कक्षा ९ हिंदी अध्याय 10 भारति, जय, विजयकरे! के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-19

इस अध्याय के बारे में

रचनाकार — सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल में हुआ। वे मूलतः गढ़ाकोला (उन्नाव), उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उनकी औपचारिक शिक्षा नौवीं तक महिषादल में ही हुई और आगे का सारा ज्ञान उन्होंने स्वाध्याय से अर्जित किया — संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेज़ी तीनों भाषाएँ उन्होंने स्वयं पढ़कर सीखीं। यही स्वाध्याय इस कविता की संस्कृतनिष्ठ शब्दावली में साफ़ दिखाई देता है। उनका निधन सन् 1961 में हुआ। रचना-संसार — निराला की प्रमुख काव्य रचनाएँ हैं — अनामिका , परिमल , गीतिका , कुकुरमुत्ता और नए पत्ते । उपन्यास, कहानी, आलोचना और निबंध लेखन में भी उनकी ख्याति अविस्मरणीय है। निराला रचनावली के आठ खंडों में उनका संपूर्ण साहित्य प्रकाशित है। उनकी रचनाओं में दार्शनिकता, विद्रोह, क्रांति, प्रेम की तरलता और प्रकृति का विराट तथा उदात्त चित्र उपस्थित है। छायावादी रचनाकारों में सबसे पहले मुक

