गंगा अध्याय 10 सृजन

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
1. मान लीजिए आपको भारत को एक मनुष्य के रूप में कल्पित करते हुए सुसज्जित करने का अवसर मिले तो आप अपने राज्य के किन सांस्कृतिक, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, चिह्नों, पुष्पों आदि का प्रयोग कर उसकी साज-सज्जा करेंगे?
उत्तर

पहले देखिए कि निराला ने यह काम कैसे किया — उन्होंने भारत को देवी मानकर प्रकृति से सजाया: लंका चरणों का कमल, वन-वनस्पति वस्त्र, फूल आँचल के रत्न, गंगा गले का हार, हिमालय मुकुट। अब यही काम हमें अपने राज्य की संस्कृति से करना है — यानी हर वस्तु के साथ यह भी बताना है कि वह क्यों चुनी गई।

अच्छे उत्तर में क्या होना चाहिए —

  • शरीर के अंगों का क्रम हो — सिर से पाँव तक या पाँव से सिर तक; कविता की तरह।
  • हर वस्तु के साथ एक पंक्ति का कारण हो। बिना कारण की सजावट केवल सूची बन जाती है।
  • चुनी हुई चीज़ें सचमुच आपके राज्य की हों — काल्पनिक नहीं।
  • अंत में एक वाक्य में यह भी कहिए कि यह सजावट क्या भाव बताती है।

नमूना उत्तर (उदाहरण के लिए — राजस्थान):

यदि मुझे भारत को एक मनुष्य के रूप में सजाने का अवसर मिले, तो मैं उसे अपने राज्य राजस्थान के रंगों से सजाऊँगा —

अंगकिससे सजाऊँगाक्यों
सिररंगीन पगड़ी (साफ़ा)राजस्थान में पगड़ी केवल पहनावा नहीं, सम्मान और वचन का प्रतीक है। निराला ने सिर पर हिमालय का मुकुट रखा था; मैं वहाँ पगड़ी रखूँगा — क्योंकि दोनों का अर्थ एक ही है: ऊँचा माथा
माथारखड़ी (माथे का आभूषण) और चंदन का तिलकस्वागत और शुभता का चिह्न — ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा।
कान और गलातिमणिया और आड़ जैसे पारंपरिक आभूषणये आभूषण पीढ़ियों से चले आते हैं, इसलिए ये परंपरा की निरंतरता के प्रतीक हैं।
वस्त्रबांधनी और लहरिया की ओढ़नी, घाघरा-चोलीबांधनी का हर बिंदु हाथ से बाँधा जाता है — यह राजस्थान के श्रम और धैर्य का चित्र है। निराला के ‘वसन’ की जगह यहाँ यही आएगा।
आँचलरोहिड़ा (राज्य-पुष्प) और केसरिया गेंदे के फूलनिराला ने ‘अंचल में खचित सुमन’ कहा था। रोहिड़ा को ‘मरुस्थल का सागवान’ कहते हैं — यह कठिनाई में भी खिलने का प्रतीक है।
हाथएक हाथ में बाजरे की बाली, दूसरे में जल का कलशबाजरा यहाँ की मुख्य फ़सल है — यही ‘कनक-शस्य’ का राजस्थानी रूप है। कलश रेगिस्तान में जल के मोल की याद दिलाता है।
पाँवपायल और मोजड़ी (जूती)घूमर नृत्य की थाप और चलते रहने का भाव — संस्कृति रुकी हुई नहीं, चलती हुई चीज़ है।
साथ मेंऊँट, गोडावण (राज्य-पक्षी), खेजड़ी का वृक्षऊँट मरुभूमि का साथी है; खेजड़ी वह वृक्ष है जिसके लिए खेजड़ली गाँव के लोगों ने प्राण दे दिए थे — यह पर्यावरण-रक्षा की सबसे बड़ी मिसाल है।
पृष्ठभूमिअरावली की पहाड़ियाँ और दूर तक फैले धोरे (रेत के टीले)राजस्थान की पहचान उसका भूगोल ही है — जैसे भारत की पहचान हिमालय और गंगा।

यह सजावट क्या कहती है — इस पूरे रूप में एक ही भाव है: कम साधनों में भी सुंदरता और उल्लास बनाए रखना। जहाँ पानी कम है, वहाँ के लोग सबसे चटख रंग पहनते हैं — यही राजस्थान का उत्तर है जीवन को।

