गंगा अध्याय 10 विषयों से संवाद

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. स्वतंत्रता-पूर्व लिखी इस कविता में भारत को ज्ञान, कृषि और संस्कृति के प्रतीक/परिचायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वर्तमान संदर्भ में यदि आपको भारत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले तो आप भारत की किन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करेंगे?
उत्तर

पहले यह देख लीजिए कि निराला ने क्या-क्या रखा था — ज्ञान (‘प्राण प्रणव ओंकार’), कृषि (‘कनक-शस्य’), प्रकृति (‘तरु-तृण-वन-लता’, ‘गंगा’, ‘हिम-तुषार’) और अनेक स्वर (‘शतमुख-शतरव-मुखरे’)। ये आज भी सच हैं, इसलिए इन्हें हटाना नहीं है — इनमें जोड़ना है। आज का भारत वह भी है जो 1947 के बाद बना।

अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए —

  • कम-से-कम पाँच-छह क्षेत्र चुने जाएँ, और हर एक के साथ एक ठोस उदाहरण हो — केवल ‘भारत महान है’ जैसा वाक्य नहीं।
  • विशेषताएँ और विविधताएँ — दोनों आएँ, क्योंकि प्रश्न दोनों माँग रहा है।
  • उपलब्धियों के साथ-साथ मूल्य भी आएँ — लोकतंत्र, समानता, सहअस्तित्व।
  • अंत में यह भी कहा जाए कि किन चुनौतियों को नहीं छिपाना चाहिए — ईमानदार प्रस्तुति ही अच्छी प्रस्तुति है।

नमूना उत्तर:

यदि मुझे आज भारत को नए रूप में प्रस्तुत करने का अवसर मिले, तो मैं उसे ‘पुरानी जड़ों वाला नया वृक्ष’ कहकर प्रस्तुत करूँगा — जड़ें वही, शाखाएँ नई। मैं इन विशेषताओं और विविधताओं को सम्मिलित करूँगा —

क्षेत्रक्या सम्मिलित करूँगाक्यों
लोकतंत्रसंविधान, हर पाँच वर्ष में होने वाला विशाल चुनाव, वयस्क मताधिकारभारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। करोड़ों लोगों का शांतिपूर्वक अपनी सरकार चुनना अपने आप में एक उपलब्धि है।
विज्ञान और अंतरिक्षचंद्रयान और मंगलयान जैसे अभियान, ISRO, टीका-निर्माण की क्षमता‘प्राण प्रणव ओंकार’ वाली ज्ञान-परंपरा का आज का रूप यही है — जिज्ञासा वही है, उपकरण नए हैं।
डिजिटल भारतयूपीआई से होने वाला डिजिटल भुगतान, आधार, ऑनलाइन शिक्षाछोटे-से गाँव की दुकान पर भी क्यूआर कोड दिखना बताता है कि तकनीक कुछ लोगों तक सीमित नहीं रही।
भाषाई विविधतासंविधान की आठवीं अनुसूची की 22 भाषाएँ, सैकड़ों बोलियाँ, अनेक लिपियाँयही ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ का आज का प्रमाण है। मैं एक ही वाक्य को कई भाषाओं में लिखकर दिखाऊँगा — जैसे पुस्तक ‘भाषा संगम’ में ‘शस्य’ के लिए करती है।
पर्व और कलाहोली, ईद, क्रिसमस, बैसाखी, ओणम, बिहू, पोंगल, छठ; भरतनाट्यम से लेकर बिहू नृत्य तक; मधुबनी, वारली, पट्टचित्रविविधता को गिनाना नहीं, एक साथ दिखाना चाहिए — तभी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना सामने आती है।
कृषि और खाद्य-सुरक्षाहरित क्रांति, श्वेत क्रांति, मोटे अनाज (श्री अन्न/मिलेट्स) की वापसीनिराला का ‘कनक-शस्य’ आज भी जीवित है — अंतर यह है कि अब भारत अपने लिए अन्न स्वयं उगाता है।
प्रकृति और जैव विविधताहिमालय से सुंदरवन तक, बाघ और गंगा डॉल्फ़िन का संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जाआज प्रकृति केवल शोभा नहीं, ज़िम्मेदारी भी है — इसलिए मैं संरक्षण के प्रयास भी दिखाऊँगा।
महिलाएँ और युवाखेल, विज्ञान, सेना और पंचायत में महिलाओं की भागीदारी; विश्व की सबसे युवा आबादियों में से एकनिराला की कविता में भारत स्त्री-रूप में है, पर उसमें स्त्रियाँ नहीं हैं। आज की प्रस्तुति में वे अवश्य होनी चाहिए।
‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का भावआपदा में दूसरे देशों को सहायता, योग का विश्व-प्रसार, शांति-सेनाओं में योगदानकविता का शब्द ‘उदार’ (दानशील) आज भी भारत की सबसे अच्छी पहचान है।

