गंगा अध्याय 8 सृजन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर/पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर

यह करके दिखाने वाली गतिविधि है। नीचे प्रस्तुति की पूरी योजना दी गई है, जिसे आप ज्यों-का-त्यों अपना सकते हैं।

अच्छी प्रस्तुति में क्या-क्या होना चाहिए —

  • टेक की पहचान — ‘अब कैसे छूटै राम रट लागी’ पहले पद की टेक है। हर अंतरे के बाद इसे पूरा समूह मिलकर दोहराएगा। यही पद-गायन की सबसे पहली शर्त है।
  • ठहराव सही जगह — हर पंक्ति दो चरणों में बँटी है; ठहराव ठीक बीच में लीजिए — “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी | जाकी अंग-अंग बास समानी।”
  • तुक पर ज़ोर — पानी–समानी, मोरा–चकोरा, बाती–राती, धागा–सुहागा, दासा–रैदासा। चरणांत का शब्द ज़रा खींचकर गाइए, इससे लय अपने आप बैठ जाएगी।
  • भाव के अनुसार स्वर — पहला पद प्रेम और समर्पण का है — कोमल, धीमी लय में। दूसरा पद घोषणा का है — दृढ़, थोड़ी ऊँची और स्पष्ट आवाज़ में।
  • वाद्य — हारमोनियम, ढोलक या मंजीरा; कुछ न हो तो केवल ताली से भी ताल दी जा सकती है — संत काव्य इसी तरह गाया जाता रहा है।
  • उच्चारण — ‘छूटै’, ‘बरै’, ‘तोरौ’, ‘भरोसां’ — इनका उच्चारण ठीक कीजिए, क्योंकि ब्रज के इन रूपों में ही पद की मिठास है।

नमूना प्रस्तुति-योजना (10 विद्यार्थियों का समूह, लगभग 5 मिनट):

क्रमकौनक्याकैसे
1सूत्रधार (1 विद्यार्थी)दो वाक्य की भूमिका“हम काशी के संत रैदास के दो पद प्रस्तुत कर रहे हैं। पहले पद में भक्त और आराध्य के अटूट नाते के पाँच चित्र हैं।”
2पूरा समूहटेक — “अब कैसे छूटै राम रट लागी।”धीमे से शुरू करके दोहराएँ; ताली की एक सम-ताल।
3समूह ‘क’ (3 विद्यार्थी)चंदन-पानी और घन-मोर वाली पंक्तियाँकोमल स्वर; ‘अंग-अंग’ पर हल्का ज़ोर।
4पूरा समूहटेक दोहराएँ
5समूह ‘ख’ (3 विद्यार्थी)दीपक-बाती और मोती-धागा वाली पंक्तियाँ‘दिन राती’ को खींचकर गाएँ।
6पूरा समूहअंतिम पंक्ति — “प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।”सब एक साथ, स्वर धीरे-धीरे धीमा करते हुए।
7समूह ‘ग’ (3 विद्यार्थी)दूसरा पद — सस्वर पाठ (गायन नहीं)दृढ़, स्पष्ट आवाज़; ‘मैं नहिं तोरौ’ पर सबसे अधिक बल।
8सूत्रधारसमापन“मन क्रम वचन कहै रैदासा — यानी मन, कर्म और वचन तीनों से यही बात। धन्यवाद।”
तैयारी का सुझाव: प्रस्तुति से पहले पूरे समूह के साथ पद को तीन बार बिना गाए पढ़िए — केवल लय पकड़ने के लिए। जब सबकी साँस एक जगह रुकने लगे, तभी गाना शुरू कीजिए।
प्र2.
2. कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।
उत्तर