अपने राज्य के लिए कैसे बनाएँ: पाँच बातें पता कर लीजिए — (1) राज्य-पुष्प और राज्य-वृक्ष, (2) राज्य-पशु और राज्य-पक्षी, (3) पारंपरिक वेशभूषा, (4) प्रमुख आभूषण और हस्तशिल्प, (5) मुख्य फ़सल और नदी। बस, आपकी सजावट तैयार है। जैसे — केरल के लिए कसावु साड़ी, नारियल, कथकली-मुकुट और पेरियार नदी; असम के लिए मेखला-चादर, गमछा, एक-सींग वाला गैंडा और ब्रह्मपुत्र।
प्र2.
2. भारत पर आधारित एक डाक टिकट, पोस्टर या पुस्तक के लिए आवरण पृष्ठ बनाइए और बताइए कि आप उसमें किन-किन प्रतीकों को सम्मिलित करेंगे और क्यों?
उत्तर

यह बनाकर दिखाने वाला काम है। नीचे बनाने की विधि, प्रतीकों की सूची कारण सहित और एक पूरा नमूना डिज़ाइन दिया गया है।

1. अच्छे आवरण/डाक टिकट में क्या होना चाहिए —

  • एक ही मुख्य चित्र, जो दूर से भी पहचाना जाए। डाक टिकट बहुत छोटा होता है, इसलिए उसमें बारीक़ चीज़ें काम नहीं करतीं।
  • तीन-चार से अधिक प्रतीक नहीं। जितने अधिक प्रतीक, उतना कम प्रभाव।
  • रंग-योजना सोची हुई — जैसे कविता की ही तीन रंगों वाली योजना: सुनहरा (फ़सल), हरा (वन), श्वेत (गंगा और हिम)।
  • एक छोटी पंक्ति — जैसे ‘भारति, जय, विजयकरे!’ — जो चित्र का अर्थ खोल दे।
  • डाक टिकट पर ‘भारत / INDIA’ और मूल्य लिखना अनिवार्य होता है — यह भूलिए मत।

2. प्रतीक और उनके कारण —

प्रतीकक्यों सम्मिलित करूँगा
गेहूँ/बाजरे की सुनहरी बालियाँ‘कनक-शस्य’ का सीधा चित्र — भारत की कृषि-परंपरा और किसान के श्रम का प्रतीक।
हिमालय की श्वेत चोटियाँ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’ — ऊँचाई, गौरव और रक्षा का प्रतीक; साथ ही सभी उत्तरी नदियों का स्रोत।
गंगा की लहरदार धारा‘धवल धार हार गले’ — निर्मलता, जीवन और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रतीक।
कमलराष्ट्रीय पुष्प; कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहने का भाव — ‘लंका पदतल शतदल’ में कवि ने भी इसे चुना है।
अशोक-स्तंभ का सिंह-शीर्ष और ‘सत्यमेव जयते’राष्ट्रीय प्रतीक — यह भारत के राज्य-रूप और सत्य पर आधारित शासन-आदर्श को दिखाता है।
चरखा या हाथ का करघास्वतंत्रता-संग्राम, आत्मनिर्भरता और श्रम की गरिमा का प्रतीक। कविता स्वतंत्रता-पूर्व की है, इसलिए यह प्रतीक उससे जुड़ता भी है।
अनेक लिपियों में लिखा एक ही शब्द‘शतमुख-शतरव-मुखरे!’ का दृश्य रूप — भाषाई विविधता। जैसे ‘भारत’ शब्द देवनागरी, तमिल, बांग्ला, गुरुमुखी और गुजराती लिपि में।
राष्ट्रीय पशु/पक्षी — बाघ और मोरभारत की जैव विविधता और वन्य-संपदा; साथ ही संरक्षण का संदेश।
तिरंगा और उपग्रहआज का भारत — परंपरा के साथ विज्ञान। तिरंगे के तीन रंग वैसे भी त्याग, शांति और समृद्धि के प्रतीक हैं।

3. नमूना डिज़ाइन — डाक टिकट ‘भारति, जय, विजयकरे!’