त्वरित पुनरावृत्ति
शब्दअर्थपाठ की पंक्तिअपने वाक्य में प्रयोग
भारति / भारतीसरस्वती, वाणी, वाणी की अधिष्ठात्री, भारतमाता“भारति, जय, विजयकरे!”भारति की वंदना से विद्यालय का वार्षिकोत्सव आरंभ हुआ।
विजयकरेहे विजय करने वाली! (संबोधन)“भारति, जय, विजयकरे!”हे विजयकरे! तेरे बच्चे कभी हार नहीं मानते।
कनकसोना, पलाश, चंपा“कनक-शस्य-कमलधरे!”पकी फ़सल खेतों में कनक-सी दमक रही थी।
शस्यफसल, खेती, अन्न, धान्य, वृक्षों का फल, नई घास, कोमल तृण, सद्गुण“कनक-शस्य-कमलधरे!”वर्षा अच्छी हुई, इसलिए इस बार शस्य भरपूर है।
कमलधरेहे कमल को धारण करने वाली! (संबोधन)“कनक-शस्य-कमलधरे!”कमलधरे लक्ष्मी की प्रतिमा मंदिर में स्थापित है।
पदतलतलवा, पैरों के नीचे“लंका पदतल शतदल,”थके पथिक के पदतल में काँटा चुभ गया।
शतदलकमल“लंका पदतल शतदल,”तालाब में खिला शतदल भोर में और सुंदर लगता है।
गर्जितोर्मि / गर्जिबादलों का गर्जन, गरजती तरंगों का“गर्जितोर्मि सागर-जल”तूफ़ान में गर्जितोर्मि सागर देखते ही डर लगने लगा।
शुचिपवित्र, शुद्ध, निर्मल, साफ, निश्छल, निष्कपट, श्वेत, उजला“धोता शुचि चरण युगल”माँ का मन शुचि है, इसीलिए उसकी बात लगती है।
युगलजोड़ा, युग्म“धोता शुचि चरण युगल”मंच पर नृत्य करता युगल सबका ध्यान खींच रहा था।
स्तवप्रशंसा, स्तुति और स्तोत्र, एक पदार्थ“स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!”प्रभात-वेला में मंदिर से स्तव की ध्वनि आ रही थी।
तरुवृक्ष, पेड़“तरु-तृण-वन-लता वसन,”आँगन का पुराना तरु आज भी छाया देता है।
तृणतिनका, घास, खर-पात“तरु-तृण-वन-लता वसन,”चींटी अपने से बड़े तृण को खींचकर ले जा रही थी।
लताजमीन या किसी आधार पर फैलने वाला पौधा, वल्लरी, बेल“तरु-तृण-वन-लता वसन,”लता दीवार पर चढ़कर पूरी छत तक फैल गई।
वसनवस्त्र, आवरण, निवास, मूर्ति, प्रतिमा“तरु-तृण-वन-लता वसन,”श्वेत वसन पहने वह भीड़ में अलग ही दिख रही थी।
अंचलदेश का प्रांत-भाग, आँचल, कोना, तट, किनारा, वस्त्र का छोर“अंचल में खचित सुमन;”पहाड़ी अंचल में इस बार समय से पहले बर्फ़ गिरी।
खचितचिह्नित, अंकित, जड़ा हुआ, आबद्ध“अंचल में खचित सुमन;”रत्नों से खचित मुकुट संग्रहालय में रखा है।
सुमनपुष्प, फूल, गेहूँ, मनोहर, सुंदर“अंचल में खचित सुमन;”बगीचे के सुमन देखकर मन प्रसन्न हो गया।
ज्योतिर्जल / ज्योतिस्प्रकाश, रोशनी, लौ, सूर्य, नक्षत्र, अग्नि“गंगा ज्योतिर्जल-कण”भोर की धूप में नदी का ज्योतिर्जल चमक उठा।
धवलसफेद, श्वेत, स्वच्छ, निर्मल, सुंदर“धवल धार हार गले।”हिमालय की धवल चोटियाँ दूर से ही दिखाई देती हैं।
धारजोर की वर्षा, धारा के रूप में बरसना“धवल धार हार गले।”पहाड़ से गिरती धार का शोर दूर तक सुनाई देता था।
मुकुटसिर पर धारण किया जाने वाला राजचिह्न“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”विजेता खिलाड़ी के सिर पर मुकुट रख दिया गया।
शुभ्रउज्ज्वल, चमकीला, सफेद, श्वेतवर्ण, सफेद रंग, चाँदी“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”शरद की रात में शुभ्र चाँदनी आँगन तक उतर आई।
हिमशीतल बर्फ, पाला, हिमालय पर्वत, चंदन, चंद्रमा“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”हिम से ढकी घाटी में रास्ता ढूँढ़ना कठिन था।
तुषारबर्फ, हिम, हवा में मिली भाप जो जमकर श्वेत कणों के रूप में पृथ्वी पर गिरती है“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”सुबह खेतों पर तुषार की पतली परत जमी थी।
प्राणवायु, साँस, बल, जीवन“प्राण प्रणव ओंकार,”मातृभाषा किसी भी संस्कृति के प्राण होती है।
प्रणवओंकार, परमेश्वर, ढोल“प्राण प्रणव ओंकार,”ध्यान का आरंभ प्रणव के उच्चारण से होता है।
ओंकार‘ओम्’ मंत्र या इसका उच्चारण, आरंभ“प्राण प्रणव ओंकार,”सभागार में ओंकार की गूँज देर तक बनी रही।
उदारदानशील, दयालु“ध्वनित दिशाएँ उदार,”उदार मन वाला व्यक्ति छोटी बातों पर नहीं अटकता।
ध्वनितगूँजता हुआ, ध्वनि से भरा“ध्वनित दिशाएँ उदार,”विजय के नारों से पूरा मैदान ध्वनित हो उठा।
शतमुखसौ मुख“शतमुख-शतरव-मुखरे!”शतमुख वाणी में भारत की अनेक बोलियाँ एक साथ बोलती हैं।
शतरवसौ की संख्या में ध्वनि, शब्द शोर, गुँजार“शतमुख-शतरव-मुखरे!”मेले का शतरव दूर गली तक सुनाई दे रहा था।
मुखरे / मुखरबजता, शब्द करता हुआ, शोर करने वाला“शतमुख-शतरव-मुखरे!”अन्याय के विरुद्ध उसकी चुप्पी अब मुखर हो गई है।
  1. कविता
  2. मेरे उत्तर मेरे तर्क
  3. अर्थ और भाव
  4. मेरी समझ मेरे विचार
  5. कविता का सौंदर्य
  6. विषयों से संवाद
  7. विविध रंग भारत के
  8. सृजन
  9. व्याकरण की बात
  10. मातृभाषा और भाव
  11. समास
  12. अलंकार
  13. गतिविधियाँ
  14. भाषा संगम
  15. झरोखे से
  16. खोजबीन
क्या यह उपयोगी रहा?