पहले परिभाषा — पुस्तक के अनुसार ‘शतमुख’ और ‘शतरव’ में ‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति हो रही है, इसीलिए वहाँ अनुप्रास अलंकार है (पृष्ठ 172)। ‘रैदास के पद’ (पाठ 8) में यही बात इस तरह कही गई थी — जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। ध्यान रखिए — आवृत्ति व्यंजन की देखी जाती है, स्वर की नहीं।
इस कविता में अनुप्रास लगभग हर पंक्ति में है। पूरी सूची —
| # | पंक्ति | आवर्ती व्यंजन | कहाँ-कहाँ और उसका प्रभाव |
|---|---|---|---|
| 1 | “भारति, जय, विजयकरे!” | ज | जय, विजय — दो बार। ‘जय’ शब्द ही ‘विजय’ के भीतर दोबारा बज उठता है, इसलिए जयघोष दुगुना सुनाई देता है। |
| 2 | “कनक-शस्य-कमलधरे!” | क | कनक (दो बार ‘क’), कमल — कुल तीन आवृत्तियाँ। ‘क’ की कड़ी ध्वनि पंक्ति को दृढ़ता देती है। |
| 3 | “लंका पदतल शतदल,” | ल | लंका, पदतल, शतदल — तीन आवृत्तियाँ। साथ में ‘त’ भी दो बार (पदतल, शतदल)। पंक्ति लहर की तरह लुढ़कती हुई चलती है। |
| 4 | “गर्जितोर्मि सागर-जल” | ग | गर्जितोर्मि, सागर — ‘ग’ की गहरी ध्वनि लहरों की गड़गड़ाहट का आभास देती है (ध्वन्यात्मकता)। |
| 5 | “धोता शुचि चरण युगल” | च | शुचि, चरण — ‘च’ की आवृत्ति; कोमल ध्वनि, जो चरण-प्रक्षालन के भाव के अनुकूल है। |
| 6 | “स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!” | ब / भ | बहु, भरे — दोनों सजातीय ओष्ठ्य ध्वनियाँ हैं, इसलिए कान इन्हें एक ही परिवार का मानता है। |
| 7 | “तरु-तृण-वन-लता वसन,” | त और व | तरु, तृण में ‘त’; वन, वसन में ‘व’। एक ही पंक्ति में दो-दो आवृत्ति-शृंखलाएँ चल रही हैं। |
| 8 | “अंचल में खचित सुमन;” | च | अंचल, खचित — ‘च’ की आवृत्ति, जो कढ़ाई जैसी बारीक़ ध्वनि पैदा करती है। |
| 9 | “धवल धार हार गले।” | ध | धवल, धार — और साथ ही ‘धार–हार’ की भीतरी तुक। पूरी पंक्ति बहती हुई धारा की तरह सुनाई देती है। यह इस कविता का सबसे सुंदर अनुप्रास है। |
| 10 | “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,” | म / ट-त | मुकुट का ‘म’ और हिम का ‘म’; मुकुट का ‘ट’ और तुषार का ‘त’ — सजातीय ध्वनियाँ मिलकर हल्की गूँज बनाती हैं। |
| 11 | “प्राण प्रणव ओंकार,” | प्र | प्राण, प्रणव — दो बार पूरा संयुक्त वर्ण ‘प्र’ लौटता है, इसलिए यह पंक्ति मंत्र-जैसी लगती है। बहुत स्पष्ट अनुप्रास। |
| 12 | “ध्वनित दिशाएँ उदार,” | द | दिशाएँ, उदार — ‘द’ की आवृत्ति; खुली, गूँजती ध्वनि। |
| 13 | “शतमुख-शतरव-मुखरे!” | श (और ‘मुख’ की पुनरुक्ति) | यही पुस्तक का अपना उदाहरण है। ‘श’ दो बार, ‘शत’ पूरा शब्द दो बार, और ‘मुख’ भी दो बार (शतमुख, मुखरे) — तीन स्तरों की आवृत्ति एक ही पंक्ति में। इसी से अनेक दिशाओं से उठती ध्वनि का प्रभाव बनता है। |