और मैं यह भी सम्मिलित करूँगा — मैं भारत को केवल सुंदर बनाकर नहीं दिखाऊँगा। मैं उसकी चुनौतियाँ भी रखूँगा — प्रदूषित होती नदियाँ, कटते जंगल, असमानता और बेरोज़गारी — क्योंकि जो देश अपनी कमियाँ स्वीकार कर सकता है, वही उन्हें सुधार भी सकता है। सच्चा देशप्रेम आँख मूँदकर प्रशंसा करना नहीं, आँख खोलकर सुधार करना है।

प्रस्तुति का सुझाव: इसे एक ‘तब और अब’ चार्ट के रूप में बनाइए — बाईं ओर निराला की पंक्ति, दाईं ओर उसका आज का रूप। जैसे — ‘कनक-शस्य’ → खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता; ‘प्राण प्रणव ओंकार’ → चंद्रयान; ‘शतमुख-शतरव’ → 22 अनुसूचित भाषाएँ। ऐसा चार्ट पूरी कक्षा के सामने बात को एक झटके में स्पष्ट कर देता है।
प्र2.
2. “शतमुख-शतरव-मुखरे!” पंक्ति में भारत के विविध पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज किस प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की संकल्पना को साकार करते हैं?
उत्तर

पहले पंक्ति का अर्थ — ‘शतमुख’ यानी सौ मुख और ‘शतरव’ यानी सौ ध्वनियाँ; ‘मुखरे’ यानी बोलती हुई। कवि भारत को उस सत्ता के रूप में देखता है जो सौ मुखों से बोलती है। यहाँ ‘शत’ गिनती नहीं, अनगिनत का प्रतीक है। और सबसे ज़रूरी बात — कवि इन सौ स्वरों को शोर नहीं कहता, ‘मुखर’ कहता है। शोर में स्वर टकराते हैं; मुखरता में वे मिलकर बोलते हैं।

यही ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का मूल विचार हैएकता का अर्थ एकरूपता नहीं। भारत इसलिए एक नहीं है कि यहाँ सब एक जैसे हैं, बल्कि इसलिए एक है कि यहाँ अलग-अलग लोग एक साथ रह पाते हैं। पर्व, उत्सव और रीति-रिवाज इस बात को इन तरीक़ों से साकार करते हैं —

  1. एक ही पर्व, अनेक नाम और रूप। फ़सल के आने की खुशी पूरे देश में मनाई जाती है, पर हर अंचल का अपना नाम है — पंजाब में बैसाखी, तमिलनाडु में पोंगल, असम में बिहू, केरल में ओणम, गुजरात में उत्तरायण, ओडिशा-बंगाल में मकर संक्रांति। भाव एक है — अन्न के प्रति कृतज्ञता, यानी वही ‘कनक-शस्य’ वाली भावना। सौ मुख अलग हैं, ध्वनि की जड़ एक है।

  2. हर पर्व सबका बन जाता है। होली की टोली, ईद की सिवइयाँ, गुरुपर्व का लंगर, क्रिसमस का केक, बुद्ध पूर्णिमा की शांति — इनमें भाग लेने के लिए किसी को अपना धर्म नहीं बदलना पड़ता। पर्व यहाँ बाँटते नहीं, बुलाते हैं। यही ‘उदार दिशाएँ’ हैं।

  3. तीर्थ और मेले पूरे देश को आपस में बुनते हैं। कुंभ, गंगासागर, पुष्कर, सोनपुर, रथयात्रा, पंढरपुर की वारी — इनमें दूर-दूर के लोग एक जगह आते हैं। एक बिहार का यात्री तमिलनाडु के मंदिर में और एक तमिल यात्री हरिद्वार में मिलता है। यात्रा ने भारत को भूगोल से पहले भावना में जोड़ा है।

  4. अनेक भाषाएँ, एक भाव। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं और बोलियाँ सैकड़ों। पुस्तक का भाषा संगम बॉक्स इसी का प्रमाण है — एक ही शब्द ‘शस्य’ अठारह भाषाओं में अलग-अलग ध्वनि लेकर आता है, पर अर्थ एक ही रहता है: उपज। यही शतमुख-शतरव का जीवित उदाहरण है।

