गंगा अध्याय 10 अलंकार

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
(क) कविता में जहाँ-जहाँ अनुप्रास अलंकार आया है, उन पंक्तियों को खोजकर लिखिए।
उत्तर

पहले परिभाषा — पुस्तक के अनुसार ‘शतमुख’ और ‘शतरव’ में ‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति हो रही है, इसीलिए वहाँ अनुप्रास अलंकार है (पृष्ठ 172)। ‘रैदास के पद’ (पाठ 8) में यही बात इस तरह कही गई थी — जिस रचना में व्यंजन वर्णों की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है। ध्यान रखिए — आवृत्ति व्यंजन की देखी जाती है, स्वर की नहीं।

इस कविता में अनुप्रास लगभग हर पंक्ति में है। पूरी सूची —

#पंक्तिआवर्ती व्यंजनकहाँ-कहाँ और उसका प्रभाव
1“भारति, य, वियकरे!”जय, विजय — दो बार। ‘जय’ शब्द ही ‘विजय’ के भीतर दोबारा बज उठता है, इसलिए जयघोष दुगुना सुनाई देता है।
2-शस्य-मलधरे!”कनक (दो बार ‘क’), कमल — कुल तीन आवृत्तियाँ। ‘क’ की कड़ी ध्वनि पंक्ति को दृढ़ता देती है।
3लंका पदत शतद,”लंका, पदतल, शतदल — तीन आवृत्तियाँ। साथ में ‘त’ भी दो बार (पदतल, शतदल)। पंक्ति लहर की तरह लुढ़कती हुई चलती है।
4र्जितोर्मि सार-जल”गर्जितोर्मि, सागर — ‘ग’ की गहरी ध्वनि लहरों की गड़गड़ाहट का आभास देती है (ध्वन्यात्मकता)।
5“धोता शुचि रण युगल”शुचि, चरण — ‘च’ की आवृत्ति; कोमल ध्वनि, जो चरण-प्रक्षालन के भाव के अनुकूल है।
6“स्तव कर हु-अर्थ-रे!”ब / भबहु, भरे — दोनों सजातीय ओष्ठ्य ध्वनियाँ हैं, इसलिए कान इन्हें एक ही परिवार का मानता है।
7रु-तृण-न-लता सन,”त और वतरु, तृण में ‘त’; वन, वसन में ‘व’। एक ही पंक्ति में दो-दो आवृत्ति-शृंखलाएँ चल रही हैं।
8“अंल में खचित सुमन;”अंचल, खचित — ‘च’ की आवृत्ति, जो कढ़ाई जैसी बारीक़ ध्वनि पैदा करती है।
9वल ार हार गले।”धवल, धार — और साथ ही ‘धार–हार’ की भीतरी तुक। पूरी पंक्ति बहती हुई धारा की तरह सुनाई देती है। यह इस कविता का सबसे सुंदर अनुप्रास है।
10मुकुट शुभ्र हि-तुषार,”म / ट-तमुकुट का ‘म’ और हिम का ‘म’; मुकुट का ‘ट’ और तुषार का ‘त’ — सजातीय ध्वनियाँ मिलकर हल्की गूँज बनाती हैं।
11प्राप्रणव ओंकार,”प्रप्राण, प्रणव — दो बार पूरा संयुक्त वर्ण ‘प्र’ लौटता है, इसलिए यह पंक्ति मंत्र-जैसी लगती है। बहुत स्पष्ट अनुप्रास।
12“ध्वनित दिशाएँ उदार,”दिशाएँ, उदार — ‘द’ की आवृत्ति; खुली, गूँजती ध्वनि।
13तमुख-तरव-मुखरे!”श (और ‘मुख’ की पुनरुक्ति)यही पुस्तक का अपना उदाहरण है। ‘श’ दो बार, ‘शत’ पूरा शब्द दो बार, और ‘मुख’ भी दो बार (शतमुख, मुखरे) — तीन स्तरों की आवृत्ति एक ही पंक्ति में। इसी से अनेक दिशाओं से उठती ध्वनि का प्रभाव बनता है।
अनुप्रास यहाँ कर क्या रहा है: यह केवल सजावट नहीं है। तीन काम कर रहा है — (1) लय बनाता है, जिससे यह वंदना सामूहिक स्वर में गाई जा सकती है; (2) अर्थ को सुनाई देने लायक बनाता है — ‘ग’ से लहरों की गड़गड़ाहट, ‘ध’ से धारा का बहाव, ‘श’ से सौ स्वरों का गूँजना; और (3) पूरी कविता में ओज गुण भरता है, जो एक राष्ट्र-वंदना के लिए आवश्यक है। जहाँ ध्वनि और अर्थ एक साथ चलें, वहीं अलंकार सफल माना जाता है — इस कविता में यह बार-बार होता है।
पहचानने का तरीक़ा: पंक्ति को ऊँची आवाज़ में पढ़िए। जो व्यंजन कान पर बार-बार पड़े, वही आवर्ती व्यंजन है। और देखिए कि आवृत्त व्यंजन प्रायः पास-पास के शब्दों के आरंभ में आते हैं — तभी वे सुनाई देते हैं।
प्र2.
(ख) कविता की उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ रूपक अलंकार है। साथ ही यह भी बताइए कि कवि ने किस प्राकृतिक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर चित्रित किया है?
उत्तर

