गंगा अध्याय 10 समास

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
कविता में से चुनकर कुछ सामासिक पद (शब्द) नीचे दिए गए हैं। उनके समास-विग्रह अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए। — शतदल
उत्तर

समस्त पद — शतदल  |  विग्रह — शत (सौ) हैं दल जिसके — वह (कमल)  |  समास — बहुव्रीहि

यह विग्रह क्यों: ‘शत’ का अर्थ है सौ और ‘दल’ का अर्थ है पंखुड़ी। शब्द-संपदा में ‘शतदल’ का अर्थ सीधे कमल दिया गया है — और यही इस समास की कुंजी है। ध्यान दीजिए, विग्रह करने पर जो अर्थ निकला (‘सौ पंखुड़ियों वाला’), वह न पूर्वपद ‘शत’ है और न उत्तरपद ‘दल’ — वह एक तीसरी वस्तु है: कमल। जिस समास में दोनों पद अपना अर्थ छोड़कर किसी तीसरे अर्थ की ओर संकेत करें, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।
बिंदुविवरण
पूर्वपदशत (संख्यावाचक विशेषण — सौ)
उत्तरपददल (पंखुड़ी)
विग्रहशत हैं दल जिसके, वह — कमल
समास का भेदबहुव्रीहि (क्योंकि अर्थ किसी तीसरी वस्तु — कमल — का है)
कविता की पंक्ति“लंका पदतल शतदल,”
पंक्ति में अर्थलंका (भारतमाता के) चरणों के नीचे खिले कमल के समान है।
एक और संभव विग्रह: यदि इसका अर्थ केवल ‘सौ पंखुड़ियों का समूह’ लिया जाए, तो यह द्विगु समास होगा, क्योंकि पूर्वपद संख्यावाचक है और समाहार (समूह) का बोध होता है। पर यहाँ कविता में इसका अर्थ कमल है, इसलिए इसे बहुव्रीहि मानना ही उचित है। समास का भेद शब्द से नहीं, वाक्य में उसके अर्थ से तय होता है — यह बात याद रखिए।

अपने वाक्य में प्रयोग: सरोवर में खिला शतदल भोर की धूप में और सुंदर लग रहा था।

प्र2.
— ज्योतिर्जल
उत्तर

समस्त पद — ज्योतिर्जल  |  विग्रह — ज्योति (प्रकाश) रूपी जल  |  समास — कर्मधारय

यह विग्रह क्यों: कवि दो चीज़ों को अलग-अलग नहीं गिना रहा — वह कह रहा है कि गंगा का जल स्वयं प्रकाश ही है। जब समास में एक पद दूसरे का रूप बन जाए (यानी उपमेय में उपमान का आरोप हो), तो वहाँ कर्मधारय समास होता है — जैसे ‘चरण-कमल’ = चरण रूपी कमल, ‘मुख-चंद्र’ = मुख रूपी चंद्र। इसीलिए यहाँ रूपक अलंकार और कर्मधारय समास एक साथ बैठे हैं।
बिंदुविवरण
पूर्वपदज्योतिस् / ज्योति (प्रकाश, रोशनी, लौ)
उत्तरपदजल (पानी)
विग्रहज्योति रूपी जल  (वैकल्पिक: ज्योति से युक्त जल — मध्यमपदलोपी कर्मधारय)
समास का भेदकर्मधारय
संधि की बात‘ज्योतिः + जल’ में विसर्ग बदलकर ‘र्’ हो गया — इसलिए रूप बना ज्योतिर्जल। यही कारण है कि शब्द-संपदा में मूल रूप ‘ज्योतिस्’ भी दिया गया है।
कविता की पंक्ति“गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।”
पंक्ति में अर्थगंगा के प्रकाशमय जल-कण, जिनसे बनी उजली धारा भारत के गले का हार है।
पूरा पद देखिए: कविता में शब्द ‘ज्योतिर्जल-कण’ है — यह दो चरणों वाला समास है: पहले ‘ज्योतिर्जल’ (कर्मधारय) बना, फिर उसमें ‘कण’ जुड़कर ‘ज्योतिर्जल के कण’ (तत्पुरुष) बना। ऐसे बड़े समासों को दीर्घ समास कहते हैं और यही निराला की भाषा की पहचान है।

अपने वाक्य में प्रयोग: भोर की पहली किरण पड़ते ही नदी का ज्योतिर्जल दमक उठा।

प्र3.
— शतमुख
उत्तर

समस्त पद — शतमुख  |  विग्रह — शत (सौ) हैं मुख जिसके — वह (भारति)  |  समास — बहुव्रीहि

