अनुप्रास कहाँ है — रेखांकित अंश है ‘चितवत चंद चकोरा’। इसमें ‘च’ व्यंजन लगातार तीन बार आया है — चितवत, चंद, चकोरा। पुस्तक की परिभाषा के अनुसार ‘जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है’ — यहाँ एक से अधिक बार आवृत्ति है, इसलिए यह अनुप्रास है।
इन्हीं दोनों पदों से अनुप्रास के और उदाहरण —
| पंक्ति / अंश | आवर्ती व्यंजन | कहाँ-कहाँ |
|---|---|---|
| “अब कैसे छूटै राम रट लागी।” | र | रा-म, र-ट |
| “जाकी जोति बरै दिन राती।” | ज | जा-की, जो-ति |
| “तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” | त | तु-म, तो-रि |
| “तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” | स | सौ, सौं |
| “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” | ब / भ | बरत, भरोसां (सजातीय ओष्ठ्य ध्वनियाँ) |
| “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा।” | ज | जहँ, जहँ, जाओ |
| “हरि सो जोरि सबन सो तोरों।” | स | सो, सबन, सो |
| “मन क्रम वचन कहै रैदासा।” | म / क | मन-क्रम; क्रम-कहै |