अच्छे संवाद-लेखन में क्या होना चाहिए —

  • पद की अपनी उपमाएँ ही आधार बनें — चंदन-पानी, घन-मोर, चंद-चकोर, दीपक-बाती, मोती-धागा, सोना-सुहागा, स्वामी-दास।
  • दोनों पात्रों की भाषा अलग सुनाई दे — भक्त की भाषा में विनम्रता और आग्रह, आराध्य की भाषा में स्नेह और शांत आश्वासन।
  • संवाद कहीं भाषण न बन जाए — छोटे-छोटे वाक्य, आमने-सामने की बात।
  • अंत में पद का मूल भाव निकलकर आए — यह नाता तोड़ा नहीं जा सकता।

नमूना उत्तर:

(संध्या का समय। एक छोटा-सा आँगन। कोने में दीया जल रहा है। भक्त हाथ जोड़े बैठा है; भीतर से एक शांत स्वर उत्तर देता है।)

भक्त — प्रभु जी! आज मन बहुत भारी है। लोग कहते हैं, तीर्थ किए बिना भक्ति पूरी नहीं होती।

आराध्य — और तुम्हारा मन क्या कहता है?

भक्त — मेरा मन तो बस एक ही बात जानता है — जहाँ-जहाँ मैं जाता हूँ, वहीं आप मिल जाते हैं। फिर मैं आपको ढूँढ़ने कहाँ जाऊँ?

आराध्य — तो फिर अंदेसा किस बात का, रैदास?

भक्त — अंदेसा नहीं है, प्रभु। बस एक डर है — कहीं आप मुझसे नाता न तोड़ लें।

आराध्य — (हँसकर) और यदि तोड़ लूँ?

भक्त — तो भी मैं नहीं तोड़ूँगा। आपसे तोड़कर जोड़ूँगा भी किससे? आप चंदन हैं, मैं पानी। चंदन घिस चुका, सुगंध मेरे अंग-अंग में समा चुकी। अब पानी को चंदन से अलग कैसे करेंगे?

आराध्य — तुम्हारी बात में सचमुच सुगंध है।

भक्त — आप घन हैं, मैं मोर। बादल घिरते हैं तो पंख अपने आप खुल जाते हैं — मैंने कब नाचना सीखा था? और चकोर से पूछिए, वह चाँद को क्यों देखता है। वह उत्तर नहीं देगा, बस देखता रहेगा।

आराध्य — पर मोर को बादल हर दिन नहीं मिलते, और चकोर को चाँद कभी नहीं मिलता।

भक्त — इसीलिए तो प्रेम बचा हुआ है, प्रभु। मिलने में तृप्ति है, न मिलने में प्रतीक्षा — और प्रतीक्षा भी तो आपकी ही है।

आराध्य — तुम अपने को इतना छोटा क्यों कहते हो — पानी, बाती, धागा?

भक्त — छोटा कहाँ कहा, प्रभु! आप दीपक हैं, मैं बाती — पर ज्योति तो हम दोनों के मिलने से बनी है। आप मोती हैं, मैं धागा — मोती बिखरे न रहें, इसलिए धागा चाहिए। मैंने अपने को छोटा नहीं, ज़रूरी कहा है।

आराध्य — (स्नेह से) और यह सुहागे वाली बात?

भक्त — वह सुनार से सीखी है, प्रभु। सोने में सुहागा पड़ता है तो मैल जल जाता है और सोना दमक उठता है। आपका नाम मेरे मन में पड़ा, तो मेरा मैल भी वैसे ही जल गया।

आराध्य — तो अब क्या चाहिए?

भक्त — कुछ नहीं। बस इतना कि यह रट लगी रहे। आप स्वामी हैं, मैं दास — और दास की सबसे बड़ी कमाई यही है कि उसका स्वामी कभी बदले नहीं।

आराध्य — (धीमे से) रैदास, जो मुझे मन, कर्म और वचन — तीनों से पुकारता है, उसे मुझे ढूँढ़ना नहीं पड़ता। मैं पहले से वहीं होता हूँ।

(दीये की लौ एक बार काँपकर स्थिर हो जाती है। भक्त सिर झुकाए बैठा रहता है।)

अपना संवाद लिखते समय: हर उपमा को एक-एक संवाद दीजिए, सब एक साथ मत ठूँसिए। और आराध्य से कोई चमत्कार मत करवाइए — इन पदों की सुंदरता चमत्कार में नहीं, सहजता में है।
प्र3.
3. “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।
उत्तर