  5. राष्ट्रीय पर्व सबके साझे हैं। 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्तूबर हर गाँव, हर भाषा और हर पंथ में एक ही दिन, एक ही तरह मनाए जाते हैं। जहाँ सौ स्वर एक साथ एक ही गीत गाते हैं, वहीं ‘एक भारत’ सबसे साफ़ सुनाई देता है।

  6. ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ कार्यक्रम इसी विचार को व्यवहार में लाता है — इसमें एक राज्य को दूसरे राज्य से जोड़ा जाता है और विद्यार्थी एक-दूसरे की भाषा, भोजन, पर्व और लोकगीत सीखते हैं। यह ठीक वही काम है जो कविता की यह पंक्ति भाव के स्तर पर करती है।

निष्कर्ष: संगीत का उदाहरण लीजिए। वाद्यवृंद में तबला, बाँसुरी, वीणा और मृदंग — सबकी ध्वनि अलग होती है। यदि सब एक ही ध्वनि निकालें तो संगीत नहीं बनेगा; और यदि हर एक अपनी ताल पर बजे तो केवल शोर होगा। संगीत तभी बनता है जब अलग-अलग स्वर एक ही ताल में बजें। भारत यही वाद्यवृंद है — ‘शतमुख’ अलगाव नहीं, समृद्धि है, और ‘मुखर’ होना ही उसकी एकता का प्रमाण है।
करके देखिए: कक्षा में एक ‘पर्व-मानचित्र’ बनाइए — भारत के नक़्शे पर हर राज्य का एक प्रमुख पर्व चिपकाइए और उसके नीचे उसका मूल भाव लिखिए (फ़सल, नववर्ष, विजय, भाई-बहन का स्नेह)। आप देखेंगे कि नाम बीस हैं, पर भाव पाँच-छह ही निकलेंगे।
प्र3.
3. भारत को सुदृढ़ करने में इसकी प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के महत्व को बताते हुए संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर

लेख लिखने की विधि — एक अच्छे संक्षिप्त लेख में चार हिस्से होते हैं: शीर्षक, भूमिका (विषय क्यों ज़रूरी है), मुख्य भाग (एक-एक बिंदु, हर बिंदु के साथ उदाहरण) और उपसंहार (निष्कर्ष तथा हमारा कर्तव्य)। हर अनुच्छेद एक ही बात कहे, और यदि पाठ से जुड़ी कोई पंक्ति उद्धृत की जा सके तो लेख और मज़बूत बनता है।

नमूना उत्तर:

शीर्षक — भारत की तीन नींवें: प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान

भूमिका — कोई देश केवल सीमा-रेखाओं से मज़बूत नहीं होता। उसकी असली शक्ति उन चीज़ों में होती है जो उसे भीतर से बाँधे रखती हैं। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी कविता ‘भारति, जय, विजयकरे!’ में भारत का जो चित्र खींचा है, वह इसी सत्य को दिखाता है — उसमें फ़सल भी है, गंगा और हिमालय भी, और ‘प्राण प्रणव ओंकार’ भी। यानी भारत की नींव तीन हैं — प्रकृति, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा

1. प्रकृति — देश का शरीर। हिमालय उत्तर में प्रहरी की तरह खड़ा होकर ठंडी हवाओं को रोकता है और मानसून को वर्षा में बदल देता है। उसी से गंगा, यमुना, सिंधु और ब्रह्मपुत्र निकलती हैं, जिनके मैदानों में देश का अन्न उगता है। वन हमें हवा, लकड़ी, औषधि और वर्षा देते हैं, और समुद्र व्यापार तथा मत्स्य-संपदा। निराला ने इसी बात को सबसे सुंदर ढंग से कहा — वन भारत के ‘वसन’ हैं, गंगा उसका ‘हार’ और हिमालय उसका ‘मुकुट’। जब प्रकृति देश का शरीर ही है, तो उसकी रक्षा देश की रक्षा है। आज जल-संकट, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन हमें यही याद दिला रहे हैं।

2. संस्कृति — देश का मन। भारत की संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता है। यहाँ 22 अनुसूचित भाषाएँ, सैकड़ों बोलियाँ, अनेक पंथ, नृत्य-शैलियाँ, चित्रकलाएँ और पर्व एक साथ चलते हैं। निराला ने इसी को ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ कहा है। यह विविधता कमज़ोरी नहीं, जोड़ने वाली शक्ति है — क्योंकि जो समाज अलग-अलग लोगों को साथ रहना सिखा देता है, वह किसी भी संकट में टूटता नहीं। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘अतिथि देवो भव’ जैसे भाव भारत की उसी उदारता से आते हैं, जिसे कवि ने ‘ध्वनित दिशाएँ उदार’ कहा।

