क — अंश का सरल अर्थ
| पंक्ति | सरल अर्थ |
|---|---|
| “जय जय भारतमाता!” | हे भारतमाता! तुम्हारी जय हो, जय हो। |
| “तेरा बाहर भी घर जैसा रहा प्यार ही पाता।” | तुम्हारा बाहर का भाग — यानी दूसरे देशों से लगा तुम्हारा छोर — भी घर जैसा ही रहा; उसने सदा प्यार ही पाया है। (भारत ने बाहर से आने वाले को भी अपना ही माना।) |
| “ऊँचा हिया हिमालय तेरा / उसमें कितना दरद भरा” | हिमालय तुम्हारा ऊँचा हृदय (हिया) है, और उस हृदय में कितनी पीड़ा भरी हुई है। |
| “फिर भी आग दबाकर अपनी / रखता है वह हमें हरा” | फिर भी वह अपने भीतर की आग (पीड़ा) को दबाकर हमें हरा-भरा बनाए रखता है। |
| “सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी टूटा आता” | उसी हिमालय से सौ स्रोतों (सोतों) से फूट-फूटकर पानी बहकर आता है। |
ख — भाव
गुप्त जी ने यहाँ हिमालय को भारत का हृदय कहा है, और इसी एक कल्पना से पूरा भाव खुल जाता है। हृदय वह अंग है जो भीतर रहता है, दिखता नहीं, पर सबको जीवन देता है। हिमालय भी ऐसा ही है — वह चुपचाप खड़ा रहता है, बर्फ़ की चोट सहता है, ठंडी हवाएँ रोकता है और बदले में नदियाँ देकर पूरे देश को ‘हरा’ रखता है। ‘आग दबाकर अपनी’ में गहरी बात है — दुख सहकर भी दूसरों को हरा-भरा रखना ही सच्चा मातृत्व है, और यही भारत का स्वभाव है। ‘सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी टूटा आता’ में वह पीड़ा आँसुओं की तरह बहती हुई भी दिखती है और नदियों के रूप में जीवन भी देती है — एक ही चित्र में दुख और वरदान दोनों। पहली पंक्तियों में कवि भारत की उदारता गिनाता है: यहाँ ‘बाहर’ भी ‘घर’ जैसा है, यानी जो भी आया, उसे प्यार ही मिला।
ग — दोनों कविताओं की तुलना
समानताएँ —
- दोनों राष्ट्र-वंदना हैं और दोनों जयघोष से आरंभ होती हैं — ‘भारति, जय, विजयकरे!’ और ‘जय जय भारतमाता!’
- दोनों में भारत माँ है, भूमि नहीं — निराला ‘भारति’ कहते हैं, गुप्त जी ‘भारतमाता’। इसीलिए दोनों में भारत का शरीर है — किसी में मुकुट और गला, किसी में हृदय।
- दोनों में हिमालय केंद्र में है और दोनों में उससे निकलती जलधारा का उल्लेख है — निराला में ‘गंगा ज्योतिर्जल-कण’, गुप्त जी में ‘सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी’।
- दोनों में ‘सौ’ की कल्पना है — निराला में ‘शतमुख-शतरव’, गुप्त जी में ‘सौ सोतों’। दोनों जगह ‘सौ’ गिनती नहीं, अनगिनत का प्रतीक है।
- दोनों में उदारता का भाव है — निराला की ‘ध्वनित दिशाएँ उदार’ और गुप्त जी का ‘बाहर भी घर जैसा … प्यार ही पाता’।
- दोनों गेय हैं — दोनों में टेक है और तुक है, इसलिए दोनों गाई जा सकती हैं।
- दोनों स्वतंत्रता-पूर्व के कवियों की रचनाएँ हैं, इसलिए दोनों में देश को जगाने और गौरव जगाने का स्वर है।
अंतर —
| तुलना का आधार | भारति, जय, विजयकरे! (निराला) | जय जय भारतमाता (मैथिलीशरण गुप्त) |
|---|---|---|
| भाषा | अत्यंत संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त — शुचि, स्तव, प्रणव, शतरव, ज्योतिर्जल। | सरल, बोलचाल के निकट खड़ी बोली — हिया, दरद, हरा, सोतों, फूट-फूटकर। पढ़ते ही अर्थ खुल जाता है। |
| हिमालय का रूपक | मुकुट — सिर पर, यानी गौरव का प्रतीक। | हिया (हृदय) — भीतर, यानी वेदना और वात्सल्य का प्रतीक। |
| मूल भाव | गौरव और विजय-कामना — भारत भव्य, दिव्य और वैभवशाली है। | वात्सल्य और करुणा — माँ दुख सहकर भी संतान को हरा रखती है। |
| शैली | संबोधन-शैली, क्रिया लगभग नहीं; केवल नाम-पद और चित्र। | कथन-शैली — ‘रखता है’, ‘आता’ जैसी क्रियाएँ; बात कही जा रही है, दिखाई नहीं जा रही। |
| दृष्टि | बाहर से — कवि भारत का रूप गिनाता है (चरण, वस्त्र, हार, मुकुट)। | भीतर से — कवि भारत की भावना बताता है (दर्द, त्याग, प्यार)। |
| गुण | ओज गुण प्रधान — उद्घोष जैसा स्वर। | माधुर्य और करुणा प्रधान — लोरी जैसा स्वर। |
| काव्य-धारा | छायावाद — लाक्षणिकता, प्रतीक, बिंब-बहुलता। | द्विवेदी युग / राष्ट्रीय काव्यधारा — स्पष्ट कथ्य, सीधा संदेश। |