गंगा अध्याय 10 व्याकरण की बात

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
भारत की एक विशेषता उसकी बहुभाषिकता है। यदि आपको एक सचेत नागरिक के रूप में भारत से अपनी मातृभाषा में संवाद का अवसर मिले तो आप किन विषयों पर और क्या-क्या संवाद करना चाहेंगे? इन संवादों को अपनी मातृभाषा और हिंदी में लिखिए। (संकेत– समाज, पर्यावरण, संस्कृति आदि।)
उत्तर

यह प्रश्न कल्पना पर आधारित है — मानिए कि ‘भारत’ स्वयं सामने खड़ा है, ठीक वैसे ही जैसे निराला की कविता में वह एक चेतन सत्ता बनकर सामने खड़ा है, और आप उससे अपनी मातृभाषा में बात कर सकते हैं। ‘सचेत नागरिक’ का अर्थ है — जो केवल शिकायत न करे, अपनी ज़िम्मेदारी भी पहचाने।

1. किन विषयों पर संवाद करना चाहूँगा —

विषयक्या पूछूँगा / क्या कहूँगा
पर्यावरणआपका ‘हार’ (गंगा) मैला क्यों हो रहा है और ‘मुकुट’ (हिमालय) की बर्फ़ क्यों घट रही है? मैं वचन देता हूँ कि नदी में कचरा नहीं डालूँगा और हर वर्ष एक पेड़ लगाऊँगा।
शिक्षाक्या हर बच्चे को अपनी मातृभाषा में पढ़ने का अवसर मिल पा रहा है? मैं चाहूँगा कि गाँव के विद्यालय में पुस्तकालय हो।
भाषा और संस्कृतिहमारी छोटी बोलियाँ धीरे-धीरे चुप क्यों हो रही हैं? मैं अपनी बोली के दस लोकगीत लिखकर सुरक्षित रखूँगा।
समाज और समानताजाति, धर्म और लिंग के भेद कब मिटेंगे? मैं अपनी कक्षा में किसी के साथ भेदभाव नहीं होने दूँगा।
किसान और श्रमआपका ‘कनक-शस्य’ उगाने वाला किसान स्वयं चिंतित क्यों रहता है? मैं अन्न बर्बाद नहीं करूँगा।
स्वच्छता और स्वास्थ्यसार्वजनिक स्थान गंदे क्यों रहते हैं? मैं कूड़ा कूड़ेदान में ही डालूँगा और दूसरों से भी कहूँगा।
वैज्ञानिक दृष्टिआपने संसार को शून्य और आयुर्वेद दिया — आज भी हमें अंधविश्वास के बजाय प्रश्न पूछना सिखाइए।

2. नमूना संवाद — हिंदी में

(संध्या का समय। नदी का किनारा। एक विद्यार्थी घाट पर बैठा है। सामने एक विशाल, स्नेहमय स्वर उभरता है।)

विद्यार्थी — प्रणाम भारत! मैंने आपको कविता में पढ़ा है — ‘कनक-शस्य-कमलधरे!’ पर आज आपसे बात करने का मन है।

भारत — कहो बेटा। मुझसे लोग माँगते बहुत हैं, बात कम करते हैं।

विद्यार्थी — यही तो मैं कहना चाहता हूँ। कवि ने गंगा को आपके गले का हार कहा था। पर आज उसमें झाग तैरता है। यह हार मैला क्यों हो गया?

भारत — हार मैंने नहीं पहना था बेटा, तुम्हीं ने पहनाया था। और मैल भी बाहर से नहीं आया।

विद्यार्थी — बात तो सही है। तो मैं क्या करूँ?

भारत — बड़ा काम मत खोजो। छोटा काम रोज़ करो। एक पेड़ लगाओ और उसे जीवित रखो; अपनी बोली के गीत भूलो मत; अन्न का एक दाना बर्बाद मत करो; और अपने साथी को उसकी जाति या भाषा से मत तौलो।

विद्यार्थी — पर मैं तो अकेला हूँ। मेरे करने से क्या होगा?

भारत — मैं सौ मुखों से बोलता हूँ — शतमुख-शतरव-मुखरे। हर मुख अकेला ही होता है, बेटा। सौ मुख मिलकर ही आवाज़ बनते हैं।

विद्यार्थी — तो मैं वचन देता हूँ — मैं आपका एक मुख बनूँगा, चुप नहीं रहूँगा।

भारत — यही मुझे चाहिए था। जय हो!

3. नमूना संवाद — मातृभाषा में (उदाहरण के लिए भोजपुरी)

भोजपुरी मेंहिंदी भावार्थ
विद्यार्थी — प्रणाम भारत! रउरा गंगा त हमनी के गला के हार बाड़ी, बाकिर उहो अब मइल हो गइल बाड़ी।विद्यार्थी — प्रणाम भारत! आपकी गंगा तो हम सबके गले का हार है, पर वह भी अब मैली हो गई है।
भारत — हार त तूहीं लोग पहिरवले रहलऽ, आ मइल भी तूहीं लोग लगवलऽ।भारत — हार भी तुम्हीं लोगों ने पहनाया था, और मैल भी तुम्हीं ने लगाया।
विद्यार्थी — त हम का करीं?विद्यार्थी — तो मैं क्या करूँ?
भारत — रोज़ छोट-छोट काम करऽ — एगो गाछ लगावऽ, कूड़ा नदी में जिन फेंकऽ, आ आपन बोली जिन बिसरऽ।भारत — रोज़ छोटे-छोटे काम करो — एक पेड़ लगाओ, कूड़ा नदी में मत फेंको, और अपनी बोली मत भूलो।
यह अभ्यास क्यों दिया गया है: पुस्तक चाहती है कि आप यह अनुभव करें कि जो बात मातृभाषा में कही जाती है, वह अधिक सच्ची लगती है। इसीलिए कविता में भी भारत ‘शतमुख’ है — सौ मुख वाला। यदि सब एक ही भाषा में बोलते, तो वे सौ मुख किस काम के? बहुभाषिकता का अर्थ यही है — अपनी भाषा में सोचना और दूसरे की भाषा का आदर करना
अपना संवाद लिखते समय: पहले हिंदी में लिख लीजिए, फिर अपनी मातृभाषा में — पर अनुवाद मत कीजिए। मातृभाषा में वही बात अपने मुहावरे में कहिए, तभी वह सजीव लगेगी। दो-दो पंक्तियों की आठ-दस बारी पर्याप्त हैं।
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