प्र1.
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं? 1. “अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है? (क) नाम उच्चारण की कठिनाई (ख) नाम रटकर याद करना (ग) आराध्य का नाम जपना (घ) मित्रों का नाम रटना
उत्तर
सटीक उत्तर — (ग) आराध्य का नाम जपना।
यह उत्तर क्यों उपयुक्त है: इस पंक्ति में ‘राम’ कोई साधारण नाम नहीं, भक्त के आराध्य का नाम है — और ‘रट’ का अर्थ है वह लगन जो अपने आप लग जाए। भक्त कह रहा है कि यह लगन अब छूट ही नहीं सकती। यही बात पूरे पद में आगे भी चलती है — “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।” और दूसरे पद में तो वे साफ़ कह देते हैं — “सबही पहर तुम्हारी आसा”। यानी पंक्ति का भाव है — आठों पहर आराध्य का नाम जपना, उसे स्मरण में बनाए रखना। पुस्तक की भूमिका भी इसी पद के बारे में कहती है कि इसमें ‘अनन्य भक्ति और आराध्य के प्रति समर्पण का भाव प्रकट होता है’।
| विकल्प | सही / ग़लत | कारण |
|---|---|---|
| (क) नाम उच्चारण की कठिनाई | ग़लत | पंक्ति में कठिनाई का कोई संकेत नहीं है। ‘कैसे छूटै’ का अर्थ ‘बोलना कठिन है’ नहीं, बल्कि ‘छोड़ना असंभव है’ है। भाव कठिनाई का नहीं, सहजता का है। |
| (ख) नाम रटकर याद करना | ग़लत | यह ‘रट’ शब्द को पाठशाला वाले अर्थ में ले लेता है। यहाँ रटना = याद करने की मेहनत नहीं, लगन है। रटकर याद की गई चीज़ भूल भी जाती है; रैदास की रट तो छूटती ही नहीं। |
| (ग) आराध्य का नाम जपना | सही ✓ | ‘राम’ = आराध्य (निर्गुण ब्रह्म), ‘रट लागी’ = निरंतर स्मरण। आगे की पंक्तियाँ — ‘सबही पहर तुम्हारी आसा’ — इसी को पुष्ट करती हैं। |
| (घ) मित्रों का नाम रटना | ग़लत | पद में कहीं मित्र का प्रसंग नहीं है। संबोधन सर्वत्र ‘प्रभु जी’ और ‘राम’ है, और रिश्ता स्वामी-दास का बताया गया है। |