गंगा अध्याय 8 कविता का सौंदर्य

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।” — उपर्युक्त पंक्ति के रेखांकित अंश पर ध्यान दीजिए। इसमें अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। — इस अलंकार को समझाइए और पदों में से अनुप्रास के और उदाहरण छाँटिए।
उत्तर

अनुप्रास कहाँ है — रेखांकित अंश है ‘चितवत चंद चकोरा’। इसमें ‘’ व्यंजन लगातार तीन बार आया है — चितवत, चंद, कोरा। पुस्तक की परिभाषा के अनुसार ‘जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है’ — यहाँ एक से अधिक बार आवृत्ति है, इसलिए यह अनुप्रास है।

यह अलंकार कर क्या रहा है: अनुप्रास केवल सजावट नहीं है। एक ही व्यंजन बार-बार लौटने से पंक्ति में लय बनती है और वह गाने में सहज हो जाती है — याद रखिए, पद गाया जाने वाला रूप है। दूसरी बात, ‘च’ की तीनों ध्वनियाँ चकोर के टकटकी लगाकर देखते रहने की एकरसता को भी सुनाई देने लायक बना देती हैं। ध्वनि और अर्थ एक साथ चलते हैं — यही अच्छे अलंकार की पहचान है।

इन्हीं दोनों पदों से अनुप्रास के और उदाहरण —

पंक्ति / अंशआवर्ती व्यंजनकहाँ-कहाँ
“अब कैसे छूटै राम रट लागी।”रा-म, र-ट
जाकी जोति बरै दिन राती।”जा-की, जो-ति
तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।”तु-म, तो-रि
“तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।”सौ, सौं
“तीरथ रत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक रोसां।”ब / भबरत, भरोसां (सजातीय ओष्ठ्य ध्वनियाँ)
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा।”जहँ, जहँ, जाओ
“हरि सो जोरि बन सो तोरों।”सो, सबन, सो
क्रम वचन है रैदासा।”म / कमन-क्रम; क्रम-कहै
याद रखिए: अनुप्रास में व्यंजन की आवृत्ति देखी जाती है, स्वर की नहीं। और आवृत्त व्यंजन प्रायः पास-पास के शब्दों के आरंभ में आते हैं, तभी कान उन्हें पकड़ पाता है।
प्र2.
“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।” — उपर्युक्त रेखांकित अंश में उपमा अलंकार है। किसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर जब किसी वस्तु या व्यक्ति के रूप, गुण, धर्म का वर्णन किया जाता है तो वहाँ उपमा अलंकार होता है। — इस अलंकार को समझाइए और पदों में से उपमा के और उदाहरण छाँटिए।
उत्तर

उपमा कहाँ है — रेखांकित अंश है ‘सोने मिलत सुहागा’। कवि भक्त और आराध्य के मिलन का वर्णन सोने और सुहागे के मिलन की प्रसिद्ध समानता के आधार पर कर रहा है — और यही पुस्तक की परिभाषा है।

उपमा के चार अंग इस पंक्ति में इस तरह हैं —

उपमा का अंगइस पंक्ति मेंअर्थ
उपमेय (जिसकी तुलना की जाए)मोती और धागे का — यानी आराध्य और भक्त का — मेलजिस बात को समझाना है।
उपमान (जिससे तुलना की जाए)सोने में सुहागे का मिलनावह प्रसिद्ध वस्तु, जिसे सब जानते हैं।
वाचक शब्दजैसेतुलना बताने वाला शब्द — जैसे, सम, सा, ज्यों, सरिस।
साधारण धर्म (समान गुण)मिलकर निखर उठनासुहागा सोने की अशुद्धि हटाकर उसे दमका देता है; भक्ति भक्त के मन का मैल हटा देती है।
यह उपमान क्यों चुना गया: सुहागा कोई दुर्लभ चीज़ नहीं थी — हर सुनार की दुकान पर मिलती थी। रैदास स्वयं श्रम करने वाले समाज से आते हैं, इसलिए उनके उपमान भी कारीगर के काम से आते हैं। इसका फल यह है कि उनकी बात हर आदमी को तुरंत समझ आ जाती है — यही ‘लोकधर्मी’ काव्य की ताक़त है। इसी से बनी कहावत आज भी चलती है — ‘सोने पर सुहागा’।