अच्छी लघुकथा में क्या होना चाहिए —

  • एक ही घटना और दो-तीन से अधिक पात्र नहीं। लघुकथा उपन्यास नहीं, एक झलक है।
  • पंक्ति का भाव घटना से निकले, उपदेश से नहीं — यानी कोई पात्र यह कहे नहीं कि ‘मित्रता महान होती है’, बल्कि करके दिखा दे।
  • अंत में मोड़ हो, जो पाठक को ठहरा दे।
  • शीर्षक ऐसा हो जो कथा खोले नहीं, बस इशारा करे।

नमूना उत्तर:

शीर्षक — एक तरफ़ा

दसवीं की परीक्षा से ठीक तीन महीने पहले हरिया के पिता का देहांत हो गया।

वह लड़का, जो कक्षा में सबसे आगे बैठता था, अब सबसे पीछे बैठने लगा। पहले वह उत्तर देने के लिए हाथ उठाता था; अब वह खिड़की से बाहर देखता रहता। एक दिन वह स्कूल आया ही नहीं। दूसरे दिन भी नहीं। तीसरे दिन मास्टर जी ने हाज़िरी में उसका नाम पुकारना बंद कर दिया।

सोमू उसके पीछे-पीछे उसके घर तक गया।

“अब मैं नहीं पढ़ूँगा,” हरिया ने बिना देखे कहा। “दुकान पर बैठना है। और तू भी अब मेरे घर मत आया कर। मेरे साथ रहने से तेरा भी नुकसान होगा।”

“मुझे नुकसान की चिंता होती, तो पहले दिन ही न आता,” सोमू बोला।

“मैं कह रहा हूँ न — अब हमारी दोस्ती ख़त्म।”

सोमू कुछ देर चुप रहा। फिर उसने अपना बस्ता ज़मीन पर रखा और बोला, “तूने तोड़ ली होगी। मैंने नहीं तोड़ी।”

“ऐसे कैसे नहीं तोड़ी?”

“तोड़कर जोड़ूँगा किससे?” सोमू ने कंधे उचकाए। “तेरे जैसा दूसरा कौन है?”

उस दिन के बाद सोमू रोज़ शाम को दुकान पर आने लगा। वह ग्राहक के जाते ही तख़्त पर कॉपी खोल देता और दिन-भर की पढ़ाई ऊँची आवाज़ में दोहराता। हरिया सुनता, कभी-कभी बीच में टोक देता — “यह ग़लत है, दुबारा पढ़।” फिर एक दिन उसने ख़ुद कॉपी माँग ली।

परीक्षा में दोनों बैठे। परिणाम आया तो हरिया के अंक सोमू से चार अधिक थे।

“देख, मैं जीत गया,” हरिया हँसा।

“मैं तो पहले ही जीत चुका था,” सोमू ने कहा, “जिस दिन तूने दोस्ती तोड़ी थी और मैंने नहीं तोड़ी।”

यह लघुकथा पंक्ति से कैसे जुड़ती है: रैदास कहते हैं — “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” कहानी में सोमू ठीक यही करता है। हरिया नाता तोड़ता है, पर सोमू नहीं तोड़ता; और उसका तर्क भी वही है जो रैदास का है — तोड़कर जोड़ूँगा किससे? इस तरह भक्ति का भाव मित्रता के धरातल पर उतर आता है: सच्चा रिश्ता वही है जो दूसरे के व्यवहार पर निर्भर न हो
अपनी कथा लिखते समय: कोई ऐसा क्षण चुनिए जहाँ एक मित्र दूसरे को छोड़ने का कारण दे रहा हो — बीमारी, ग़रीबी, बदनामी, स्थान-परिवर्तन। असली परीक्षा वहीं होती है। और अंतिम वाक्य ऐसा रखिए जो कहानी को समझाए नहीं, बस बंद कर दे।
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