भागक्या होगा
ऊपरी पट्टीबाईं ओर भारत / INDIA, दाईं ओर मूल्य ₹5
पृष्ठभूमिऊपर श्वेत हिमालय, बीच में मुड़ती हुई नीली-उजली गंगा, नीचे सुनहरे खेत — यानी कविता का पूरा शरीर एक ही चित्र में।
बीच मेंगंगा की धारा से बना हुआ हल्का-सा हार, जो चित्र को कविता से जोड़ देता है।
निचला कोनाएक खिला हुआ कमल और उसके पास एक छोटा-सा अशोक-चिह्न।
नीचे की पंक्तिदेवनागरी में — “भारति, जय, विजयकरे!” और उसके नीचे छोटे अक्षरों में — सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1899–1961)।
रंग-योजनाकेवल तीन रंग — सुनहरा, हरा और श्वेत, हल्की नीली रेखाओं के साथ। कम रंग = अधिक प्रभाव।
प्रतीक चुनते समय सोचिए: अच्छा प्रतीक वह है जो बिना शब्दों के बात कह दे और जिसे देश का हर व्यक्ति पहचान ले। इसलिए ऐसे प्रतीक चुनिए जो किसी एक क्षेत्र, भाषा या समुदाय तक सीमित न हों — प्रकृति, फ़सल, नदी और राष्ट्रीय चिह्न सबके साझे हैं।
प्र3.
3. नदी की यात्रा — गंगा नदी की अपने उद्गम से लेकर बंगाल की खाड़ी में विलीन होने तक की पूरी यात्रा के बीच में आने वाली प्राकृतिक, सांस्कृतिक, भाषिक आदि विशेषताओं का वर्णन करते हुए एक रोचक यात्रा-वृत्तांत लिखिए। (संकेत– पर्वतीय सौंदर्य से लेकर गंगासागर तक की संस्कृति इत्यादि)
उत्तर

यात्रा-वृत्तांत लिखने की विधि — यात्रा-वृत्तांत निबंध नहीं होता। इसमें (1) क्रम होता है — कहाँ से कहाँ; (2) ‘मैं’ होता है — लेखक स्वयं देखता-सुनता चलता है; (3) इंद्रियाँ होती हैं — क्या दिखा, क्या सुना, क्या महकता था; (4) लोग होते हैं — केवल स्थान नहीं; और (5) भाषा में गति होती है। यहाँ एक अच्छी युक्ति यह है कि लेखक स्वयं गंगा बनकर बोले — इससे वृत्तांत रोचक भी बनेगा और नदी का दृष्टिकोण भी सामने आएगा।

नमूना उत्तर:

शीर्षक — गोमुख से गंगासागर तक: एक बूँद की डायरी

पहला पड़ाव — गोमुख (उत्तराखंड)। मेरा जन्म गंगोत्री हिमनद के उस मुहाने पर हुआ जिसे लोग गोमुख कहते हैं — बर्फ़ की एक विशाल दीवार, जिसके नीचे से मटमैला पानी उबलता हुआ निकलता है। यहाँ मेरा नाम गंगा नहीं, भागीरथी है। चारों ओर भोजपत्र के पेड़ हैं, हवा इतनी ठंडी कि साँस जम जाए, और चट्टानों पर कहीं-कहीं भूरा भालू के पैरों के निशान। यहाँ लोग बहुत कम मिलते हैं — बस कुछ साधु, कुछ पर्वतारोही और एक-दो चरवाहे, जो गढ़वाली में बात करते हैं।

देवप्रयाग — जहाँ मुझे मेरा नाम मिला। पहाड़ों से उतरते हुए मैंने गीत गाए, झरनों की तरह गिरी, और फिर देवप्रयाग पहुँची। यहाँ मुझसे मिलने अलकनंदा आई — गहरे हरे रंग की, और मैं मटमैली-सफ़ेद। दोनों धाराएँ मिलीं और उसी क्षण मेरा नाम गंगा हो गया। नाम मिलना यात्रा का सबसे बड़ा पड़ाव होता है।

ऋषिकेश और हरिद्वार — पहाड़ का अंत, मैदान का आरंभ। ऋषिकेश में मैंने पहली बार झूलते पुल देखे और शाम की आरती सुनी — सैकड़ों दीये मुझ पर तैरते हुए बहते गए। हरिद्वार में ‘हर की पौड़ी’ पर भीड़ ऐसी कि लगा पूरा देश एक जगह इकट्ठा हो गया हो। यहीं से मेरा पहाड़ छूटा और मैदान शुरू हुआ। भाषा भी बदल गई — अब चारों ओर खड़ी बोली हिंदी सुनाई देने लगी।

