गंगा अध्याय 10 मेरी समझ मेरे विचार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए— 1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
उत्तर

कविता में कवि की देशप्रेम और राष्ट्र-गौरव की भावना की अभिव्यक्ति मिलती है — और यह देशप्रेम नारे का नहीं, वंदना का है। पूरी कविता भारतभूमि की स्तुति है, जिसमें कवि मातृभूमि को देवी मानकर उसे प्रणाम करता है। पाठ की भूमिका भी यही कहती है कि यह ‘निराला की देशप्रेम से ओत-प्रोत एक प्रेरणादायक रचना है’।

इस मूल भावना के भीतर चार अलग-अलग भाव-रंग दिखाई देते हैं —

#भावनाकविता की पंक्तिवह पंक्ति यह भाव कैसे दिखाती है
1विजय की कामना“भारति, जय, विजयकरे!”कविता का पहला ही शब्द जयघोष है। कवि भारत के लिए विजयश्री माँगता है — और यह कविता स्वतंत्रता-पूर्व की है, इसलिए यह कामना परतंत्रता के विरुद्ध एक आशा भी है।
2समृद्धि पर गर्व“कनक-शस्य-कमलधरे!”भारत की पहचान कवि के लिए सोने-सी लहलहाती फ़सल है — यानी उसका गर्व अन्न, कृषि और श्रम पर है, धन-संग्रह पर नहीं।
3प्रकृति के प्रति श्रद्धा“तरु-तृण-वन-लता वसन”, “गंगा … धवल धार हार गले”, “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार”वन, नदी और पर्वत यहाँ संसाधन नहीं, माँ के वस्त्र और आभूषण हैं। इसलिए इनके प्रति भाव उपयोग का नहीं, आदर का है।
4ज्ञान और संस्कृति पर आस्था“प्राण प्रणव ओंकार, / ध्वनित दिशाएँ उदार, / शतमुख-शतरव-मुखरे!”कवि भारत के प्राण किसी भूखंड में नहीं, ओंकार यानी ज्ञान-परंपरा में देखता है; और उसकी अनेक भाषाओं-स्वरों को गर्व से गिनाता है।
यह देशप्रेम किस तरह का है — यह समझना ज़रूरी है: इस कविता में कहीं किसी शत्रु का नाम नहीं है, कोई युद्ध नहीं है, कोई घृणा नहीं है। कवि केवल यह गिनाता है कि उसका देश कितना सुंदर, कितना संपन्न और कितना उदार है। इसलिए यह रचनात्मक देशप्रेम है — जो किसी के विरुद्ध नहीं, अपने देश के पक्ष में खड़ा होता है। ‘उदार’ शब्द इसका प्रमाण है: भारत की दिशाएँ देने वाली हैं, रोकने वाली नहीं।
चर्चा के लिए: कक्षा में पूछिए — यदि यही कविता आज लिखी जाती, तो कवि भारत के कौन-से नए ‘आभूषण’ गिनाता? (उत्तर में विज्ञान, अंतरिक्ष-यात्रा, लोकतंत्र, खेल, फ़िल्म-संगीत जैसे बिंदु आ सकते हैं।)
प्र2.
2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तर

पहला भाग — प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार हुआ है।

कवि ने भारत की प्रकृति का वर्णन अलग-अलग दृश्यों के रूप में नहीं किया। उसने भारत को एक देवी मानकर प्रकृति की हर चीज़ को उसके शरीर का अंग या वस्त्राभूषण बना दिया। पाठ की भूमिका भी यही कहती है — ‘नदी, वन, पुष्प, हिमालय, गंगा आदि प्राकृतिक शोभा को भारत के वस्त्राभूषण की तरह प्रस्तुत किया गया है।’ पूरी योजना इस प्रकार है —

प्रकृति का अंगकविता में उसे क्या बनाया गयापंक्ति
लंका द्वीपचरणों के नीचे खिला कमल“लंका पदतल शतदल,”
समुद्रचरण धोने वाला सेवक“गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल”
वृक्ष, तिनके, वन, लताएँपहने हुए वस्त्र“तरु-तृण-वन-लता वसन,”
फूलआँचल पर जड़े रत्न“अंचल में खचित सुमन;”
गंगागले का उजला हार“गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।”
हिमालय की बर्फ़सिर का मुकुट“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”

वर्णन की तीन विशेषताएँ ध्यान देने योग्य हैं —

  • क्रम — चरण से सिर तक, यानी दक्षिण से उत्तर तक। इससे पूरे भारत का भूगोल एक ही आकृति में समा जाता है।
  • मानवीकरण — समुद्र चरण धोता है, दिशाएँ बोलती हैं। प्रकृति यहाँ जड़ नहीं, जीवित है।
  • रंग-योजना — सोना (कनक-शस्य), हरा (तरु-तृण-वन-लता), सफ़ेद (धवल गंगा, शुभ्र हिम)। पूरी कविता एक चित्र की तरह खुलती है — इसीलिए पुस्तक इसे चित्रात्मक भाषा कहती है।

दूसरा भाग — क्या प्रकृति का संरक्षण भी देशप्रेम है? क्यों?