3. ज्ञान-परंपरा — देश के प्राण। भारत में ज्ञान की धारा कभी रुकी नहीं। वेद-उपनिषद से लेकर आर्यभट, चरक, सुश्रुत और पाणिनि तक; तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों से लेकर आज के ISRO, IIT और अनुसंधान संस्थानों तक — प्रश्न पूछने की आदत यहाँ की सबसे पुरानी परंपरा है। शून्य और दशमलव-पद्धति भारत की दुनिया को दी गई देन है। कवि ने इसी परंपरा को भारत का ‘प्राण’ कहा — ‘प्राण प्रणव ओंकार’। शरीर और मन तभी काम करते हैं जब प्राण हों; इसी तरह प्रकृति और संस्कृति तभी सार्थक हैं जब समाज सोचना और सीखना जारी रखे।

तीनों का आपसी संबंध — ये तीनों अलग खाने नहीं हैं, एक-दूसरे से बँधे हैं। नदी बची रहेगी तो खेती बचेगी; खेती बचेगी तो पर्व और लोकगीत बचेंगे; और ज्ञान बचेगा तभी हम नदी को बचाने के उपाय खोज पाएँगे। एक कड़ी टूटती है तो तीनों कमज़ोर हो जाती हैं।

उपसंहार — भारत को सुदृढ़ करने का अर्थ केवल सेना या अर्थव्यवस्था को मज़बूत करना नहीं है। इसका अर्थ है — अपनी नदियों को साफ़ रखना, अपने जंगल बचाना, अपनी भाषाएँ और कलाएँ जीवित रखना और अपने बच्चों को प्रश्न पूछना सिखाना। ये तीनों काम कोई सरकार अकेले नहीं कर सकती; ये नागरिक के रोज़ के व्यवहार से होते हैं। निराला की कविता हमें यही याद दिलाती है कि भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं — वह एक जीवित सत्ता है, जिसका शरीर प्रकृति है, मन संस्कृति और प्राण ज्ञान।

लेख लिखते समय: हर अनुच्छेद में कम-से-कम एक ठोस उदाहरण या पाठ की एक पंक्ति अवश्य दीजिए। बिना उदाहरण के लिखा गया लेख भाषण जैसा लगता है, प्रमाण जैसा नहीं। लंबाई लगभग 250–300 शब्द रखिए — ‘संक्षिप्त लेख’ का यही अर्थ है।
प्र4.
4. कविता में गंगा को भारत के स्वच्छ और श्वेत हार एवं हिमालय को मुकुट के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वर्तमान संदर्भ में बताइए कि बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने हमारी नदियों और हिमालय को किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर

कविता में गंगा ‘धवल धार हार’ है और हिमालय ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’। आज इन दोनों बिंबों की तुलना वास्तविकता से करें तो चिंता होती है — हार का उजलापन घट रहा है और मुकुट की बर्फ़ पिघल रही है

क — नदियों पर प्रभाव

कारणक्या हो रहा है
घरेलू मल-जल (सीवेज)नदी-किनारे बसे नगरों का बिना शोधित पानी सीधे नदी में गिरता है। यही आज नदी-प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। इससे पानी में घुली ऑक्सीजन घट जाती है और जलीय जीव मरने लगते हैं।
औद्योगिक अपशिष्टचमड़ा, काग़ज़, चीनी, रसायन और रंगाई के कारख़ानों का रासायनिक जल नदी में मिलता है। इससे पानी में भारी धातुएँ पहुँचती हैं, जो मछलियों के रास्ते हमारे भोजन तक आ जाती हैं।
खेती के रसायनखेतों से बहकर आने वाले रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक नदी में जमा होते हैं और जल-वनस्पति को अनियंत्रित रूप से बढ़ा देते हैं।
ठोस कचरा और प्लास्टिकपूजा-सामग्री, पॉलिथीन और मूर्ति-विसर्जन का मलबा घाटों पर जमा हो जाता है। प्लास्टिक गलता नहीं, इसलिए वह वर्षों नदी में बना रहता है।
जल-दोहन और अवरोधसिंचाई, नहरों, बाँधों और भूजल के अत्यधिक दोहन से नदियों में प्रवाह घट गया है। बहाव कम हो तो नदी अपने आप को साफ़ नहीं कर पाती — बहती नदी ही निर्मल रहती है।
अवैध रेत-खनन और अतिक्रमणनदी-तल से रेत निकालने और बाढ़-क्षेत्र में निर्माण करने से नदी का प्राकृतिक रास्ता बदल जाता है और बाढ़ का ख़तरा बढ़ता है।
जीव-जगत पर असरगंगा डॉल्फ़िन — जो भारत की राष्ट्रीय जलीय जीव है — घड़ियाल, कछुए और अनेक मछलियाँ संकट में हैं। डॉल्फ़िन लगभग अंधी होती है और ध्वनि से रास्ता खोजती है, इसलिए प्रदूषण और नाव-यातायात का शोर उसके लिए दोहरी मार है।