इन्हीं दोनों पदों से उपमा के और उदाहरण —

  • जैसे चितवत चंद चकोरा।” — वाचक ‘जैसे’; उपमान चकोर-चंद्र की प्रसिद्ध जोड़ी; साधारण धर्म — अपलक निहारना।
  • “तुम सा देव ओर नहिं दूजा।” — वाचक ‘सा’। यहाँ रोचक बात यह है कि उपमान खोजा जाता है और मिलता नहीं; कवि कहता है आपके जैसा कोई है ही नहीं। ऐसी स्थिति को अनन्वय कहते हैं, जहाँ उपमेय की तुलना केवल उसी से हो सकती है।
प्र3.
“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” — उपर्युक्त रेखांकित अंश में रूपक अलंकार है। रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ रूप और गुण की अत्यधिक समानता के कारण उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित किया जाए। — इस अलंकार को समझाइए और पदों में से रूपक के और उदाहरण छाँटिए।
उत्तर

रूपक कहाँ है — रेखांकित अंश है ‘चरन कमल’। यहाँ उपमेय है ‘चरण’ और उपमान है ‘कमल’। कवि यह नहीं कहता कि चरण कमल जैसे हैं — वह चरण को कमल कह ही देता है। यही ‘उपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित करना’ है, और यही रूपक है।

रूपक और उपमा में अंतर एक वाक्य में: उपमा में दो चीज़ें अलग रहती हैं और उनके बीच ‘जैसे/सा/सम’ खड़ा रहता है; रूपक में वह बीच का शब्द हट जाता है और दोनों एक हो जाती हैं। इसीलिए ‘जैसे सोने मिलत सुहागा’ उपमा है, पर ‘चरन कमल’ रूपक।
यहाँ आरोप उचित भी है — कमल कोमल है, सुंदर है, पवित्र है और कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहता है; ये सब गुण आराध्य के चरणों पर सहज बैठते हैं। ‘रूप और गुण की अत्यधिक समानता’ का यही अर्थ है।

इन्हीं दोनों पदों से रूपक के और उदाहरण — पहला पद तो लगभग पूरा ही रूपकों से बना है, क्योंकि उसकी हर पंक्ति में बिना वाचक के सीधा आरोप है —

पंक्तिउपमेयआरोपित उपमानअभेद किस गुण के कारण
“प्रभु जी तुम चंदन हम पानीप्रभु / भक्तचंदन / पानीघुलकर एक हो जाना, गंध का समा जाना।
“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोराप्रभु / भक्तबादल / मोरआना और नाच उठना — प्रतीक्षा तथा उल्लास।
“प्रभु जी तुम दीपक, हम बातीप्रभु / भक्तदीपक / बातीदोनों के मेल से ही ज्योति बनती है।
“प्रभु जी तुम मोती, हम धागाप्रभु / भक्तमोती / धागाएक-दूसरे के बिना अधूरे; मिलकर माला।
“प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासाप्रभु / भक्तस्वामी / दासपूर्ण समर्पण, दास्य भाव।
“तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां”चरणकमलकोमलता, पवित्रता, निर्लिप्तता।
पहचानने का आसान तरीक़ा: पंक्ति में ‘जैसे’, ‘सा’, ‘सम’, ‘ज्यों’, ‘सरिस’ जैसा कोई वाचक शब्द ढूँढ़िए। मिल जाए तो उपमा; न मिले और फिर भी एक चीज़ को दूसरी कह दिया गया हो तो रूपक
प्र4.
अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर

नीचे गंगा के काव्य खंड की चारों आगे आने वाली कविताओं से उदाहरण दिए गए हैं। हर पंक्ति के साथ यह भी बताया गया है कि अलंकार काम कैसे कर रहा है — केवल नाम लिख देना पर्याप्त नहीं होता।

1. अनुप्रास अलंकार (व्यंजन वर्णों की एक से अधिक बार आवृत्ति)

