गंगा अध्याय 10 झरोखे से

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की भाँति मैथिलीशरण गुप्त ने भी भारत का मनोरम और ओजस्वी गुणगान किया है। नीचे उनकी चर्चित कविता ‘जय जय भारतमाता’ का एक अंश दिया गया है — इसका अर्थ और भाव स्पष्ट कीजिए तथा बताइए कि यह ‘भारति, जय, विजयकरे!’ से किन बातों में मिलती है और किन बातों में अलग है।
उत्तर

क — अंश का सरल अर्थ

पंक्तिसरल अर्थ
“जय जय भारतमाता!”हे भारतमाता! तुम्हारी जय हो, जय हो।
“तेरा बाहर भी घर जैसा रहा प्यार ही पाता।”तुम्हारा बाहर का भाग — यानी दूसरे देशों से लगा तुम्हारा छोर — भी घर जैसा ही रहा; उसने सदा प्यार ही पाया है। (भारत ने बाहर से आने वाले को भी अपना ही माना।)
“ऊँचा हिया हिमालय तेरा / उसमें कितना दरद भरा”हिमालय तुम्हारा ऊँचा हृदय (हिया) है, और उस हृदय में कितनी पीड़ा भरी हुई है।
“फिर भी आग दबाकर अपनी / रखता है वह हमें हरा”फिर भी वह अपने भीतर की आग (पीड़ा) को दबाकर हमें हरा-भरा बनाए रखता है।
“सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी टूटा आता”उसी हिमालय से सौ स्रोतों (सोतों) से फूट-फूटकर पानी बहकर आता है।

ख — भाव

गुप्त जी ने यहाँ हिमालय को भारत का हृदय कहा है, और इसी एक कल्पना से पूरा भाव खुल जाता है। हृदय वह अंग है जो भीतर रहता है, दिखता नहीं, पर सबको जीवन देता है। हिमालय भी ऐसा ही है — वह चुपचाप खड़ा रहता है, बर्फ़ की चोट सहता है, ठंडी हवाएँ रोकता है और बदले में नदियाँ देकर पूरे देश को ‘हरा’ रखता है। ‘आग दबाकर अपनी’ में गहरी बात है — दुख सहकर भी दूसरों को हरा-भरा रखना ही सच्चा मातृत्व है, और यही भारत का स्वभाव है। ‘सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी टूटा आता’ में वह पीड़ा आँसुओं की तरह बहती हुई भी दिखती है और नदियों के रूप में जीवन भी देती है — एक ही चित्र में दुख और वरदान दोनों। पहली पंक्तियों में कवि भारत की उदारता गिनाता है: यहाँ ‘बाहर’ भी ‘घर’ जैसा है, यानी जो भी आया, उसे प्यार ही मिला।

ग — दोनों कविताओं की तुलना

समानताएँ —

  1. दोनों राष्ट्र-वंदना हैं और दोनों जयघोष से आरंभ होती हैं — ‘भारति, जय, विजयकरे!’ और ‘जय जय भारतमाता!’
  2. दोनों में भारत माँ है, भूमि नहीं — निराला ‘भारति’ कहते हैं, गुप्त जी ‘भारतमाता’। इसीलिए दोनों में भारत का शरीर है — किसी में मुकुट और गला, किसी में हृदय।
  3. दोनों में हिमालय केंद्र में है और दोनों में उससे निकलती जलधारा का उल्लेख है — निराला में ‘गंगा ज्योतिर्जल-कण’, गुप्त जी में ‘सौ सोतों से फूट-फूटकर पानी’।
  4. दोनों में ‘सौ’ की कल्पना है — निराला में ‘शतमुख-शतरव’, गुप्त जी में ‘सौ सोतों’। दोनों जगह ‘सौ’ गिनती नहीं, अनगिनत का प्रतीक है।
  5. दोनों में उदारता का भाव है — निराला की ‘ध्वनित दिशाएँ उदार’ और गुप्त जी का ‘बाहर भी घर जैसा … प्यार ही पाता’।
  6. दोनों गेय हैं — दोनों में टेक है और तुक है, इसलिए दोनों गाई जा सकती हैं।
  7. दोनों स्वतंत्रता-पूर्व के कवियों की रचनाएँ हैं, इसलिए दोनों में देश को जगाने और गौरव जगाने का स्वर है।