ख — हिमालय पर प्रभाव

कारणक्या हो रहा है
तापमान-वृद्धिवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार हिमालय के अधिकांश हिमनद (ग्लेशियर) लगातार पीछे हट रहे हैं — गंगोत्री हिमनद, जहाँ से भागीरथी निकलती है, इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। हिमनद पिघलने पर पहले नदियों में पानी बढ़ता है, पर आगे चलकर गर्मियों का स्थायी जल-स्रोत ही घट जाता है।
हिमनद-झील बाढ़ (GLOF)पिघलते हिमनदों के सामने बनी झीलें अचानक फूट पड़ती हैं और नीचे की घाटियों में भीषण बाढ़ आती है। हाल के वर्षों में उत्तराखंड और सिक्किम में ऐसी आपदाएँ देखी गई हैं।
वर्षा-चक्र में बदलावबर्फ़ की जगह अब अधिक वर्षा हो रही है, और वह भी कम समय में बहुत अधिक (बादल फटना)। इससे भूस्खलन और अचानक बाढ़ की घटनाएँ बढ़ी हैं।
काली कालिख (ब्लैक कार्बन)वाहनों, ईंधन और पराली के धुएँ से निकले काले कण बर्फ़ पर जमकर उसे मैला कर देते हैं। मैली बर्फ़ अधिक धूप सोखती है, इसलिए वह और तेज़ी से पिघलती है — यानी ‘शुभ्र’ रहना केवल सौंदर्य की नहीं, टिकाऊपन की भी शर्त है।
अनियंत्रित निर्माण और पर्यटनपहाड़ों को काटकर बनी सड़कें, सुरंगें, बड़ी परियोजनाएँ और भारी वाहन-यातायात ढलानों को कमज़ोर करते हैं। जोशीमठ में देखा गया भू-धंसाव इसी दबाव की चेतावनी है। तीर्थ-मार्गों और ट्रैकिंग-मार्गों पर जमा होता प्लास्टिक कचरा अलग समस्या है।
वन-कटावढलानों के जंगल कटने से मिट्टी को पकड़ने वाला कुछ नहीं बचता, इसलिए भूस्खलन और मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है — और वही मिट्टी बहकर नदियों में गाद के रूप में जमा होती है।

ग — दोनों समस्याएँ आपस में जुड़ी हैं

हिमालय और गंगा दो अलग समस्याएँ नहीं हैं — मुकुट पिघलेगा तो हार सूख जाएगा। हिमालय की बर्फ़ ही गर्मियों में नदियों को पानी देती है। यदि हिमनद घटे, तो नदी में प्रवाह घटेगा; प्रवाह घटेगा तो प्रदूषण और गाढ़ा होगा; प्रदूषण बढ़ेगा तो जल-जीवन समाप्त होगा और करोड़ों लोगों का पेयजल तथा सिंचाई संकट में पड़ेगी। निराला ने अनजाने ही यह संबंध कविता में रख दिया है — उनकी कविता में भी हिमालय (मुकुट) और गंगा (हार) एक ही शरीर के दो आभूषण हैं।

घ — क्या किया जा रहा है और हम क्या कर सकते हैं

  • सरकारी प्रयास — गंगा को सन् 2008 में राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया; सन् 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम आरंभ हुआ, जिसके अंतर्गत मल-जल शोधन संयंत्र, घाट-सुधार और वृक्षारोपण के काम होते हैं। जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 इसके क़ानूनी आधार हैं।
  • हम क्या कर सकते हैं — नदी और घाट पर कचरा न डालें; पूजा-सामग्री निर्धारित स्थान पर ही विसर्जित करें; प्लास्टिक का उपयोग घटाएँ; पानी बचाएँ (कम पानी बहाना भी नदी बचाना है); पहाड़ पर यात्रा करते समय अपना कचरा वापस लेकर लौटें; पेड़ लगाएँ और स्थानीय तालाब-कुएँ की सफ़ाई में भाग लें।
सोचिए: कविता कहती है कि गंगा भारत के गले का हार है। कोई भी अपने हार को मैला नहीं रखता। तो जिस दिन हम नदी को ‘नाला’ की तरह नहीं, ‘आभूषण’ की तरह देखने लगेंगे — उसी दिन आधा काम हो जाएगा
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