प्रणाम करवाया।

पदअर्थ
बिस्वामित्रुविश्वामित्र (राम-लक्ष्मण के साथ आए ऋषि)
पुनिफिर
पद सरोजचरण-कमल
मेलेडाल दिए, लगा दिए
दोउ भाईदोनों भाई — राम और लक्ष्मण
भाव: यह पंक्ति एक अभिभावक की सूझ दिखाती है। विश्वामित्र जानते हैं कि धनुष राम ने तोड़ा है और परशुराम का क्रोध किसी भी क्षण उधर मुड़ सकता है। इसलिए वे राम-लक्ष्मण को पीछे नहीं छिपाते, सबसे पहले सामने लाकर चरणों में डाल देते हैं। यह वही रणनीति है जो कोई अनुभवी बड़ा अपनाता है — विवाद से पहले संबंध बना दो। ‘मेले’ शब्द भी ध्यान देने योग्य है; इसमें एक स्नेह-भरा बल है, मानो उन्होंने दोनों को हाथ पकड़कर चरणों में झुका दिया हो। यह छोटी-सी क्रिया आगे राम की विनम्रता की भूमिका भी तैयार करती है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकाररूपक अलंकार — “पद सरोज”। यही पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 161), जहाँ रूपक की परिभाषा दी गई है — “रूप का आरोपण करना”। यहाँ उपमेय (चरण) में उपमान (सरोज यानी कमल) का सीधा आरोप है; बीच में ‘जैसा’ या ‘सम’ जैसा कोई वाचक शब्द नहीं, इसलिए यह उपमा नहीं, रूपक है।
रूपक क्यों बनाकमल कोमल है, पवित्र है और कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहता है। ये तीनों गुण मुनि के चरणों पर आरोपित कर दिए गए हैं — इसीलिए उपमान ‘सरोज’ चुना गया।
अनुप्रासमिले … मेले” में ‘म’ की आवृत्ति; “पुनि … द” में ‘प’ की।
तुकआई – भाई।
अवधी की विशेषता‘बिस्वामित्रु’ (विश्वामित्र), ‘दोउ’ (दोनों) — अवधी में ‘व’ प्रायः ‘ब’ हो जाता है और संज्ञा के अंत में ‘उ’ जुड़ता है।
प्र7.
“रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — (विश्वामित्र ने परिचय दिया कि) ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र हैं। दोनों की अच्छी जोड़ी देखकर परशुराम ने उन्हें आशीर्वाद दिया।

पदअर्थ
रामु लखनुराम और लक्ष्मण
ढोटापुत्र, बेटा, बालक
दीन्हि असीसआशीर्वाद दिया
भल जोटाअच्छी जोड़ी, सुंदर जोड़ा
भाव: यह पंक्ति कथा की सबसे बड़ी विडंबना रचती है। जिस व्यक्ति ने धनुष तोड़ा है, परशुराम उसी को आशीर्वाद दे रहे हैं — और उन्हें पता ही नहीं। पाठक यह जानता है, सभा यह जानती है, केवल परशुराम नहीं जानते। इसी को नाटकीय विडंबना कहते हैं, और यही आगे के विस्फोट को और तीखा बना देती है। दूसरी बात — परशुराम का आशीर्वाद क्रोधी होने पर भी उनके भीतर की सहजता दिखाता है। वे किसी को बिना कारण नापसंद नहीं करते; ‘भल जोटा’ कहकर वे सच्चे मन से प्रसन्न होते हैं। ‘ढोटा’ और ‘जोटा’ जैसे ठेठ लोकभाषा के शब्द इस क्षण को दरबारी नहीं, घरेलू बना देते हैं।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “सरथ … ढोटा … दीन्हि … देखि” में ‘द/ढ’ वर्ग की आवृत्ति।
विडंबना (व्यंग्य-स्थिति)क्रोध का लक्ष्य बनने वाले को ही आशीर्वाद मिलना — यह नाटकीयता का श्रेष्ठ उदाहरण है, जिसकी चर्चा पुस्तक ‘कविता का सौंदर्य’ में करती है।
लोकभाषाढोटा’ (पुत्र) और ‘जोटा’ (जोड़ा) — दोनों अवधी के ठेठ लोक-शब्द हैं। शास्त्रीय ‘पुत्र’ और ‘युगल’ की जगह इन्हें रखकर तुलसी दृश्य को आत्मीय बना देते हैं।
तुकढोटा – जोटा। यह तुक इतनी सहज है कि पूरी चौपाई एक कहावत की तरह याद रह जाती है।
अवधी की विशेषता‘रामु’, ‘लखनु’ — नामों के अंत में ‘उ’; ‘भल’ (भला), ‘असीस’ (आशीष) — तद्भव रूप।
प्र8.
“रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥” — इस चौपाई का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — राम को देखकर परशुराम के नेत्र वहीं ठहर गए (वे अपलक देखते रह गए), क्योंकि राम का अपार सौंदर्य कामदेव के गर्व को भी चूर करने वाला है।

