गंगा अध्याय 8 व्याकरण की बात

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर

संज्ञा के तीन उदाहरण — राम, चंदन, दीपक
सर्वनाम के तीन उदाहरण — तुम, हम, मैं

नीचे इन्हें पद की पंक्ति के साथ और भेद बताकर दिया गया है, ताकि पहचान का आधार भी स्पष्ट हो जाए —

संज्ञा (किसी व्यक्ति, वस्तु, स्थान या भाव का नाम) —

संज्ञापद की पंक्तिभेद
राम“अब कैसे छूटै राम रट लागी।”व्यक्तिवाचक संज्ञा
चंदन“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी”जातिवाचक संज्ञा
दीपक“प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती”जातिवाचक संज्ञा
मोती“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा”जातिवाचक संज्ञा
रैदास“ऐसी भगति करै रैदासा।”व्यक्तिवाचक संज्ञा
भगति (भक्ति)“ऐसी भगति करै रैदासा।”भाववाचक संज्ञा
तीरथ / बरत“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”जातिवाचक संज्ञा

सर्वनाम (संज्ञा के स्थान पर आने वाला शब्द) —

सर्वनामपद की पंक्तिभेद
तुम“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी”पुरुषवाचक — मध्यम पुरुष
हम“प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती”पुरुषवाचक — उत्तम पुरुष
मैं“मैं अपनो मन हरि से जोरौ”पुरुषवाचक — उत्तम पुरुष
जो“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ”संबंधवाचक सर्वनाम
कवन (कौन)“तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।”प्रश्नवाचक सर्वनाम
अपनो (अपना)“मैं अपनो मन हरि से जोरौ”निजवाचक सर्वनाम
जाकी (जिसकी)“जाकी अंग-अंग बास समानी।”संबंधवाचक सर्वनाम
पहचानने का तरीक़ा: जिस शब्द के आगे ‘का/की/के’ लगाकर या ‘कौन-सा?’ पूछकर कोई नाम मिल जाए, वह संज्ञा है। और जो शब्द किसी नाम की जगह खड़ा हो — जैसे ‘रैदास’ की जगह ‘मैं’, ‘प्रभु’ की जगह ‘तुम’ — वह सर्वनाम है। इन पदों में यह बात बहुत साफ़ दिखती है: पहली पंक्ति में नाम ‘राम’ आता है, फिर पूरे पद में उसी के लिए ‘तुम’ चलता रहता है।
प्र2.
2. रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए। — मोरा, चकोरा, बाती, राती, सोने, तीरथ, बरत
उत्तर

ये सातों शब्द रैदास की ब्रज-मिश्रित सधुक्कड़ी भाषा के रूप हैं। आज मानक हिंदी में और हमारी बोलचाल में इनके स्थान पर दूसरे शब्द चलते हैं। नीचे तालिका में तीनों रूप दिए गए हैं —

पद का शब्दपद में अर्थमानक हिंदी मेंबोलचाल / आस-पास के प्रयोग
मोरामोर पक्षीमोरमयूर, मोरा, मोरवा (अवधी-भोजपुरी में), पंख वाला नाचने वाला पक्षी
चकोरातीतर की जाति का पक्षी, जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता हैचकोरचकोर पंछी; कहीं-कहीं इसे ‘चकवा’ से भ्रमित कर लिया जाता है, पर वह अलग पक्षी है
बातीदीये की बत्तीबत्तीबाती, रूई की बत्ती, दीये की बत्ती, दीपक की लौ वाली बत्ती; आज ‘बत्ती’ बिजली के बल्ब के लिए भी बोला जाता है
रातीरातरातरात्रि, रैन, रतिया, रात-भर, ‘दिन-रात’ (जैसे पद में ‘दिन राती’)
सोनेस्वर्ण धातुसोनास्वर्ण, कंचन, कनक, गोल्ड; गाँवों में गहनों के लिए ‘पीली धातु’ भी कहा जाता है
तीरथपुण्य स्थान, जहाँ पूजा-स्नान के लिए जाया जाता हैतीर्थतीर्थस्थान, तीर्थयात्रा, धाम, चारधाम, ‘दरसन करने जाना’
बरतउपवास, संकल्पव्रतउपवास, फलाहार, ‘बरत रखना’, ‘निर्जला’, ‘रोज़ा’ (उर्दू से)
इससे क्या समझ में आता है: ध्यान दीजिए कि ये सब शब्द आज भी पूरी तरह अजनबी नहीं लगते — ‘बाती’, ‘राती’, ‘तीरथ’, ‘बरत’ आज भी गाँव-घर में सुनाई देते हैं। इसका अर्थ है कि रैदास ने जान-बूझकर ऐसी भाषा चुनी जो कोश की नहीं, बोलने वालों की भाषा थी — और इसीलिए वह पाँच सौ साल बाद भी जीवित है। यही ‘सरल और लोकधर्मी भाषा’ है।
ध्यान दीजिए: ‘राती’ जैसा रूप केवल पुराना नहीं है — वह तुक के काम भी आता है (‘बाती – राती’)। यदि कवि ‘रात’ लिखते तो तुक टूट जाती। इसलिए पद में शब्द-रूप का चुनाव अर्थ के साथ-साथ लय से भी तय होता है।
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