हाँ, प्रकृति का संरक्षण निश्चित रूप से देशप्रेम का काम है। इसके कारण ये हैं —

  1. क्योंकि कविता के अनुसार प्रकृति देश का शरीर ही है। यदि वन ‘वसन’ हैं, गंगा ‘हार’ है और हिमालय ‘मुकुट’ है, तो जंगल काटना देश के वस्त्र फाड़ना है, नदी को गंदा करना उसका हार मैला करना है और ग्लेशियर पिघलाना उसका मुकुट गला देना है। जो अपने देश से प्रेम करता है, वह उसके शरीर को क्षति नहीं पहुँचने देगा
  2. क्योंकि देश केवल सीमा-रेखा नहीं, जीवन-आधार है। देशप्रेम का अर्थ केवल झंडा फहराना नहीं। जिस मिट्टी से अन्न मिलता है, जिस नदी से पानी और जिन वनों से हवा — उनकी रक्षा करना देश के करोड़ों लोगों के जीवन की रक्षा करना है।
  3. क्योंकि यह संविधान में लिखा हमारा कर्तव्य है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क(छ) में हर नागरिक का मूल कर्तव्य बताया गया है — ‘वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवों सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे और उसका संवर्धन करे’। कर्तव्य निभाना देशभक्ति का सबसे ठोस रूप है।
  4. क्योंकि प्रकृति हमारी सांस्कृतिक पहचान भी है। गंगा, हिमालय, तुलसी, पीपल, कमल — ये केवल वस्तुएँ नहीं, हमारे पर्व, गीत और कहावतों में बसे हुए प्रतीक हैं। इन्हें खो देना अपनी संस्कृति का एक हिस्सा खो देना है।
  5. क्योंकि यह आने वाली पीढ़ियों के प्रति ईमानदारी है। देश केवल आज के लोगों का नहीं होता। जो हमें मिला, वैसा ही आगे सौंपना — यही सच्चा प्रेम है।
निष्कर्ष: देशप्रेम केवल विशेष अवसरों की भावना नहीं, रोज़ का व्यवहार है। पेड़ लगाना, पानी बचाना, नदी और तालाब में कचरा न डालना, प्लास्टिक कम करना, कागज़ दोनों ओर लिखना — ये सब उतने ही देशभक्ति के काम हैं जितना कोई नारा लगाना। निराला की कविता यही सिखाती है, इसीलिए पुस्तक इन्हीं पंक्तियों के आधार पर आगे ‘मिलकर लें शपथ’ में वन-संरक्षण के नियमों पर विचार करने को कहती है।
प्र3.
3. “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तर

यह एक ही पंक्ति भारतभूमि की पाँच विशेषताओं की ओर संकेत करती है। पहले पंक्ति का अर्थ खोल लीजिए — पुस्तक स्वयं बताती है (पृष्ठ 171) कि ‘कनक-शस्य’ का अर्थ है कनक के समान शस्य (सोने जैसी फसलें) और ‘कमलधरे’ का अर्थ है हे कमल को धारण करने वाली!

