प्र1.
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए। (क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उत्तर
अर्थ — हे प्रभु! आप वन पर घिरे हुए बादल हैं और मैं मोर हूँ; और हम दोनों का नाता वैसा ही है जैसे चकोर पक्षी टकटकी लगाकर चंद्रमा को निहारता रहता है।
भाव — इस एक पंक्ति में कवि ने प्रकृति से उठाए दो चित्र रखे हैं, और दोनों प्रतीक्षा और दर्शन-सुख के चित्र हैं।
- घन और मोर — मोर पूरे वर्ष बादल की बाट जोहता है। बादल घिरते ही वह पंख फैलाकर नाच उठता है। उसका आनंद बादल को पाने में नहीं, उसके आ जाने में है। भक्त भी ऐसा ही है — प्रभु का स्मरण होते ही उसका मन नाच उठता है।
- चंद और चकोर — शब्द-संपदा के अनुसार चकोर ‘तीतर की जाति का एक पक्षी है जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है’। वह रात-भर बिना पलक झपकाए चाँद को देखता रहता है। चाँद उसे कभी मिलता नहीं, फिर भी उसका प्रेम घटता नहीं। यही अनन्य, निष्काम भक्ति है — जिसमें पाने की शर्त नहीं होती।
दोनों चित्र मिलकर क्या कहते हैं: भक्त का प्रेम एकतरफ़ा दिखता है, पर अधूरा नहीं है। मोर और चकोर दोनों नीचे हैं, बादल और चाँद दोनों ऊपर; दोनों जोड़ियों में दूरी है, फिर भी संबंध अटूट है। पुस्तक की भूमिका इसी को ‘बादल-मोर का संबंध अटूट होता है’ कहकर बताती है। यही रैदास की भक्ति का स्वर है — प्रभु दूर हों तब भी भक्त का मुख उन्हीं की ओर रहेगा।
शिल्प की बात: इस पंक्ति में तीन अलंकार एक साथ काम कर रहे हैं — रूपक (‘तुम घन’, ‘हम मोरा’ — बिना वाचक आरोप), उपमा (‘जैसे … चंद चकोरा’) और अनुप्रास (‘चितवत चंद चकोरा’ में ‘च’ की तीन आवृत्तियाँ — यही पुस्तक का अपना उदाहरण है)। ‘मोरा – चकोरा’ की तुक पंक्ति को गेय बना देती है।