गंगा अध्याय 8 अर्थ और भाव

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए। (क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उत्तर

अर्थ — हे प्रभु! आप वन पर घिरे हुए बादल हैं और मैं मोर हूँ; और हम दोनों का नाता वैसा ही है जैसे चकोर पक्षी टकटकी लगाकर चंद्रमा को निहारता रहता है।

भाव — इस एक पंक्ति में कवि ने प्रकृति से उठाए दो चित्र रखे हैं, और दोनों प्रतीक्षा और दर्शन-सुख के चित्र हैं।

  • घन और मोर — मोर पूरे वर्ष बादल की बाट जोहता है। बादल घिरते ही वह पंख फैलाकर नाच उठता है। उसका आनंद बादल को पाने में नहीं, उसके आ जाने में है। भक्त भी ऐसा ही है — प्रभु का स्मरण होते ही उसका मन नाच उठता है।
  • चंद और चकोर — शब्द-संपदा के अनुसार चकोर ‘तीतर की जाति का एक पक्षी है जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है’। वह रात-भर बिना पलक झपकाए चाँद को देखता रहता है। चाँद उसे कभी मिलता नहीं, फिर भी उसका प्रेम घटता नहीं। यही अनन्य, निष्काम भक्ति है — जिसमें पाने की शर्त नहीं होती।
दोनों चित्र मिलकर क्या कहते हैं: भक्त का प्रेम एकतरफ़ा दिखता है, पर अधूरा नहीं है। मोर और चकोर दोनों नीचे हैं, बादल और चाँद दोनों ऊपर; दोनों जोड़ियों में दूरी है, फिर भी संबंध अटूट है। पुस्तक की भूमिका इसी को ‘बादल-मोर का संबंध अटूट होता है’ कहकर बताती है। यही रैदास की भक्ति का स्वर है — प्रभु दूर हों तब भी भक्त का मुख उन्हीं की ओर रहेगा।
शिल्प की बात: इस पंक्ति में तीन अलंकार एक साथ काम कर रहे हैं — रूपक (‘तुम घन’, ‘हम मोरा’ — बिना वाचक आरोप), उपमा (‘जैसे … चंद चकोरा’) और अनुप्रास (‘चितवत चंकोरा’ में ‘च’ की तीन आवृत्तियाँ — यही पुस्तक का अपना उदाहरण है)। ‘मोरा – चकोरा’ की तुक पंक्ति को गेय बना देती है।
प्र2.
(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
उत्तर

अर्थ — मुझे तीर्थ-यात्रा और व्रत न कर पाने का कोई अंदेशा — कोई चिंता, शंका या दुविधा — नहीं है, क्योंकि मुझे तो केवल आपके चरण-कमलों का एक ही भरोसा है।

भाव — यह पंक्ति रैदास की भक्ति का घोषणापत्र है। इसमें तीन बातें एक साथ कही गई हैं —

  1. भक्ति का रास्ता भीतर से जाता है, बाहर से नहीं। तीर्थ और व्रत बाहरी क्रियाएँ हैं। रैदास ने ‘बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना है’ (पाठ की भूमिका)। इसलिए वे इन क्रियाओं के न होने से विचलित नहीं होते।
  2. भरोसा एक ही जगह हो सकता है।एक भरोसां’ में ‘एक’ शब्द सबसे भारी है। जिसने अनेक जगह आसरा ढूँढ़ा, उसका कहीं भी पूरा आसरा नहीं। इसी बात को वे आगे दोहराते हैं — “मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।”
  3. भक्ति सबके लिए खुली है। तीर्थ के लिए साधन चाहिए, समय चाहिए, और उस युग में जाति की अनुमति भी चाहिए थी। भरोसे के लिए कुछ नहीं चाहिए। इस तरह यह पंक्ति उस पूरी व्यवस्था को चुनौती दे देती है जो भक्ति को कुछ ही लोगों की चीज़ बना देती थी।
ध्यान रखने योग्य बारीकी: रैदास तीर्थ और व्रत को बुरा नहीं कहते। वे कहते हैं कि उनका ‘अंदेसा’ नहीं है। ‘अंदेसा’ का अर्थ शब्द-संपदा में है — ‘सोच, चिंता, शक, आशंका, दुविधा’। यानी उनका झगड़ा कर्मकांड से नहीं, कर्मकांड को भक्ति की शर्त बना देने से है। यह अंतर समझ लेना पूरे भक्तिकाल को समझ लेना है।
शिल्प की बात:चरन कमल’ में रूपक अलंकार है — पुस्तक की परिभाषा के अनुसार ‘रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित’ किया गया है। चरण ‘कमल जैसे’ नहीं कहे गए, ‘कमल ही’ कह दिए गए — इसीलिए यह उपमा नहीं, रूपक है। साथ में अनुप्रास (‘रत … रोसां’) और तुक ‘अंदेसा – भरोसां’ भी है।
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