पहले ‘चित्रात्मक भाषा’ को समझ लीजिए — चित्रात्मक भाषा वह है जिसे पढ़ते ही आँखों के सामने चित्र बन जाए। दी गई पंक्तियों में कवि ने कोई व्याख्या नहीं की, केवल दो नाम रखे — सोने जैसी फ़सल और कमल — और भारतभूमि का पूरा दृश्य खड़ा हो गया: लहलहाते सुनहरे खेत, और उन्हें धारण किए एक देवी। कवि बताता नहीं, दिखाता है — यही चित्रात्मकता है।
अब पुस्तक की तालिका, पूरी भरी हुई —
| विशेषताएँ | कविता की पंक्तियाँ |
|---|---|
| प्रकृति का मानवीकरण | “गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल” “ध्वनित दिशाएँ उदार,” |
| आलंकारिक प्रयोग | “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,” (रूपक) “शतमुख-शतरव-मुखरे!” (अनुप्रास) “गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।” (रूपक + अनुप्रास) |
| समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग | “कनक-शस्य-कमलधरे!” “तरु-तृण-वन-लता वसन,” “शतमुख-शतरव-मुखरे!” |
| संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग | “धोता शुचि चरण युगल / स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!” “प्राण प्रणव ओंकार,” “अंचल में खचित सुमन;” |
हर पंक्ति क्यों चुनी गई —
प्रकृति का मानवीकरण — “गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल”। मानवीकरण वहाँ होता है जहाँ जड़ या निर्जीव वस्तु मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगे। यहाँ समुद्र केवल टकरा नहीं रहा — वह चरण धो रहा है, जो मनुष्य का, और वह भी आदर-भाव से भरा हुआ, काम है। ध्यान दीजिए, पूरी कविता में यही एकमात्र स्पष्ट क्रिया है — ‘धोता’ — और वह प्रकृति को ही दी गई है।
दूसरा उदाहरण: “ध्वनित दिशाएँ उदार,” — दिशाएँ बोलती भी हैं और ‘उदार’ यानी दानशील भी हैं। ये दोनों मनुष्य के गुण हैं।आलंकारिक प्रयोग — “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,” और “शतमुख-शतरव-मुखरे!”। ये दोनों पुस्तक के अपने उदाहरण हैं (पृष्ठ 172) — पहली में रूपक (हिमालय पर मुकुट का अभेद आरोप) और दूसरी में अनुप्रास (‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति)। तीसरा उदाहरण “गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।” है, जिसमें एक साथ दोनों अलंकार हैं — गंगा-धारा पर हार का आरोप (रूपक) और ‘धवल धार हार’ में ‘ध’ की आवृत्ति (अनुप्रास)।
समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग — “कनक-शस्य-कमलधरे!”, “तरु-तृण-वन-लता वसन,”, “शतमुख-शतरव-मुखरे!”। ये तीनों पंक्तियाँ इसलिए चुनी गईं कि इनमें दो-दो, तीन-तीन शब्द जुड़कर एक पद बन गए हैं — ‘कनक-शस्य’ (कनक के समान शस्य), ‘कमलधरे’ (कमल को धारण करने वाली), ‘तरु-तृण-वन-लता’ (द्वंद्व समास — तरु, तृण, वन और लता), ‘शतमुख’ (सौ मुख वाली), ‘शतरव’ (सौ ध्वनियाँ)। पुस्तक स्वयं कहती है कि ‘कनक-शस्य’ और ‘कमलधरा’ समस्त पद/सामासिक पद हैं (पृष्ठ 171)।
और उदाहरण: ‘गर्जितोर्मि’, ‘सागर-जल’, ‘बहु-अर्थ-भरे’, ‘ज्योतिर्जल-कण’, ‘हिम-तुषार’।संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग — “धोता शुचि चरण युगल / स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!”। इन दो चरणों में ‘धोता’ को छोड़कर हर शब्द तत्सम है — शुचि, चरण, युगल, स्तव, अर्थ। ‘प्राण प्रणव ओंकार,’ में तीनों शब्द संस्कृत के हैं और तीनों दर्शन की शब्दावली से आए हैं। ‘अंचल में खचित सुमन;’ में ‘खचित’ और ‘सुमन’ ऐसे शब्द हैं जो आज बोलचाल में लगभग नहीं आते — इसीलिए पुस्तक को दो पृष्ठों की शब्द-संपदा देनी पड़ी।