यह विग्रह क्यों: कविता में यह शब्द अकेला नहीं खड़ा — वह ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ में आया है, यानी वह भारति का विशेषण है: ‘वह, जिसके सौ मुख हैं’। जब समस्त पद अपने दोनों पदों से हटकर किसी अन्य (यहाँ भारति) की ओर संकेत करे, तो वहाँ बहुव्रीहि समास होता है — जैसे ‘चतुर्भुज’ = चार भुजाओं वाला (विष्णु), ‘दशानन’ = दस मुख वाला (रावण)। ‘शतमुख’ ठीक इसी परिवार का शब्द है।
बिंदुविवरण
पूर्वपदशत (सौ)
उत्तरपदमुख
विग्रहशत हैं मुख जिसके, वह — (यहाँ भारतमाता)
समास का भेदबहुव्रीहि
कविता की पंक्ति“शतमुख-शतरव-मुखरे!”
पंक्ति में अर्थहे सौ मुखों से उठे सौ स्वरों द्वारा मुखरित होने वाली! — यानी भारत की अनगिनत भाषाएँ, बोलियाँ, पर्व और विचार एक साथ बोल रहे हैं।
‘शत’ का भावयहाँ ‘शत’ गिनती नहीं, अनगिनत का प्रतीक है — जैसे ‘हज़ार बार कहा’ में हज़ार गिनती नहीं होती।
दूसरा संभव विग्रह: शब्द-संपदा में ‘शतमुख’ का अर्थ सीधे ‘सौ मुख’ दिया गया है। इस अर्थ में विग्रह होगा ‘सौ मुखों का समूह’ और समास होगा द्विगु, क्योंकि पूर्वपद संख्यावाचक है और समाहार का बोध होता है। परीक्षा में दोनों में से जो भी लिखें, विग्रह और भेद आपस में मेल खाने चाहिए — यही सबसे ज़रूरी बात है।

अपने वाक्य में प्रयोग: हमारा देश शतमुख है — यहाँ एक ही भाव सैकड़ों बोलियों में गाया जाता है।

प्र4.
— सागरजल
उत्तर

समस्त पद — सागरजल  |  विग्रह — सागर का जल  |  समास — तत्पुरुष (संबंध/षष्ठी तत्पुरुष)

यह विग्रह क्यों: यहाँ दोनों पद अपना अपना अर्थ बनाए रखते हैं और उनके बीच ‘का/के/की’ का संबंध लगता है — सागर का जल। जिस समास में विग्रह करते समय कोई कारक-चिह्न (का, को, से, के लिए, में) लगाना पड़े और उत्तरपद प्रधान हो, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। यहाँ मुख्य वस्तु ‘जल’ है, ‘सागर’ केवल यह बताता है कि जल कौन-सा है — इसलिए उत्तरपद ही प्रधान है।
बिंदुविवरण
पूर्वपदसागर (समुद्र)
उत्तरपदजल (पानी) — यही प्रधान है
विग्रहसागर का जल
समास का भेदतत्पुरुष — संबंध (षष्ठी) तत्पुरुष
कविता की पंक्ति“गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल”
पंक्ति में अर्थगरजती लहरों वाला समुद्र का जल भारतमाता के दोनों पवित्र चरणों को धो रहा है।
अंतर पहचानिए: ‘सागरजल’ = सागर का जल (तत्पुरुष), पर ‘ज्योतिर्जल’ = ज्योति रूपी जल (कर्मधारय)। दोनों का उत्तरपद एक ही है — ‘जल’ — फिर भी समास अलग हैं। कारण यह है कि पहले में संबंध है और दूसरे में आरोपजहाँ ‘का/के/की’ लगे वहाँ तत्पुरुष, जहाँ ‘रूपी’ लगे वहाँ कर्मधारय।

अपने वाक्य में प्रयोग: सागरजल खारा होता है, इसलिए उसे पीने योग्य बनाने के लिए विशेष संयंत्र लगाने पड़ते हैं।

प्र5.
कविता में आए अन्य सामासिक पदों को भी छाँटकर उनका समास-विग्रह और भेद लिखिए।
उत्तर

यह कविता समासों से बनी हुई कविता है — इसीलिए पुस्तक ने ‘समस्त पद/सामासिक पद का प्रयोग’ को इसकी अलग विशेषता माना है (पृष्ठ 170)। पुस्तक ने चार शब्द दिए हैं; कविता में इनके अतिरिक्त भी अनेक समस्त पद हैं। पूरी सूची इस प्रकार है —

