गंगा अध्याय 8 पद (2)

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” — इस पंक्ति का सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — हे राम! यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी दें, तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा; आपसे नाता तोड़कर मैं भला और किससे जोड़ूँ?

भाव: यह पूरे पाठ की सबसे साहसी पंक्ति है। साधारण भक्ति में शर्त छिपी रहती है — ‘आप मुझे मानें तो मैं आपको मानूँ’। रैदास वह शर्त हटा देते हैं। उनकी भक्ति एकतरफ़ा और बिना शर्त है — इसीलिए वह टूट ही नहीं सकती। दूसरे चरण में वे तर्क भी देते हैं: संसार में कोई ऐसा है ही नहीं जिससे नाता जोड़ा जा सके। यानी यह केवल भावुकता नहीं, एक सोचा-समझा निर्णय है। इसी कारण पुस्तक ने अपनी तालिका में इसे ‘अनन्य भक्ति भाव’ का उदाहरण बनाया है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकारअनुप्रास — “तुम सौ तोरि” में ‘त’ की और “सौसौं” में ‘स’ की आवृत्ति। प्रश्नालंकार — ‘कवन सौं जोरौ’ ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर पूछा नहीं जा रहा।
शब्द-योजनातोरौ और जोरौ — विलोम क्रियाओं की जोड़ी। ‘तोरौ’ एक ही पंक्ति में तीन बार आया है, जिससे इनकार का स्वर हथौड़े की तरह पड़ता है।
लयदोनों चरण एक ही ढाँचे पर बने हैं, इसलिए गाते समय पहला चरण दूसरे को अपने आप खींच लेता है।
भाषा‘कवन’ (कौन), ‘सौं’ (से) — ब्रज-राजस्थानी रूप। ‘राम’ फिर निर्गुण ब्रह्म का नाम है।
तुकतोरौ – जोरौ।
प्र2.
“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” — इस पंक्ति का सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — मुझे तीर्थ-यात्रा और व्रत न कर पाने का कोई अंदेशा (चिंता, दुविधा) नहीं है, क्योंकि मुझे तो केवल आपके चरण-कमलों का एक ही भरोसा है।

भाव: यही निर्गुण संत काव्य की केंद्रीय स्थापना है — भक्ति का रास्ता बाहर नहीं, भीतर से जाता है। ध्यान रखिए, रैदास तीर्थ और व्रत को गाली नहीं देते; वे केवल कहते हैं कि इनका न होना उनके लिए चिंता की बात नहीं। ‘अंदेसा’ शब्द इसीलिए महत्वपूर्ण है — शब्द-संपदा में इसका अर्थ है ‘सोच, चिंता, शक, आशंका, दुविधा’। और ‘एक भरोसां’ में जो ‘एक’ है, वही पूरे पद का प्राण है — भरोसा अनेक जगह बाँटा नहीं जा सकता। यह बात उस समय के लिए बहुत बड़ी थी, जब तीर्थ और कर्मकांड तक सबकी पहुँच ही नहीं थी।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
अलंकाररूपक — “चरन कमल”। यही पुस्तक का अपना उदाहरण है (पृष्ठ 149): रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय (चरण) में उपमान (कमल) का आरोप कर अभेद स्थापित कर दिया गया है — चरण ‘कमल जैसे’ नहीं, चरण ‘कमल ही’ हैं। साथ ही अनुप्रास — ‘रत … रोसां’।
बिंबकोमलता, शीतलता और पवित्रता का दृश्य बिंब — कमल कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहता है, यही भाव चरणों पर आरोपित है।
विचार-संरचनापहला चरण निषेध (क्या नहीं चाहिए), दूसरा चरण विधान (क्या चाहिए)। पहले जगह खाली की जाती है, फिर उसमें एक ही चीज़ रखी जाती है।
तुकअंदेसा – भरोसां।
प्र3.
“जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।” — इस पंक्ति का सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहीं आपकी ही पूजा होती दिखाई देती है; आपके समान दूसरा कोई देव है ही नहीं।

