इस पंक्ति से यह समझ में आता है कि रैदास की भक्ति शर्तों पर टिकी हुई भक्ति नहीं है — वह एकतरफ़ा, बिना शर्त और इसलिए अटूट है।
1. भक्ति में सौदा नहीं है। साधारण रिश्ते ‘लेन-देन’ पर चलते हैं — जो मुझे माने, मैं उसे मानूँ। रैदास इस नियम को तोड़ देते हैं। वे कहते हैं, ‘जो तुम तोरौ’ — यानी यदि आप ही नाता तोड़ दें — ‘राम मैं नहिं तोरौ’ — तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा। इसका अर्थ है कि उनकी भक्ति प्रभु के व्यवहार पर निर्भर ही नहीं है। जो चीज़ किसी दूसरे के व्यवहार पर निर्भर नहीं, उसे कोई तोड़ भी नहीं सकता।
2. यह भावुकता नहीं, तर्क है। दूसरा चरण देखिए — “तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” यहाँ रैदास कारण भी दे देते हैं: आपसे तोड़कर जोड़ूँ भी तो किससे? संसार में कोई ऐसा दूसरा है ही नहीं। यह प्रश्न उत्तर माँगने के लिए नहीं पूछा गया, बल्कि यह प्रश्नालंकार है — उत्तर पहले से तय है। इसी बात को वे आगे स्पष्ट भी कर देते हैं — “तुम सा देव ओर नहिं दूजा।”
3. निष्ठा का अर्थ है — विकल्प न रखना। रैदास एक और पंक्ति में यही बात दूसरे ढंग से कहते हैं — “मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।” यानी एक से जुड़ने का अर्थ है बाकी सबसे छूट जाना। जिसके पास कोई दूसरा रास्ता बचा ही न हो, उसकी निष्ठा डोल नहीं सकती।
4. यह निष्ठा उनके जीवन से जुड़ी हुई है। रैदास चर्मकार परिवार से थे और उस समय के समाज ने उन्हें मंदिर, शास्त्र और तीर्थ से दूर रखा। जिस भक्त को समाज बार-बार ‘तोड़ता’ रहा, वह भक्त कह रहा है कि मैं फिर भी नहीं तोड़ूँगा। इस दृष्टि से यह पंक्ति केवल भक्ति का नहीं, आत्मसम्मान और अडिगता का भी वक्तव्य है।