गंगा अध्याय 10 भाषा संगम

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“कनक-शस्य-कमलधरे” — कविता में आए ‘शस्य’ शब्द का अर्थ ‘उपज’ भी होता है। नीचे ‘उपज’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है। — इनके अतिरिक्त यदि आप ‘शस्य’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
उत्तर

पहले पुस्तक की दी हुई सूची — तालिका के रूप में (पृष्ठ 173)

भाषा‘उपज’ के लिए शब्द
हिंदीजो उपजा हो, पैदावार, फसल
संस्कृतशस्यम्
पंजाबीउपज, पैदावार
उर्दूपैदावार
कश्मीरीपॉदावार
सिंधीउपज, पैदावार
मराठीपीक
गुजरातीऊपज, पेदाश
कोंकणीपीक
नेपालीउब्जाबाली, उपज
बांग्लाफसल
असमियाशस्य, खेति, फचल, कृषि जात वस्तु
मणिपुरीमहै मरोङ् थाबा पोत्थोक
ओड़िआफसल, खेति
तेलुगुपंट
तमिलविळैच्चल्
मलयालमविळ्वुं
कन्नड़बेळे फसलु

अब ‘इनके अतिरिक्त’ — कुछ और भाषाओं तथा बोलियों के शब्द

(यह भाग आपको स्वयं अपने घर, गाँव और आस-पड़ोस से पूछकर भरना है। नीचे नमूने के रूप में कुछ शब्द दिए गए हैं — आप अपनी जानकारी से इनमें जोड़ सकते हैं।)

भाषा / बोली‘उपज’ के लिए शब्द
अंग्रेज़ीcrop, harvest, produce, yield
भोजपुरीफसल, उपज, पैदावार
अवधीफसल, उपज, खेती
मगहीफसल, उपज
मैथिलीफसिल, उपज
ब्रजभाषाफसल, उपज, खेती-बाड़ी
हरियाणवीफसल, पैदावार
छत्तीसगढ़ीफसल, उपज
राजस्थानी (मारवाड़ी)फसल, पैदावार, ऊपज
बुंदेलीफसल, उपज
इस सूची से क्या दिखता है — यही इस बॉक्स का असली पाठ: ध्यान से देखिए, अठारह भाषाओं में शब्द अलग-अलग हैं, पर वे दो-तीन परिवारों में बँट जाते हैं —
  • ‘उपज/ऊपज/उब्जाबाली’ — हिंदी, पंजाबी, सिंधी, गुजराती, नेपाली — सबका मूल एक ही क्रिया है: ‘उपजना’।
  • ‘फसल/फचल/फसलु/फसिल’ — बांग्ला, असमिया, ओड़िआ, कन्नड़, हिंदी — यह शब्द अरबी-फ़ारसी से आकर लगभग पूरे भारत में बस गया।
  • ‘पीक/पंट/विळैच्चल्/विळ्वुं’ — मराठी, कोंकणी, तेलुगु, तमिल, मलयालम — यहाँ मूल अलग है, पर तमिल ‘विळैच्चल्’ और मलयालम ‘विळ्वुं’ आपस में बहन-भाषाएँ लगती हैं।
  • ‘शस्य/शस्यम्’ — संस्कृत और असमिया दोनों में मिलता है — यानी कविता का शब्द आज भी जीवित है।
यही ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ का जीता-जागता प्रमाण है — सौ मुख अलग-अलग बोलते हैं, पर बात एक ही होती है: अन्न
कैसे पता करें: अपने विद्यालय में ही यह काम हो सकता है। कक्षा में जितनी भाषाएँ बोलने वाले विद्यार्थी हैं, सबसे एक-एक शब्द पूछिए और श्यामपट पर लिखिए। अपने दादा-दादी और नाना-नानी से पूछिए — पुरानी पीढ़ी के पास प्रायः वे शब्द होते हैं जो अब लुप्त हो रहे हैं।
प्र2.
— उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
उत्तर

पहले वह वाक्य देख लीजिए जो अनुवाद करना है (पृष्ठ 173) —

“कविता में आए ‘शस्य’ शब्द का अर्थ ‘उपज’ भी होता है।”

यह भाग आपको अपनी मातृभाषा में लिखना है। नीचे कुछ भाषाओं में नमूने दिए गए हैं, ताकि आप ढंग समझ सकें —

भाषावाक्य
हिंदी (मूल)कविता में आए ‘शस्य’ शब्द का अर्थ ‘उपज’ भी होता है।
भोजपुरीकविता में आइल ‘शस्य’ शब्द के मतलब ‘उपज’ भी होला।
अवधीकविता माँ आइ ‘शस्य’ सबद कै अरथ ‘उपज’ भी होत है।
ब्रजभाषाकविता मैं आयौ ‘शस्य’ सबद कौ अरथ ‘उपज’ हूँ होय है।
मैथिलीकवितामे आयल ‘शस्य’ शब्दक अर्थ ‘उपज’ सेहो होइत अछि।
राजस्थानीकविता में आयोड़ो ‘शस्य’ सबद रो अरथ ‘उपज’ ई व्है।
छत्तीसगढ़ीकविता म आय ‘शस्य’ सब्द के अरथ ‘उपज’ घलो होथे।
संस्कृतकवितायाम् आगतस्य ‘शस्य’ इति शब्दस्य अर्थः ‘उपज’ (सस्यम्) इत्यपि भवति।
यह अभ्यास क्यों: जब हम एक ही वाक्य को दो भाषाओं में लिखते हैं, तो दो बातें अपने आप समझ आ जाती हैं — पहली, कि हर भाषा के अपने नियम हैं (कहीं ‘होता है’, कहीं ‘होला’, कहीं ‘होइत अछि’, कहीं ‘भवति’); और दूसरी, कि इन नियमों के नीचे अर्थ एक ही रहता है। यही भारत की बहुभाषिकता की सुंदरता है — और यही कविता की पंक्ति ‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ का व्यावहारिक अनुभव है।
ध्यान दीजिए: यदि आपकी मातृभाषा हिंदी ही है, तो अपनी बोली में लिखिए — भोजपुरी, अवधी, बुंदेली, हरियाणवी, मगही, ब्रज, कुमाऊँनी, गढ़वाली, जो भी आपके घर में बोली जाती हो। बोली भी भाषा ही होती है, और वही आपके सबसे निकट है।
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