पदअर्थ
रामहि चितइराम को देखकर
थकि रहे लोचनआँखें थककर रह गईं — टकटकी बँध गई
रूप अपारअसीम सौंदर्य
मारकामदेव
मदगर्व, अभिमान
मोचनछुड़ाने वाला, दूर करने वाला
भाव:थकि रहे लोचन’ — इस एक प्रयोग पर रुकिए। आँखें थकती तब हैं जब वे देखते-देखते हट न सकें। यानी परशुराम की दृष्टि राम पर जाकर अटक गई। ज़रा सोचिए, यह वही व्यक्ति है जिसकी दृष्टि पड़ते ही लोग अपनी मृत्यु का अनुमान लगा लेते थे (चौपाई 3)। वही दृष्टि यहाँ स्वयं बँध जाती है। तुलसी इस तरह बता देते हैं कि राम का सौंदर्य भी एक शक्ति है — ऐसी शक्ति जो क्रोध को कुछ क्षणों के लिए रोक देती है। और कामदेव को उपमान बनाना बहुत सार्थक है: कामदेव सौंदर्य का अभिमानी देवता माना जाता है; जब उसी का गर्व चूर हो जाए, तो सौंदर्य की सीमा कहाँ बचेगी!
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकार 1अनुप्रास — “मामोचन” में ‘म’ की तीन आवृत्तियाँ। यह पाठ के सबसे सुंदर अनुप्रासों में से एक है।
अलंकार 2अतिशयोक्ति — कामदेव तक का मद चूर कर देना; बात बढ़ा-चढ़ाकर कही गई है।
अलंकार 3व्यतिरेक की छाया — उपमान (कामदेव) से उपमेय (राम का रूप) को श्रेष्ठ बताया गया है।
बिंबदृश्य बिंब — क्रोध से भरा फरसाधारी मुनि और उसकी ठहरी हुई, अपलक आँखें। पूरा दृश्य एक क्षण के लिए स्थिर हो जाता है।
संरचना में स्थानयह चौपाई कथा में ठहराव पैदा करती है — ठीक उससे पहले, जब दोहे में परशुराम पूछेंगे ‘कहहु काह अति भीर’ और तूफ़ान शुरू होगा। शांति के बाद तूफ़ान — यह जानी-मानी नाटकीय युक्ति है।
तुकलोचन – मोचन।
प्र9.
“बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥” — इस दोहे का पदच्छेद, सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — फिर परशुराम ने विदेह (राजा जनक) की ओर देखकर कहा — “कहो, यह इतनी भीड़ किस कारण है?” वे सब कुछ जानते हुए भी अनजान की तरह पूछ रहे थे, क्योंकि क्रोध उनके सारे शरीर में व्याप्त हो चुका था।

पदअर्थ
बहुरिफिर, तदनंतर
बिलोकिदेखकर
बिदेह सनविदेह (जनक) से
काह अति भीरयह इतनी भीड़ किसलिए है
जानि अजान जिमिजानते हुए भी अनजान की तरह
ब्यापेउव्याप्त हो गया, फैल गया
कोपु सरीरक्रोध शरीर में
भाव: यह दोहा कथा का पहला संवाद है और परशुराम का पहला वाक्य। ध्यान दीजिए, वे प्रश्न पूछ रहे हैं — पर प्रश्न असली नहीं है। मार्ग में उन्हें समाचार मिल ही चुका था कि शिव-धनुष टूट गया। फिर भी वे पूछते हैं। तुलसी स्वयं इसका कारण बता देते हैं — “ब्यापेउ कोपु सरीर”। क्रोध केवल मन में नहीं है, सारे शरीर में फैल चुका है; ऐसे में मनुष्य वही करता है जो परशुराम कर रहे हैं — जानते हुए भी पूछता है, ताकि सामने वाला अपने मुँह से कहे और उसे बरसने का बहाना मिले। इसीलिए इस दोहे को पढ़ते ही सभा का तनाव पाठक तक पहुँच जाता है। ‘बिदेह’ संबोधन भी अर्थपूर्ण है — जनक का यही प्रसिद्ध नाम है, पर अगली ही चौपाई में यही मुनि उन्हें ‘जड़’ कह देंगे।
शिल्प का पक्षदोहे में कैसे काम कर रहा है
छंददोहा — दो पंक्तियों का अर्धसम मात्रिक छंद, जिसमें पहले और तीसरे चरण में 13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं और चरणांत गुरु-लघु होता है। गिनिए — ब(1)हु(1)रि(1) + बि(1)लो(2)कि(1) + बि(1)दे(2)ह(1) + स(1)न(1) = 13; क(1)ह(1)हु(1) + का(2)ह(1) + अ(1)ति(1) + भी(2)र(1) = 11
अलंकार 1अनुप्रास — “हुरि बिलोकि बिदेह” में ‘ब’ की तीन आवृत्तियाँ, और “जानि अजाजिमि” में ‘ज’ की तीन।
अलंकार 2उपमा — ‘जिमि’ (जैसे) उपमा का वाचक शब्द है। उपमेय — परशुराम का पूछना; उपमान — अनजान व्यक्ति का पूछना; साधारण धर्म — अनभिज्ञता का भाव।
अलंकार 3विरोधाभास — ‘जानि’ और ‘अजान’ एक साथ। ऊपर से विरोध दिखता है, पर अर्थ खुलते ही विरोध मिट जाता है।
वक्रोक्तिप्रश्न सीधा है, पर आशय दूसरा है — यही वक्र कथन है। पूरी कविता में व्यंग्य की यही परंपरा आगे लक्ष्मण उठा लेते हैं।
तुक और लयभीर – सरीर। दोहे की लय में पहला चरण लंबा और दूसरा छोटा होता है, जिससे बात कहकर तुरंत रुक जाने का प्रभाव बनता है — व्यंग्य और चेतावनी के लिए यह सबसे उपयुक्त छंद है।
ध्यान दीजिए: पुस्तक पाठ को इसी क्रम में छापती है — आठ चौपाइयों के बाद एक दोहा। ‘व्याकरण की बात’ में पुस्तक ने स्वयं इसे कविता की एक विशेषता बताया है — “दोहा-चौपाई का क्रम से होना”। चौपाई कथा को आगे बढ़ाती है और दोहा उस खंड पर मुहर लगाकर उसे समेट देता है।
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