भाव: यह पंक्ति दो बड़ी बातें एक साथ कहती है। पहली — ईश्वर सर्वव्यापक है। वह किसी एक मंदिर, तीर्थ या दिशा में बंद नहीं; इसीलिए किसी को उस तक पहुँचने के लिए यात्रा करने की ज़रूरत नहीं। यह विचार सीधे पिछली पंक्ति से जुड़ता है — जब प्रभु हर जगह हैं, तो तीर्थ जाने का ‘अंदेसा’ क्यों? दूसरी — ईश्वर अद्वितीय है, उसका कोई दूसरा नहीं। सर्वव्यापकता और अनन्यता — दोनों एक ही साँस में। इसी कारण पुस्तक ने इस पंक्ति को ‘सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा’ वाले प्रश्न का सही विकल्प बनाया है।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
पुनरुक्तिजहँ जहँ’ — शब्द दोहराकर स्थान का असीम विस्तार बना दिया गया (पुनरुक्ति प्रकाश)। एक बार ‘जहँ’ कहने से इतना विस्तार नहीं बनता।
अनुप्रासजहँ जहँ जाओ” में ‘ज’ की तीन आवृत्तियाँ।
तुलना‘तुम सा देव’ में ‘सा’ उपमावाचक है, पर यहाँ उपमान को अस्वीकार कर दिया गया है — ‘तुम्हारे जैसा कोई है ही नहीं’। यह अनन्वय जैसी स्थिति है, जिसमें उपमेय की तुलना केवल स्वयं से हो सकती है।
तुकपूजा – दूजा।
प्र4.
“मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।” — इस पंक्ति का सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — मैंने अपना मन हरि से जोड़ लिया है; और हरि से जोड़कर मैंने बाकी सबसे (सांसारिक मोह-माया से) नाता तोड़ लिया है।

भाव: यहाँ भक्ति की शर्त बताई गई है — एकाग्रता। मन एक ही समय में अनेक जगह नहीं लग सकता। इसीलिए ‘जोड़ना’ और ‘तोड़ना’ यहाँ दो अलग काम नहीं, एक ही काम के दो पक्ष हैं। ध्यान दीजिए, क्रम भी सोचा हुआ है — पहले जोड़ा, फिर तोड़ा। रैदास यह नहीं कहते कि पहले संसार छोड़ो, तब भक्ति करो; वे कहते हैं कि पहले प्रभु से जुड़ो — बाकी नाते अपने आप ढीले पड़ जाएँगे। यह गृहस्थ के लिए भी संभव रास्ता है, संन्यास लेने की ज़रूरत नहीं।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
शब्द-योजनाजोरौ – जोरि – तोरों की शृंखला। पहला चरण जिस शब्द पर खत्म होता है, दूसरा चरण उसी से शुरू होता है — इससे वाक्य में कड़ी-दर-कड़ी जुड़ने का प्रभाव बनता है।
अनुप्रास“हरि सो जोरि बन सो” — ‘स’ की आवृत्ति।
पुनरुक्ति‘हरि’ शब्द दो बार — केंद्र में वही एक नाम बना रहता है।
तुकजोरौ – तोरों। ध्यान दीजिए, पद (2) की पहली पंक्ति की तुक भी यही जोड़ी थी — इससे पूरा पद एक ही स्वर में बँधा रहता है।
प्र5.
“सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।” — इस पंक्ति का सरल अर्थ, भाव और शिल्प स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

सरल अर्थ — हर पहर, यानी आठों पहर मुझे आपकी ही आस लगी रहती है — रैदास यह बात मन, कर्म और वचन तीनों से कहता है।

भाव: पद यहाँ दो कसौटियाँ रखकर समाप्त होता है। पहली समय की — ‘सबही पहर’, यानी भक्ति का कोई नियत समय नहीं, वह चौबीसों घंटे की चीज़ है (यही बात पहले पद में ‘दिन राती’ कहकर आई थी)। दूसरी सच्चाई की — ‘मन क्रम वचन’। जो मन में सोचा जाए, वही मुँह से कहा जाए और वही हाथ से किया जाए, तभी भक्ति सच्ची है। यही वह कसौटी है जिससे रैदास दिखावटी धर्म को अलग कर देते हैं — क्योंकि आडंबर में वचन कुछ और होता है, मन कुछ और।
शिल्प का पक्षपंक्ति में कैसे काम कर रहा है
भणिता / छाप‘कहै रैदासा’ — दोनों पदों का अंत कवि-नाम पर होता है, जो पद-विधा की पहचान है।
त्रिपदी सूत्र‘मन – क्रम – वचन’ तीन शब्दों का सूत्र। तीन का यह ढाँचा भारतीय परंपरा में सच्चाई की माप के लिए बार-बार आता है।
अनुप्रासक्रम” में ‘म’ की आवृत्ति; ‘कहै’ के ‘क’ के साथ ‘क्रम’ का ‘क्र’ भी मिलता है।
तुक और लयआसा – रैदासा। ध्यान दीजिए, पहला पद भी ‘दासा – रैदासा’ पर समाप्त हुआ था — दोनों पदों की अंतिम ध्वनि एक-सी है, जिससे वे एक ही माला के दो मनके लगते हैं।
दोनों पदों का अंतर एक वाक्य में: पहला पद चित्रों से भक्ति समझाता है (चंदन-पानी, दीपक-बाती), दूसरा पद घोषणाओं से (नहीं तोड़ूँगा, अंदेसा नहीं, दूजा नहीं)। पहला दिखाता है, दूसरा कहता है।
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