#विशेषतापंक्ति का कौन-सा शब्द इसे बताता हैकैसे
1कृषि-प्रधानताशस्यशब्द-संपदा के अनुसार शस्य = फसल, खेती, अन्न, धान्य। भारत की पहचान कवि के लिए उसके खेत हैं — यही उसकी सबसे पहली विशेषता है।
2धन-धान्य की संपन्नताकनक + शस्य‘सोने जैसी फ़सल’ का अर्थ है — फ़सल ही यहाँ का सोना है। भारत को प्राचीन काल से ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता रहा है; कवि उसी समृद्धि की ओर संकेत करता है।
3श्रम का सौंदर्यशस्यफ़सल अपने आप नहीं उगती — उसके पीछे किसान का परिश्रम है। पाठ की भूमिका इसी को ‘भारत की कृषि-परंपरा और श्रम के सौंदर्य’ कहती है।
4वैभव और शुभताकमलकमल भारतीय परंपरा में लक्ष्मी, पवित्रता और शुभता का प्रतीक है। ‘कमलधरे’ कहकर कवि भारतभूमि को समृद्धि की देवी के रूप में देखता है।
5मातृ-रूप और पूज्यताकमलधरे (संबोधन)‘-धरे’ स्त्रीलिंग संबोधन है, जैसे देवी को पुकारा जाता है। इसी एक प्रत्यय से भारतभूमि भूमि नहीं रह जाती, माँ बन जाती है।
एक बारीक बात: ‘कनक’ का अर्थ शब्द-संपदा में सोना, पलाश, चंपा — तीनों दिया गया है। पलाश और चंपा दोनों फूलों का रंग भी सुनहरा-नारंगी होता है। इसलिए यह शब्द एक साथ धातु की चमक और फूल की कोमलता — दोनों ले आता है। ऐसी बहु-अर्थता ही निराला की भाषा की विशेषता है, और कवि स्वयं आगे इसे स्वीकार भी करता है — ‘स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!’
शिल्प: ‘कनक-शस्य’ में तुलना समास के भीतर छिपी है (कनक के समान शस्य) — इसे उपमानवाचक कर्मधारय कहते हैं। साथ ही ‘नक-शस्य-मलधरे’ में ‘क’ की आवृत्ति से अनुप्रास बनता है।
प्र4.
4. “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तर

कवि ने हिमालय को भारत का मुकुट इसलिए कहा है क्योंकि मुकुट के जितने भी लक्षण होते हैं, वे सब हिमालय में मिलते हैं — स्थान, रंग, ऊँचाई, रक्षा और गौरव। कारण एक-एक करके देखिए —

#कारणव्याख्या
1स्थान — सबसे ऊपरमुकुट सिर पर पहना जाता है। कविता में भारत एक खड़ी हुई देवी है और हिमालय उसके भूगोल का सबसे उत्तरी और सबसे ऊँचा छोर है। जो सबसे ऊपर है, वही मुकुट होगा — कल्पना यहाँ भूगोल से पूरी तरह मेल खाती है।
2रंग — श्वेत और उज्ज्वल‘शुभ्र’ का अर्थ है उज्ज्वल, चमकीला, सफ़ेद, चाँदी जैसा। बर्फ़ से ढकी चोटियाँ धूप में चाँदी-सी दमकती हैं, ठीक जड़ाऊ मुकुट की तरह। ‘हिम-तुषार’ में हिम और तुषार दोनों शब्द रखकर कवि ने यह चमक और गाढ़ी कर दी है।
3ऊँचाई — गौरव का प्रतीकमुकुट सम्मान और गरिमा का चिह्न है। संसार की सबसे ऊँची चोटियाँ हिमालय में हैं, इसलिए वह भारत के गौरव और मस्तक की ऊँचाई का प्रतीक बन जाता है। ‘सिर ऊँचा होना’ मुहावरा भी इसी भाव से जुड़ा है।
4रक्षक — प्रहरी की तरहमुकुट सिर को ढँकता है। हिमालय भी सदियों से भारत के उत्तर में प्रहरी की तरह खड़ा है — वह उत्तर से आने वाली बर्फ़ीली हवाओं को रोकता है और मानसून के बादलों को टकराकर वर्षा में बदल देता है। यानी वह केवल सजावट नहीं, रक्षक भी है।
5जीवनदातागंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र — सब हिमालय से निकलती हैं। जो मुकुट कविता की अगली पंक्ति के ‘हार’ (गंगा) को भी जन्म देता है, वह भारत के लिए केवल आभूषण नहीं, जीवन का स्रोत है।
यहाँ कौन-सा अलंकार है — पुस्तक के शब्दों में: ‘उपर्युक्त पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट कहा गया है। वास्तव में हिमालय मुकुट नहीं है, लेकिन कवि ने कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे दिया। इससे भारत की छवि भव्य और दिव्य बन जाती है। यहाँ गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद स्थापित किया गया है, इसीलिए यहाँ रूपक अलंकार है’ (पृष्ठ 172)। ध्यान रखिए — कवि ने ‘हिमालय मुकुट जैसा है’ नहीं कहा; उसने ‘मुकुट’ कह ही दिया। यही उपमा और रूपक का अंतर है।
जोड़ लीजिए: ‘झरोखे से’ में दी गई मैथिलीशरण गुप्त की कविता भी हिमालय को ही उठाती है — पर वहाँ वह मुकुट नहीं, हृदय है: “ऊँचा हिया हिमालय तेरा / उसमें कितना दरद भरा”। दोनों कल्पनाओं की तुलना कीजिए — निराला के लिए हिमालय गौरव है, गुप्त जी के लिए वेदना
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