रैदास और कबीर — दोनों 15वीं शताब्दी के आस-पास के, दोनों काशी से जुड़े, दोनों श्रम करने वाले समाज से। दोनों ने एक ही बात कही: भगवान तक पहुँचने के लिए न मंदिर चाहिए, न तीर्थ, न पुरोहित — केवल सच्चा मन चाहिए। यह बात हवा में नहीं आई; उस समय की परिस्थितियों ने इसे जन्म दिया। मुख्य कारण ये हो सकते हैं —
1. जाति-व्यवस्था और मंदिर-प्रवेश पर रोक। यह सबसे बड़ा कारण है। उस समय समाज जाति के खाँचों में बँटा था और तथाकथित ‘नीची’ जातियों के लोगों को मंदिर, तीर्थ, शास्त्र-पाठ और कर्मकांड से दूर रखा जाता था। रैदास स्वयं चर्मकार परिवार से थे। जिस भक्त को मंदिर के भीतर जाने ही न दिया जाए, उसके लिए भक्ति का एक ही रास्ता बचता है — भीतर का रास्ता। इसीलिए वे कहते हैं — “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।” निराकार ईश्वर की सबसे बड़ी बात यही है कि उसका कोई द्वारपाल नहीं होता।
2. कर्मकांड का बढ़ जाना और भक्ति का खर्चीला हो जाना। तीर्थ-यात्रा में समय, धन और साधन लगते थे; व्रत-पूजा में सामग्री और पुरोहित लगते थे। जो किसान, बुनकर, चर्मकार या मज़दूर दिन-भर श्रम करता था, उसके पास ये सब नहीं थे। संत कवियों ने भक्ति को मुफ़्त और सुलभ बना दिया — नाम-स्मरण के लिए न धन चाहिए, न जगह, न अनुमति। “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा” — यह पंक्ति उस पूरी व्यवस्था का उत्तर है।
3. धर्म में दिखावा बढ़ जाना। बाहरी क्रियाएँ इतनी बढ़ गई थीं कि धर्म का असली अर्थ पीछे छूट गया था। इसीलिए रैदास ने ‘बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता और आंतरिक भक्ति को ही सच्चा धर्म माना’ (पाठ की भूमिका), और कबीर ने भी बाहरी पूजा-पद्धति के दिखावे पर तीखी चोट की। ‘मन क्रम वचन’ की कसौटी इसी दिखावे के विरुद्ध खड़ी की गई है।
4. समाज में समता की माँग। निराकार ईश्वर की कल्पना अपने आप में एक सामाजिक विचार है। यदि ईश्वर का कोई रूप नहीं, तो उसका कोई एक मंदिर नहीं; और यदि उसका कोई एक मंदिर नहीं, तो वहाँ ऊँच-नीच का कोई नियम भी नहीं। इसीलिए रैदास की रचनाएँ ‘आज भी समानता, प्रेम और भाईचारे का संदेश देती हैं’। भक्ति यहाँ केवल पूजा नहीं, बराबरी का दावा बन जाती है।
5. दो धाराओं का मेल — भक्ति और सूफ़ी। उस दौर में दक्षिण भारत से चली भक्ति की लहर उत्तर भारत तक पहुँच चुकी थी, और साथ ही सूफ़ी संतों की प्रेम-साधना भी लोकप्रिय हो रही थी। दोनों में एक बात समान थी — ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता प्रेम है, कर्मकांड नहीं। इस मेल ने निर्गुण संत काव्य को मज़बूत आधार दिया। यही कारण है कि रैदास की रचनाएँ आगे चलकर आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में भी शामिल हुईं।
6. लोकभाषा का उभार। संस्कृत कुछ ही लोगों की भाषा थी। संत कवियों ने ब्रज, अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों से बनी सधुक्कड़ी भाषा अपनाई, जिसे रास्ते चलता आदमी समझ सकता था। जब भाषा सबकी हो गई, तो भक्ति भी सबकी हो गई।