प्र1.
नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझते हुए इनका भाव स्पष्ट कीजिए— (क) “लंका पदतल शतदल, गर्जितोर्मि सागर-जल धोता शुचि चरण युगल!”
उत्तर
अर्थ — (हे भारति!) लंका तुम्हारे चरणों के नीचे खिले हुए कमल के समान है, और गरजती लहरों वाला समुद्र का जल तुम्हारे दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है।
भाव — इन तीन पंक्तियों में कवि ने भारत के भूगोल को वंदना में बदल दिया है। भाव के तीन स्तर हैं —
- भारत एक चेतन देवी है, नक्शा नहीं। कवि भारत को खड़ी हुई एक देवी के रूप में देखता है और उसका वर्णन चरणों से आरंभ करता है — क्योंकि पूजा सदा चरणों से शुरू होती है। भारत का सबसे दक्षिणी छोर सागर में है और उससे आगे लंका द्वीप — इसलिए लंका ‘पदतल’ पर पड़ा वह कमल बन जाती है जो देवी-प्रतिमाओं के चरणों के नीचे दिखाया जाता है।
- प्रचंड शक्ति भी यहाँ विनम्र है। ‘गर्जितोर्मि’ यानी गरजती लहरें — समुद्र यहाँ अपने सबसे भयंकर रूप में है। पर वह टकरा नहीं रहा, चरण धो रहा है। भारतीय परंपरा में किसी के चरण धोना सबसे बड़ा आदर है। यानी कवि कहना चाहता है कि भारत की महिमा के आगे संसार की सबसे बड़ी शक्ति भी सेवक बन जाती है।
- पवित्रता का भाव। ‘शुचि’ का अर्थ है पवित्र, निर्मल, निष्कपट। भारत के चरण पहले से ही पवित्र हैं; समुद्र उन्हें धोकर उन्हें पवित्र नहीं बना रहा, बल्कि अपने को धन्य कर रहा है। यह भाव भक्ति-काव्य की परंपरा से आया है।
पूरा चित्र एक साथ देखिए: नीला समुद्र, उस पर तैरता कमल-सा लंका द्वीप, और ऊपर खड़ी एक विशाल आकृति जिसके चरण लहरें छू रही हैं। कवि ने न कहीं ‘भारत महान है’ लिखा, न कोई नारा दिया — फिर भी पूरी महिमा खड़ी हो गई। यही चित्रात्मक भाषा की शक्ति है, जिसकी चर्चा पुस्तक ‘कविता का सौंदर्य’ में करती है।
शिल्प की बात: रूपक — लंका पर चरणतल के कमल का आरोप; भारतभूमि पर देवी का आरोप। मानवीकरण — समुद्र मनुष्य की तरह चरण धोता है (पूरी कविता की यही एकमात्र स्पष्ट क्रिया है — ‘धोता’)। अनुप्रास — ‘लंका पदतल शतदल’ में ‘ल’ की तीन आवृत्तियाँ, ‘शुचि चरण’ में ‘च’ की। सामासिक पद — पदतल, शतदल, गर्जितोर्मि, सागर-जल, चरण-युगल। तुक — शतदल – सागर-जल – युगल।