प्र1.
“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” — इस पंक्ति का सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
सरल अर्थ — हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी दें, तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा; आपसे नाता तोड़कर मैं भला और किससे जोड़ूँ?
भाव: यह पूरे पाठ की सबसे साहसी पंक्ति है। साधारण भक्ति में शर्त छिपी रहती है — ‘आप मुझे मानें तो मैं आपको मानूँ’। रैदास वह शर्त हटा देते हैं। उनकी भक्ति एकतरफ़ा और बिना शर्त है — इसीलिए वह टूट ही नहीं सकती। दूसरे चरण में वे तर्क भी देते हैं: संसार में कोई ऐसा है ही नहीं जिससे नाता जोड़ा जा सके। यानी यह केवल भावुकता नहीं, एक सोचा-समझा निर्णय है। इसी कारण पुस्तक ने अपनी तालिका में इसे ‘अनन्य भक्ति भाव’ का उदाहरण बनाया है।
| शिल्प का पक्ष | पंक्ति में कैसे काम कर रहा है |
|---|---|
| अलंकार | अनुप्रास — “तुम सौ तोरि” में ‘त’ की और “सौ … सौं” में ‘स’ की आवृत्ति। प्रश्नालंकार — ‘कवन सौं जोरौ’ ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर पूछा नहीं जा रहा। |
| शब्द-योजना | तोरौ और जोरौ — विलोम क्रियाओं की जोड़ी। ‘तोरौ’ एक ही पंक्ति में तीन बार आया है, जिससे इनकार का स्वर हथौड़े की तरह पड़ता है। |
| लय | दोनों चरण एक ही ढाँचे पर बने हैं, इसलिए गाते समय पहला चरण दूसरे को अपने आप खींच लेता है। |
| भाषा | ‘कवन’ (कौन), ‘सौं’ (से) — ब्रज-राजस्थानी रूप। ‘राम’ फिर निर्गुण ब्रह्म का नाम है। |
| तुक | तोरौ – जोरौ। |