कवितापंक्तिआवर्ती व्यंजन और उसका प्रभाव
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद (तुलसीदास)“सुर मुनि ाग गर ारी।”‘न’ चार बार — गिनती-सी लय बनती है, जिससे लगता है कि सचमुच सारा संसार एक साथ काँप उठा।
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद“पितु समेत कहि कहि निज ामा।”‘कहि कहि’ की पुनरुक्ति और ‘निज नामा’ में ‘न’ — राजाओं के एक-एक कर नाम बताने का दृश्य सुनाई देने लगता है।
भारति, जय, विजयकरे! (निराला)वल ार हार गले।”‘ध’ की आवृत्ति गंगा की धारा के बहाव जैसी गति देती है।
भारति, जय, विजयकरे!तमुख-तरव-मुखरे!”‘श’ की आवृत्ति और ‘शत’ की पुनरुक्ति मिलकर अनेक दिशाओं से उठती ध्वनि का प्रभाव बनाती है।
झाँसी की रानी (सुभद्रा कुमारी चौहान)“बुंदेले रबोलों के मुँह मने सुनी कहानी थी,”‘ह’ की आवृत्ति; यह टेक बार-बार लौटती है, इसलिए अनुप्रास पूरे गीत की धड़कन बन जाता है।
झाँसी की रानीकिंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,”‘क’ की आवृत्ति के साथ ‘चुपके-चुपके’ की पुनरुक्ति — विपत्ति के चुपचाप बढ़ने का प्रभाव।
घर की याद (भवानीप्रसाद मिश्र)“गिर रहा पानी झरा-झर, हिहे पत्ते रा-र, बह ही है वा सर-सर,”‘ह’ और ‘र’ की आवृत्ति; साथ में झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर जैसी ध्वन्यात्मक पुनरुक्तियाँ — बारिश सचमुच सुनाई देने लगती है।

2. उपमा अलंकार (वाचक शब्द — जैसे, सम, सा, जिमि, ज्यों — के साथ तुलना)

कवितापंक्तिउपमेय – उपमान – वाचक
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद“सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।”धनुष तोड़ने वाला (उपमेय) – सहस्रबाहु (उपमान) – ‘सम’ (वाचक)
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद“धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसारा।”शिव-धनुष (उपमेय) – साधारण धनुही (उपमान) – ‘सम’ (वाचक); यहाँ उपमा व्यंग्य का काम कर रही है।
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद“पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीरा।”परशुराम का पूछना (उपमेय) – अनजान बनकर पूछने वाला (उपमान) – ‘जिमि’ (वाचक)
झाँसी की रानी“सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,”लक्ष्मीबाई का आना (उपमेय) – बुंदेलों की विरुदावली (उपमान) – ‘सी’ (वाचक)
घर की याद“पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर,”पिता का हृदय (उपमेय) – नवनीत यानी मक्खन (उपमान) – ‘सा’ (वाचक); साधारण धर्म — कोमलता

3. रूपक अलंकार (बिना वाचक के, उपमेय में उपमान का आरोप)

कवितापंक्तिउपमेय में किस उपमान का आरोप
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवादपद सरोज मेले दोउ भाई।”चरणों में कमल (सरोज) का आरोप — ठीक ‘चरन कमल’ जैसा ही प्रयोग।
भारति, जय, विजयकरे!मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”हिमालय की श्वेत बर्फ़ पर मुकुट का आरोप — भारत माता का मुकुट।
भारति, जय, विजयकरे!“गंगा ज्योतिर्जल-कण/ धवल धार हार गले।”गंगा की उजली धारा पर गले के हार का आरोप।
भारति, जय, विजयकरे!तरु-तृण-वन-लता वसन,”वन-वनस्पति पर वस्त्र (वसन) का आरोप।
झाँसी की रानी“बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,”हथियारों पर सहेली का आरोप — बचपन की संगिनी ही तलवार है।
घर की याद“माँ कि जिसकी स्नेह-धारा का यहाँ तक भी पसारा,”स्नेह पर धारा (नदी) का आरोप — प्रेम बहता हुआ जल है।
घर की यादवज्र-भुज नवनीत-सा उर,”भुजाओं पर वज्र का आरोप। ध्यान दीजिए — इसी पंक्ति के पहले आधे में रूपक है और दूसरे आधे में उपमा।
अभ्यास का सुझाव: कोई भी पंक्ति उठाकर पहले यह देखिए कि वाचक शब्द है या नहीं — इसी से उपमा और रूपक अलग हो जाते हैं। अनुप्रास के लिए पंक्ति को ऊँची आवाज़ में पढ़िए; जो व्यंजन कान पर बार-बार पड़े, वही आवर्ती व्यंजन है।
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