समस्त पदविग्रहसमास का भेदकविता की पंक्ति
कनक-शस्यकनक के समान शस्य (सोने जैसी फ़सलें)कर्मधारय (उपमानवाचक)“कनक-शस्य-कमलधरे!”
कमलधरा / कमलधरेकमल को धारण करने वालीतत्पुरुष (उपपद तत्पुरुष; ‘कमलधरे’ इसका संबोधन रूप है)“कनक-शस्य-कमलधरे!”
पदतलपद (पैर) का तलतत्पुरुष (संबंध)“लंका पदतल शतदल,”
शतदलशत हैं दल जिसके, वह — कमलबहुव्रीहि“लंका पदतल शतदल,”
गर्जितोर्मिगर्जित (गरजती हुई) ऊर्मि (लहरें)कर्मधारय  (संधि: गर्जित + ऊर्मि = गर्जितोर्मि — गुण संधि)“गर्जितोर्मि सागर-जल”
सागर-जलसागर का जलतत्पुरुष (संबंध)“गर्जितोर्मि सागर-जल”
चरण-युगलचरणों का युगल (जोड़ा)तत्पुरुष (संबंध)“धोता शुचि चरण युगल”
बहु-अर्थ-भरेबहुत अर्थों से भरी हुईतत्पुरुष (करण/अपादान)“स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!”
तरु-तृण-वन-लतातरु, तृण, वन और लताद्वंद्व (चार पदों वाला)“तरु-तृण-वन-लता वसन,”
ज्योतिर्जलज्योति रूपी जलकर्मधारय“गंगा ज्योतिर्जल-कण”
ज्योतिर्जल-कणज्योतिर्जल के कणतत्पुरुष (संबंध)“गंगा ज्योतिर्जल-कण”
हिम-तुषारहिम रूपी तुषार / हिम का तुषारकर्मधारय (अथवा तत्पुरुष)“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”
शतमुखशत हैं मुख जिसके, वहबहुव्रीहि (अथवा द्विगु — सौ मुखों का समूह)“शतमुख-शतरव-मुखरे!”
शतरवसौ रवों (ध्वनियों) का समूहद्विगु“शतमुख-शतरव-मुखरे!”
शतमुख-शतरव-मुखरेसौ मुखों के सौ रवों से मुखर होने वालीतत्पुरुष (करण) — दीर्घ समास“शतमुख-शतरव-मुखरे!”

समास को पहचानने का सरल तरीक़ा —

यदि विग्रह में …तो समासकविता से उदाहरण
‘का/के/की, को, से, के लिए, में’ लगे और उत्तरपद प्रधान होतत्पुरुषसागर-जल, पदतल, चरण-युगल
‘रूपी’ या ‘के समान’ लगे (विशेषण-विशेष्य का संबंध)कर्मधारयकनक-शस्य, ज्योतिर्जल, गर्जितोर्मि
पहला पद संख्यावाचक हो और समूह का बोध कराएद्विगुशतरव
‘और’ लगे और दोनों/सभी पद प्रधान होंद्वंद्वतरु-तृण-वन-लता
अर्थ किसी तीसरी वस्तु का निकले, ‘जिसके … वह’ लगेबहुव्रीहिशतदल (= कमल), शतमुख
कवि ने इतने समास क्यों लगाए: तीन कारण हैं। पहला — समास से भाषा कस जाती है: ‘सोने जैसी फ़सलों और कमल को धारण करने वाली’ जैसा लंबा वाक्य केवल एक पद में आ जाता है — ‘कनक-शस्य-कमलधरे’। दूसरा — छोटे चरणों में अधिक अर्थ भरने से पंक्ति में वेग आता है, और वेग से ओज गुण बनता है, जो वंदना के लिए आवश्यक है। तीसरा — समास कविता को मंत्र जैसा बना देता है — संस्कृत के स्तोत्र इसी तरह गुँथे होते हैं, और यह कविता है भी एक स्तव।
याद रखिए: पुस्तक स्वयं बताती है — ‘समास का अर्थ है संक्षेप। … पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं। समास रचना से बने शब्द को समस्त पद कहते हैं। यदि समस्त पद के अंग अलग-अलग करने हों, तो उस प्रक्रिया को समास विग्रह कहते हैं’ (पृष्ठ 171–172)। समास और सामासिक पदों के बारे में आप ‘क्या लिखूँ?’ (पाठ 2) के अभ्यास में विस्तार से पढ़ चुके हैं।
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