मैदान — खेत, कुम्हार और घाट। कन्नौज के पास इत्र की महक हवा में तैर रही थी। दोनों किनारों पर गेहूँ और गन्ने के खेत — वही ‘कनक-शस्य’ जिसकी बात निराला ने की है। किसान मुझसे पानी लेते और बदले में मुझे अपनी थकान सुना जाते। सुबह घाटों पर धोबी कपड़े पटकते, बच्चे छलाँग लगाते और बगुले एक पैर पर खड़े होकर मुझे घूरते रहते।

प्रयागराज — तीन का मिलन। यहाँ यमुना मुझसे आ मिली — साँवली, गहरी, शांत। लोग कहते हैं कि यहाँ अदृश्य सरस्वती भी मिलती है, इसलिए इसे त्रिवेणी संगम कहते हैं। हर बारह वर्ष पर यहाँ कुंभ लगता है और तंबुओं का एक पूरा नगर बस जाता है। मैंने अपने जीवन में इससे बड़ा मेला और कहीं नहीं देखा।

काशी — जहाँ मैं उत्तर की ओर मुड़ गई। वाराणसी में मैंने अपना रास्ता ही बदल लिया — यहाँ मैं उत्तर की ओर बहती हूँ। किनारे पर अस्सी से लेकर राजघाट तक अर्धचंद्राकार घाट, ऊपर ऊँचे मकान, नावों की क़तार, संस्कृत के श्लोक, शहनाई की आवाज़ और शाम को दीपों की पंक्तियाँ। यहाँ की भोजपुरी ऐसी है कि गाली भी गीत जैसी लगती है।

बिहार — नदियों का मिलन और छठ का सूर्य। बक्सर के आगे मुझमें सोन, गंडक और कोसी आकर मिलीं और मैं और चौड़ी हो गई — इतनी कि दूसरा किनारा धुँधला दिखने लगा। पटना के घाटों पर मैंने छठ देखा: लाखों लोग कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते और उगते सूरज को अर्घ्य देते हैं। यही एक पर्व है जिसमें डूबते सूरज को भी नमस्कार किया जाता है — मुझे यह बात सबसे सुंदर लगी। यहाँ भाषा फिर बदली — मगही, मैथिली, अंगिका। भागलपुर के पास मेरी सबसे प्यारी साथी मिली — गंगा डॉल्फ़िन, जो देख नहीं सकती और ध्वनि से रास्ता खोजती है। वह भारत की राष्ट्रीय जलीय जीव है, पर आज संकट में है।

फरक्का — जहाँ मैं दो हो गई। पश्चिम बंगाल में फरक्का के पास मैं बँट गई। एक धारा हुगली बनकर कोलकाता की ओर चली और दूसरी पद्मा बनकर बांग्लादेश की ओर। यहाँ से भाषा बांग्ला हो गई और मिट्टी और गीली।

सुंदरवन और गंगासागर — यात्रा का अंत। अंत में मैं सुंदरवन पहुँची — दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन, जहाँ पेड़ों की जड़ें साँस लेने के लिए मिट्टी से बाहर निकल आती हैं और जहाँ बाघ तैरना जानता है। और फिर गंगासागर — जहाँ मेरा पानी खारे समुद्र में घुल गया। मकर संक्रांति पर यहाँ लाखों लोग स्नान करने आते हैं; कहावत है — ‘सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’।

अंतिम पन्ना। लगभग ढाई हज़ार किलोमीटर की इस यात्रा में मैंने पाँच राज्य, दस से अधिक भाषाएँ, सैकड़ों पर्व और करोड़ों लोग देखे। सबने मुझे माँ कहा। पर मैंने यह भी देखा कि जिन घाटों पर मेरी आरती होती है, उन्हीं के पास नाले मुझमें गिरते हैं। पूजा और सफ़ाई — दोनों साथ चलें, तभी मैं ‘धवल धार’ बनी रह सकूँगी। निराला ने मुझे भारत के गले का हार कहा था। हार को मैला रखने वाला कोई नहीं होता — यही एक बात मैं अपने बच्चों से कहना चाहती हूँ।

अपना वृत्तांत लिखते समय: नक़्शा सामने रखकर पहले पड़ावों की सूची बना लीजिए — उद्गम, संगम, बड़े नगर, मुहाना। फिर हर पड़ाव के लिए तीन बातें लिखिए: एक दृश्य, एक ध्वनि और एक व्यक्ति। इन तीन चीज़ों से यात्रा-वृत्तांत अपने आप जीवित हो उठता है।
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