पहले पंक्ति को समझ लीजिए — ‘स्तव’ का अर्थ है स्तुति, प्रशंसा, स्तोत्र और ‘बहु-अर्थ-भरे’ का अर्थ है हे अनेक अर्थों से भरी हुई! यानी भारत की स्तुति एक ही अर्थ में पूरी नहीं होती — वह अन्न भी है, जल भी, वन भी, ज्ञान भी और ध्वनि भी।
अच्छी स्तुति-कविता में क्या होना चाहिए —
- संबोधन हो — ‘हे भारत!’, ‘मेरी माटी!’ — क्योंकि स्तुति सामने खड़े किसी को की जाती है। निराला की पूरी कविता संबोधन ही है।
- प्रशंसा अनेक अर्थों में हो — केवल सुंदरता नहीं; प्रकृति, अन्न, श्रम, ज्ञान, भाषा और उदारता — सब आएँ।
- ठोस चित्र हों, बड़े-बड़े शब्द नहीं। ‘भारत महान है’ कहने से कुछ नहीं बनता; ‘तेरे खेतों में सोना उगता है’ कहने से चित्र बन जाता है।
- तुक और लय हो, ताकि कविता गाई जा सके — जैसे कविता में करे–धरे–भरे–मुखरे।
- छोटी रखिए — आठ से बारह पंक्तियाँ पर्याप्त हैं।
नमूना उत्तर 1 — हिंदी (जिनकी मातृभाषा हिंदी है, उनके लिए)
वंदना
हे मेरी माटी, तुझको प्रणाम!
तेरे खेतों में सोना उगता,
तेरे नदियों में चाँदी बहती,
तेरे शिखरों पर उजला मुकुट,
तेरे आँचल में हरियाली रहती।
तू सौ भाषा में गाती है,
हर बोली तेरी थाती है।
जो आया, तूने अपनाया —
यही तेरा सबसे बड़ा नाम!
हे मेरी माटी, तुझको प्रणाम!
भावार्थ — इसमें भारत की प्रशंसा पाँच अर्थों में की गई है — कृषि (खेतों में सोना), जल-संपदा (नदियों में चाँदी), पर्वत (उजला मुकुट), वन (आँचल में हरियाली) और भाषाई विविधता तथा उदारता (सौ भाषाएँ, और जो आया उसे अपनाना)। अंतिम पंक्तियाँ यह कहती हैं कि भारत की सबसे बड़ी विशेषता उसकी संपदा नहीं, उसका समा लेने का स्वभाव है।
नमूना उत्तर 2 — मातृभाषा में (उदाहरण के लिए ब्रजभाषा)
| ब्रजभाषा में | हिंदी भावार्थ |
|---|---|
| जय जय भारत, जय जय माई। | हे भारत! हे माँ! तुम्हारी जय हो। |
| तेरे खेतन में सोनो झलके, गंग तिहारे गरे सुहाई॥ | तुम्हारे खेतों में (पकी फ़सल का) सोना चमकता है और गंगा तुम्हारे गले में हार-सी सुशोभित है। |
| हिम कौ मुकुट धरे तू ऊँची, बन की चूनर ओढ़ि लुभाई॥ | बर्फ़ का मुकुट धारण किए तुम ऊँची खड़ी हो, और वन की चुनरी ओढ़कर मन मोह लेती हो। |
| सौ बोली में बोलै तू ही, सबकूँ अपनौ कहै लुगाई॥ | तुम्हीं सौ बोलियों में बोलती हो और सबको अपना कहती हो। |
| तेरी माटी चंदन जैसी, कोटि प्रनाम करूँ सिर नाई॥ | तुम्हारी मिट्टी चंदन के समान (पवित्र) है; सिर झुकाकर मैं करोड़ों प्रणाम करता हूँ। |