सरल अर्थ — हे भारति! तुम्हारी जय हो, हे विजय दिलाने वाली! हे सोने जैसी लहलहाती फ़सलों रूपी कमल को धारण करने वाली!
| शिल्प का पक्ष | पंक्ति में कैसे काम कर रहा है |
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| शैली | संबोधन-शैली — ‘विजयकरे!’ और ‘कमलधरे!’ दोनों संबोधन-पद हैं (‘हे विजय करने वाली!’, ‘हे कमल धारण करने वाली!’)। पूरी कविता इसी शैली में चलती है, इसलिए वह वंदना बन जाती है, विवरण नहीं। |
| अलंकार | अनुप्रास — “कनक-शस्य-कमलधरे” में ‘क’ की तीन आवृत्तियाँ; “जय, विजयकरे” में ‘ज’ की आवृत्ति। साथ ही उपमा-गर्भित समास — ‘कनक-शस्य’ का अर्थ ही है ‘कनक के समान शस्य’, यानी तुलना समास के भीतर छिपी है। |
| सामासिक पद | ‘कनक-शस्य-कमलधरे’ एक ही साँस में तीन शब्द जोड़ देता है। पुस्तक स्वयं बताती है कि ‘कनक-शस्य’ और ‘कमलधरा’ समस्त पद हैं और ‘कमलधरे’ संबोधन शब्द है। |
| बिंब | दृश्य बिंब — सुनहरे खेत और खिला हुआ कमल। रंग एक ही है — स्वर्ण, और वही रंग पूरी पंक्ति को दमका देता है। |
| तुक और लय | विजयकरे – कमलधरे। यही ‘-रे’ की तुक आगे हर छंद के अंतिम चरण में लौटती है (भरे, गले, मुखरे), इसलिए ये दो पंक्तियाँ पूरी कविता की धुरी बन जाती हैं। |
| गुण | ओज गुण — छोटे-छोटे चरण, संयुक्त वर्ण और जयघोष का स्वर मिलकर उत्साह जगाते हैं। ऐसी पंक्तियाँ पढ़ी नहीं जातीं, उच्चारित की जाती हैं। |