गंगा अध्याय 10 कविता का सौंदर्य

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दी गई पंक्तियों को पढ़िए — “भारति, जय, विजयकरे! कनक-शस्य-कमलधरे!” — इन पंक्तियों में कवि ने चित्रात्मक भाषा का प्रयोग करते हुए भारतभूमि का मनोरम चित्र प्रस्तुत किया है। इस कविता की कुछ अन्य विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता में से उन विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए— प्रकृति का मानवीकरण / आलंकारिक प्रयोग / समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग / संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग
उत्तर

पहले ‘चित्रात्मक भाषा’ को समझ लीजिए — चित्रात्मक भाषा वह है जिसे पढ़ते ही आँखों के सामने चित्र बन जाए। दी गई पंक्तियों में कवि ने कोई व्याख्या नहीं की, केवल दो नाम रखे — सोने जैसी फ़सल और कमल — और भारतभूमि का पूरा दृश्य खड़ा हो गया: लहलहाते सुनहरे खेत, और उन्हें धारण किए एक देवी। कवि बताता नहीं, दिखाता है — यही चित्रात्मकता है।

अब पुस्तक की तालिका, पूरी भरी हुई —

विशेषताएँकविता की पंक्तियाँ
प्रकृति का मानवीकरण“गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल”
“ध्वनित दिशाएँ उदार,”
आलंकारिक प्रयोग“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,” (रूपक)
“शतमुख-शतरव-मुखरे!” (अनुप्रास)
“गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।” (रूपक + अनुप्रास)
समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग“कनक-शस्य-कमलधरे!”
“तरु-तृण-वन-लता वसन,”
“शतमुख-शतरव-मुखरे!”
संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग“धोता शुचि चरण युगल / स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!”
“प्राण प्रणव ओंकार,”
“अंचल में खचित सुमन;”

हर पंक्ति क्यों चुनी गई —

  1. प्रकृति का मानवीकरण — “गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल”। मानवीकरण वहाँ होता है जहाँ जड़ या निर्जीव वस्तु मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगे। यहाँ समुद्र केवल टकरा नहीं रहा — वह चरण धो रहा है, जो मनुष्य का, और वह भी आदर-भाव से भरा हुआ, काम है। ध्यान दीजिए, पूरी कविता में यही एकमात्र स्पष्ट क्रिया है — ‘धोता’ — और वह प्रकृति को ही दी गई है।
    दूसरा उदाहरण: “ध्वनित दिशाएँ उदार,” — दिशाएँ बोलती भी हैं और ‘उदार’ यानी दानशील भी हैं। ये दोनों मनुष्य के गुण हैं।

  2. आलंकारिक प्रयोग — “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,” और “शतमुख-शतरव-मुखरे!”। ये दोनों पुस्तक के अपने उदाहरण हैं (पृष्ठ 172) — पहली में रूपक (हिमालय पर मुकुट का अभेद आरोप) और दूसरी में अनुप्रास (‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति)। तीसरा उदाहरण “गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।” है, जिसमें एक साथ दोनों अलंकार हैं — गंगा-धारा पर हार का आरोप (रूपक) और ‘वल ार हार’ में ‘ध’ की आवृत्ति (अनुप्रास)।

  3. समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग — “कनक-शस्य-कमलधरे!”, “तरु-तृण-वन-लता वसन,”, “शतमुख-शतरव-मुखरे!”। ये तीनों पंक्तियाँ इसलिए चुनी गईं कि इनमें दो-दो, तीन-तीन शब्द जुड़कर एक पद बन गए हैं — ‘कनक-शस्य’ (कनक के समान शस्य), ‘कमलधरे’ (कमल को धारण करने वाली), ‘तरु-तृण-वन-लता’ (द्वंद्व समास — तरु, तृण, वन और लता), ‘शतमुख’ (सौ मुख वाली), ‘शतरव’ (सौ ध्वनियाँ)। पुस्तक स्वयं कहती है कि ‘कनक-शस्य’ और ‘कमलधरा’ समस्त पद/सामासिक पद हैं (पृष्ठ 171)।
    और उदाहरण: ‘गर्जितोर्मि’, ‘सागर-जल’, ‘बहु-अर्थ-भरे’, ‘ज्योतिर्जल-कण’, ‘हिम-तुषार’।

  4. संस्कृतनिष्ठ भाषा प्रयोग — “धोता शुचि चरण युगल / स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!”। इन दो चरणों में ‘धोता’ को छोड़कर हर शब्द तत्सम है — शुचि, चरण, युगल, स्तव, अर्थ। ‘प्राण प्रणव ओंकार,’ में तीनों शब्द संस्कृत के हैं और तीनों दर्शन की शब्दावली से आए हैं। ‘अंचल में खचित सुमन;’ में ‘खचित’ और ‘सुमन’ ऐसे शब्द हैं जो आज बोलचाल में लगभग नहीं आते — इसीलिए पुस्तक को दो पृष्ठों की शब्द-संपदा देनी पड़ी।

इन चारों विशेषताओं का आपस में संबंध: ये चार अलग-अलग बातें नहीं हैं, एक ही शैली के चार पक्ष हैं। संस्कृतनिष्ठ शब्द गरिमा देते हैं, समास उन्हें कस देता है (चार शब्दों की बात एक पद में आ जाती है), अलंकार उसमें ध्वनि और चित्र भरते हैं, और मानवीकरण भारत को जीवित कर देता है। इन चारों के मेल से जो बनता है, उसे काव्यशास्त्र में ओज गुण कहते हैं — वही गुण जो किसी वंदना या जयघोष के लिए चाहिए।
तालिका भरते समय ध्यान रखें: हर विशेषता के लिए पूरी पंक्ति लिखिए, केवल शब्द नहीं — क्योंकि विशेषता पंक्ति में सिद्ध होती है। और यथासंभव अलग-अलग पंक्तियाँ चुनिए; एक ही पंक्ति चारों जगह लिख देने से उत्तर कमज़ोर लगेगा (यद्यपि इस कविता की कई पंक्तियों में एक साथ तीन-तीन विशेषताएँ मौजूद हैं)।
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