अंतर —

तुलना का आधारभारति, जय, विजयकरे! (निराला)जय जय भारतमाता (मैथिलीशरण गुप्त)
भाषाअत्यंत संस्कृतनिष्ठ और समासयुक्त — शुचि, स्तव, प्रणव, शतरव, ज्योतिर्जल।सरल, बोलचाल के निकट खड़ी बोली — हिया, दरद, हरा, सोतों, फूट-फूटकर। पढ़ते ही अर्थ खुल जाता है।
हिमालय का रूपकमुकुट — सिर पर, यानी गौरव का प्रतीक।हिया (हृदय) — भीतर, यानी वेदना और वात्सल्य का प्रतीक।
मूल भावगौरव और विजय-कामना — भारत भव्य, दिव्य और वैभवशाली है।वात्सल्य और करुणा — माँ दुख सहकर भी संतान को हरा रखती है।
शैलीसंबोधन-शैली, क्रिया लगभग नहीं; केवल नाम-पद और चित्र।कथन-शैली — ‘रखता है’, ‘आता’ जैसी क्रियाएँ; बात कही जा रही है, दिखाई नहीं जा रही।
दृष्टिबाहर से — कवि भारत का रूप गिनाता है (चरण, वस्त्र, हार, मुकुट)।भीतर से — कवि भारत की भावना बताता है (दर्द, त्याग, प्यार)।
गुणओज गुण प्रधान — उद्घोष जैसा स्वर।माधुर्य और करुणा प्रधान — लोरी जैसा स्वर।
काव्य-धाराछायावाद — लाक्षणिकता, प्रतीक, बिंब-बहुलता।द्विवेदी युग / राष्ट्रीय काव्यधारा — स्पष्ट कथ्य, सीधा संदेश।
निष्कर्ष: दोनों कवि एक ही माँ की वंदना करते हैं, पर दो अलग जगहों पर खड़े होकर। निराला दूर खड़े होकर देखते हैं और उसका रूप गिनाते हैं — इसलिए उनकी कविता में मुकुट, हार और वस्त्र हैं। गुप्त जी पास बैठकर देखते हैं और उसका मन पढ़ते हैं — इसलिए उनकी कविता में दर्द, त्याग और प्यार है। पहली कविता पढ़कर सिर ऊँचा होता है, दूसरी पढ़कर आँख भर आती है। दोनों मिलकर देशप्रेम का पूरा अर्थ बनाती हैं — गर्व और कृतज्ञता
प्र2.
(इस कविता को पुस्तकालय से ढूँढ़कर पूरा पढ़िए।)
उत्तर

यह पढ़ने का काम है। नीचे बताया गया है कि कहाँ ढूँढ़ें, पढ़ते समय क्या देखें और पढ़ने के बाद क्या लिखें

1. कहाँ ढूँढ़ें

  • पुस्तकालय — मैथिलीशरण गुप्त की काव्य-रचनाओं के संग्रह देखिए। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं — भारत-भारती, साकेत, यशोधरा, पंचवटी, जयद्रथ वध। ‘जय जय भारतमाता’ उनके गीतों के संग्रहों में मिलेगी।
  • हिंदी साहित्य के संकलन — देशभक्ति-गीतों के संकलनों में यह कविता प्रायः रहती है।
  • विश्वसनीय डिजिटल स्रोत — NCERT का ePathshala/DIKSHA मंच, साहित्य अकादमी तथा सरकारी डिजिटल पुस्तकालयों के संग्रह। इंटरनेट से कोई भी पंक्ति लेने से पहले देखिए कि वहाँ प्रकाशक या संपादक का नाम दिया है या नहीं — क्योंकि नेट पर बहुत-सी पंक्तियाँ ग़लत कवि के नाम से चलती रहती हैं।
  • अपने हिंदी शिक्षक से पूछिए — विद्यालय के पुस्तकालय में प्रायः ‘राष्ट्रकवि’ के नाम से एक अलग खंड होता है।

2. कवि के बारे में इतना जान लीजिए

मैथिलीशरण गुप्त हिंदी के उन कवियों में हैं जिन्हें ‘राष्ट्रकवि’ कहा जाता है। वे खड़ी बोली को काव्य की भाषा बनाने वाले प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता है — सरल भाषा में गहरी बात, और उपेक्षित पात्रों को स्वर देना (जैसे साकेत में उर्मिला और यशोधरा में यशोधरा)। इसी कारण उनकी राष्ट्र-वंदना में भी शक्ति से अधिक करुणा दिखाई देती है।

3. पढ़ते समय ये बातें नोट कीजिए

क्या देखेंक्यों
टेक कौन-सी है और कितनी बार लौटती है‘जय जय भारतमाता!’ — यही पंक्ति गीत को गेय बनाती है। गिनिए कि वह कितनी बार आती है।
भारत के कौन-कौन से अंग गिनाए गए हैंअंश में ‘हिया’ (हिमालय) आया है। पूरी कविता में और कौन-से अंग हैं — यह निराला की कविता से तुलना के काम आएगा।
कौन-से शब्द बोलचाल के हैंहिया, दरद, सोतों, हरा — इन्हें अलग लिखिए और निराला के शुचि, स्तव, प्रणव से तुलना कीजिए।
कौन-सा भाव प्रधान हैगर्व, करुणा, आह्वान या कृतज्ञता — पूरी कविता पढ़ने पर यह और स्पष्ट हो जाएगा।
अलंकारफूट-फूटकर’ (पुनरुक्ति), ‘हिया हिमालय’ (रूपक और अनुप्रास दोनों) — ऐसे और उदाहरण खोजिए।

4. पढ़ने के बाद क्या लिखें — नमूना ढाँचा (एक पृष्ठ)

  1. कविता का नाम, कवि और स्रोत (किस पुस्तक से पढ़ी, प्रकाशक और वर्ष सहित)।
  2. कविता का सार — पाँच-छह वाक्यों में।
  3. तीन पंक्तियाँ जो सबसे अच्छी लगीं — और हर पंक्ति पर दो वाक्य कि वह क्यों अच्छी लगी।
  4. तुलना — ‘भारति, जय, विजयकरे!’ से एक समानता और एक अंतर।
  5. मेरी प्रतिक्रिया — कविता पढ़कर मन में क्या भाव आया।
कक्षा में कीजिए: दोनों कविताएँ एक के बाद एक ऊँची आवाज़ में पढ़िए — पहले निराला की, फिर गुप्त जी की। आप स्वयं अनुभव करेंगे कि पहली में स्वर ऊँचा और तेज़ हो जाता है और दूसरी में धीमा और कोमल। यही ओज गुण और माधुर्य गुण का अंतर है, जिसे किताब से नहीं, कान से सीखा जाता है।
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