पहले परिभाषा — पुस्तक के अनुसार ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’ में ‘हिमालय को भारत का मुकुट कहा गया है। वास्तव में हिमालय मुकुट नहीं है, लेकिन कवि ने कल्पना के बल पर उसे मुकुट का रूप दे दिया … यहाँ गुण की अत्यंत समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद स्थापित किया गया है, इसीलिए यहाँ रूपक अलंकार है’ (पृष्ठ 172)। सीधा नियम यह है — जहाँ ‘जैसे’, ‘सा’, ‘सम’, ‘ज्यों’ जैसा कोई वाचक शब्द न हो और फिर भी एक वस्तु को दूसरी कह दिया गया हो, वहाँ रूपक है।

क — कविता में रूपक अलंकार वाली पंक्तियाँ

#पंक्तिउपमेय (जिस पर आरोप)उपमान (जिसका आरोप)अभेद किस गुण के कारण
1मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”हिमालय की श्वेत बर्फ़मुकुटदोनों सिर पर, दोनों उज्ज्वल, दोनों गौरव के चिह्न। (पुस्तक का अपना उदाहरण)
2“गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।”गंगा की उजली धारागले का हारदोनों लंबे, चमकीले और गले के पास से गुज़रने वाले; दोनों शोभा बढ़ाते हैं।
3“तरु-तृण-वन-लता वसन,”वृक्ष, तिनके, वन और लताएँवस्त्रदोनों शरीर को ढँकते हैं; हरियाली धरती को ओढ़ी हुई चादर-सी लगती है।
4अंचल में खचित सुमन;”देश के अंचलों में खिले फूलआँचल पर जड़े रत्नदोनों वस्त्र की शोभा बढ़ाते हैं; ‘खचित’ यानी जड़ा हुआ — जैसे कढ़ाई या नगीने।
5“लंका पदतल शतदल,”लंका द्वीपचरणों के नीचे खिला कमलदोनों जल पर टिके हुए, दोनों सुंदर; देवी-प्रतिमा के चरणों में कमल रखने की परंपरा से जुड़ा हुआ।
6प्राण प्रणव ओंकार,”भारत के प्राणओंकार (ॐ की नाद-शक्ति)दोनों अदृश्य, दोनों जीवन के आधार; जैसे साँस के बिना शरीर नहीं, वैसे ज्ञान-चेतना के बिना राष्ट्र नहीं।
7ज्योतिर्जल-कण”गंगा का जलज्योति (प्रकाश)जल स्वयं प्रकाश बन गया — धूप में चमकती बूँदें। (कर्मधारय समास और रूपक एक साथ।)
8भारति, जय, विजयकरे! … चरण युगल”भारतभूमिदेवी (जिसके चरण, वस्त्र, आँचल, गला और सिर हैं)यह पूरी कविता का मूल रूपक है, जिससे बाक़ी सारे रूपक निकलते हैं।

ख — कवि ने किस प्राकृतिक दृश्य या वस्तु को भारत का रूप मानकर चित्रित किया है

कवि ने भारत को एक देवी के रूप में देखा है और प्रकृति की हर वस्तु को उस देवी के शरीर का कोई अंग या आभूषण बना दिया है। पूरी योजना नीचे है —

प्राकृतिक दृश्य/वस्तुभारत का कौन-सा रूप बनीपंक्ति
लंका द्वीपचरणों के नीचे खिला कमल“लंका पदतल शतदल,”
गरजता समुद्रचरण धोने वाला सेवक / स्तुति करने वाला भक्त“गर्जितोर्मि सागर-जल / धोता शुचि चरण युगल”
वृक्ष, तिनके, वन, लताएँपहने हुए वस्त्र“तरु-तृण-वन-लता वसन,”
फूलआँचल पर जड़े रत्न“अंचल में खचित सुमन;”
गंगागले का श्वेत हार“गंगा ज्योतिर्जल-कण / धवल धार हार गले।”
हिमालय की बर्फ़सिर का मुकुट“मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,”
ओंकार की ध्वनिभारत के प्राण“प्राण प्रणव ओंकार,”
दिशाएँ और अनेक स्वरभारत की वाणी“ध्वनित दिशाएँ उदार, / शतमुख-शतरव-मुखरे!”
इस पूरी रूपक-योजना का अर्थ: जब भारत का शरीर ही प्रकृति है, तो प्रकृति की हानि देश की हानि हो जाती है — वन काटना उसके वस्त्र फाड़ना है, गंगा को गंदा करना उसका हार मैला करना है और ग्लेशियर पिघलाना उसका मुकुट गला देना है। इसीलिए यह कविता देशप्रेम और पर्यावरण-चेतना — दोनों एक साथ सिखाती है, और यही बात पुस्तक ‘मिलकर लें शपथ’ तथा ‘विषयों से संवाद’ के प्रश्नों में आगे बढ़ाती है।
उपमा और रूपक का अंतर, इसी कविता से:कनक-शस्य’ का अर्थ है ‘कनक के समान शस्य’ — यहाँ तुलना है, इसलिए यह उपमा की स्थिति है (समास के भीतर छिपी हुई)। पर ‘मुकुट शुभ्र हिम-तुषार’ में कवि यह नहीं कहता कि हिमालय मुकुट जैसा है — वह उसे ‘मुकुट’ कह ही देता है। इसीलिए वहाँ रूपक है। वाचक शब्द है तो उपमा, नहीं है तो रूपक — यही सबसे सरल कसौटी है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