कक्षा ९ हिंदी अध्याय 8 पद के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
रचनाकार — रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ। पुस्तक के अनुसार उनका जीवन-काल 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) माना जाता है। वे संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है। उनकी रचनाएँ रैदास बानी में संकलित हैं और उनकी अनेक भक्ति-रचनाएँ आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में भी शामिल हैं। भाषा — रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। संत कवियों की ऐसी मिली-जुली भाषा को सधुक्कड़ी कहा जाता है। यही कारण है कि पदों में ‘जाकी’, ‘बरै’, ‘राती’, ‘तोरौ’, ‘जोरौ’, ‘कवन’, ‘अंदेसा’, ‘भरोसां’ जैसे रूप एक साथ मिलते हैं। उनकी रचनाएँ आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं। पहला पद — कथ्य — पद क
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्द | अर्थ | पाठ की पंक्ति | अपने वाक्य में प्रयोग |
|---|---|---|---|
| रट | लगन, धुन, बार-बार दोहराना | “अब कैसे छूटै राम रट लागी।” | उसे तो बस एक ही रट लगी है — डॉक्टर बनना है। |
| चंदन | एक प्रसिद्ध वृक्ष जिसकी लकड़ी एक प्रधान गंधद्रव्य है, संदल; चंदन को घिसकर बनवाया हुआ लेप | “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” | माथे पर चंदन लगाकर वह मंदिर से लौटा। |
| बास | गंध, निवास, वासस्थान, वस्त्र | “जाकी अंग-अंग बास समानी।” | रात-रानी की बास पूरे आँगन में फैल गई। |
| समानी | समा गई, बस गई | “जाकी अंग-अंग बास समानी।” | माँ की सीख उसके मन में समानी हुई है। |
| घन | बादल, मेघ, अंधकार, समूह, विस्तार | “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा” | आषाढ़ के घन देखकर किसान का मन हरा हो गया। |
| मोरा | मोर, मयूर | “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा” | बादल घिरते ही बाग़ में मोर नाचने लगा। |
| चितवत | किसी की ओर देखने का ढंग, दृष्टि, देखना, निरखना | “जैसे चितवत चंद चकोरा।” | वह द्वार की ओर चितवत ही रह गई। |
| चकोरा / चकोर | तीतर की जाति का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है | “जैसे चितवत चंद चकोरा।” | चकोर की तरह वह गुरु का मुख निहारता रहता है। |
| जोति / ज्योति | प्रकाश, रोशनी, लौ, सूर्य, नक्षत्र | “जाकी जोति बरै दिन राती।” | दीये की जोति हवा में भी काँपी नहीं। |
| बरै | जलती है, प्रज्वलित होती है | “जाकी जोति बरै दिन राती।” | चूल्हे की आग रात-भर बरती रही। |
| राती | रात्रि, रात | “जाकी जोति बरै दिन राती।” | दिन-राती वह अपने काम में लगा रहता है। |
| सुहागा | एक प्राकृतिक खनिज, जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और चमक बढ़ जाती है (बोरैक्स) | “जैसे सोने मिलत सुहागा।” | अच्छी संगत तो सोने पर सुहागा है। |
| दासा | दास, सेवक | “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा” | वह स्वयं को गुरु का दासा कहता है। |
| भगति / भक्ति | आराध्य के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण | “ऐसी भगति करै रैदासा।” | मीरा की भगति में दिखावा नहीं था। |
| तोरौ | तोड़ूँ / तोड़ो (संबंध तोड़ना) | “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” | मित्रता का नाता कभी मत तोरौ। |
| जोरौ | जोड़ूँ, जोड़ना | “तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” | मन को अच्छे कामों से जोरौ। |
| कवन | कौन | “तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” | कवन जाने कल क्या होगा। |
| तीरथ / तीर्थ | पुण्य क्षेत्र; वह पुण्य स्थान जहाँ विशेष धर्म के अनुयायी पूजा, स्नान आदि के लिए जाते हों — जैसे काशी, प्रयाग, मथुरा | “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” | दादी हर साल किसी तीर्थ पर जाती हैं। |
| बरत / व्रत | उपवास, संकल्प | “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” | माँ ने आज व्रत रखा है। |
| अंदेसा | सोच, चिंता, शक, आशंका, खतरा, हानि, दुविधा | “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” | परीक्षा का कोई अंदेसा उसके चेहरे पर नहीं था। |
| चरन कमल | कमल के समान कोमल और सुंदर चरण (रूपक) | “तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” | संत के चरन कमल में सिर झुकाकर वह बैठ गया। |
| भरोसां | भरोसा, आसरा, विश्वास | “तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” | मुझे तो बस अपनी मेहनत का भरोसा है। |
| जहँ जहँ | जहाँ-जहाँ, जिस-जिस जगह | “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा” | जहँ जहँ वह गया, लोगों ने उसे सराहा। |
| दूजा | दूसरा | “तुम सा देव ओर नहिं दूजा।” | इस काम में उसका दूजा कोई नहीं। |
| अपनो | अपना | “मैं अपनो मन हरि से जोरौ” | अपनो कर्तव्य पहचानो। |
| सबही पहर | आठों पहर, हर समय | “सबही पहर तुम्हारी आसा” | सबही पहर उसे घर की चिंता लगी रहती है। |
| आसा | आशा, आस, प्रतीक्षा | “सबही पहर तुम्हारी आसा” | आसा ही जीवन को आगे खींचती है। |
| मन क्रम वचन | मन, कर्म और वाणी — तीनों से | “मन क्रम वचन कहै रैदासा।” | मन क्रम वचन से मैंने यह वचन निभाया। |
| तालाबेली | बेचैनी, छटपटाहट (नामदेव के पद में) | “मोहि लागति तालाबेली।” | माँ के बिना बच्चे को तालाबेली लगी रहती है। |
| तलफैं | तड़पती है, छटपटाती है | “पानी बिनु ज्यूं मीन तलफैं।” | धूप में पौधा पानी के लिए तलफता रहा। |
| अलख | जो देखा न जा सके, निराकार ब्रह्म | “गुर भेटत ही अलख लखाया।” | संत ने अलख का भेद सरल शब्दों में बता दिया। |
| बापुरो | बेचारा, दीन | “तैसे रामनाम बिनु बापुरो नामा।” | सहारा टूटते ही वह बापुरो-सा खड़ा रह गया। |
अभ्यास
- पद (1)
- पद (2)
- मेरे उत्तर मेरे तर्क
- अर्थ और भाव
- मेरी समझ मेरे विचार
- कविता का सौंदर्य
- कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ
- विषयों से संवाद
- व्याकरण की बात
- सृजन
- झरोखे से
- खोजबीन