गंगा अध्याय 9 काव्य-पंक्ति और भाव

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥” (क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर

चेहरे पर मुख्य भाव होता — तीव्र क्रोध (रौद्र भाव), जिसके साथ तिरस्कार और व्यंग्य भी मिला हुआ होता।

कारण यह है कि ये पंक्तियाँ परशुराम के मुख से निकली हैं और उनमें तीन चीज़ें एक साथ हैं —

  • क्रोध — ‘रे’ और ‘तोहि’ जैसे तिरस्कारपूर्ण संबोधन।
  • चेतावनी — ‘काल बस बोलत’ यानी ‘तू मरने वाला है, तभी ऐसा बोल रहा है’।
  • व्यंग्य — ‘धनुही सम तिपुरारि धनु’ में वे लक्ष्मण की ही तुलना दोहराकर उसका उपहास करते हैं।

मंच पर इसे कैसे निभाया जाए — पूरी योजना

अंशचेहरे का भावस्वरशरीर की भाषा
रे नृप बालकतीखा तिरस्कार — भौंहें तनी हुई, आँखें सिकुड़ी हुई, होंठ कसे हुएएकदम ऊँचा और झटकेदार; ‘रे’ पर सबसे अधिक बलतर्जनी उठाकर सीधे लक्ष्मण की ओर संकेत; एक कदम आगे
काल बस बोलतगंभीर चेतावनी — भाव कठोर, पर आँखें स्थिरस्वर थोड़ा धीमा, पर भारी और ठहरा हुआफरसे वाला हाथ हल्का-सा ऊपर उठे
तोहि न सँभारतिरस्कार और खीझ‘न’ पर विशेष बल, फिर एक छोटा-सा ठहरावसिर हल्का-सा दाहिनी ओर झटका
धनुही सम तिपुरारि धनुव्यंग्य — एक तिरछी, कड़वी मुसकान जो तुरंत मिट जाए‘धनुही’ शब्द को खींचकर, चिढ़ाने वाले लहजे मेंहथेली उलटकर, मानो लक्ष्मण की बात लौटा रहे हों
बिदित सकल संसारदृढ़ घोषणा, गर्व-मिश्रितस्वर फिर ऊँचा और फैला हुआ; अंत पर पूरा ठहरावदोनों हाथ चारों ओर फैलाकर — ‘सारा संसार’
ध्यान रखने की बात: यह केवल ‘गुस्से का दृश्य’ नहीं है। यदि पूरी दो पंक्तियाँ एक ही स्वर में चीखकर बोल दी जाएँ, तो व्यंग्य मर जाएगा। असली कौशल बीच में स्वर बदलने में है — पहली पंक्ति में क्रोध, दूसरी पंक्ति में व्यंग्य। और ‘धनुही’ शब्द पर आते ही चेहरे पर एक क्षण की कड़वी मुसकान लाइए; उसी एक क्षण से दर्शक समझ जाएगा कि परशुराम लक्ष्मण की बात लौटाकर मार रहे हैं।
नमूना उत्तर (यदि एक-दो वाक्य में लिखना हो): “यदि मैं ये पंक्तियाँ मंच पर बोलता, तो मेरे चेहरे पर तीव्र क्रोध और तिरस्कार का भाव होता — भौंहें तनी हुईं, आँखें लाल और होंठ कसे हुए। ‘रे नृप बालक’ पर मेरा स्वर सबसे ऊँचा होता और उँगली सीधे लक्ष्मण की ओर उठी होती। पर ‘धनुही सम तिपुरारि धनु’ कहते समय चेहरे पर एक कड़वी, व्यंग्य-भरी मुसकान आ जाती, क्योंकि यहाँ परशुराम क्रोध के साथ-साथ लक्ष्मण की तुलना का उपहास भी कर रहे हैं।”
प्र2.
(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे— परशुराम, राजा जनक, लक्ष्मण, राम, सभा में उपस्थित अन्य राजा
उत्तर

नीचे पाँचों पात्रों के भाव, उनका प्रमाण और मंच पर उन्हें दिखाने का ढंग — तीनों एक साथ दिए गए हैं।

पात्रमुख्य भावप्रमाण-पंक्तिमंच पर कैसे दिखाएँ
परशुरामक्रोध (रौद्र), आवेश, अहंकार, तिरस्कार — और बीच में एक क्षण का वात्सल्य भी“अति रिस बोले बचन कठोरा।”
“उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥”
वात्सल्य के लिए — “दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥”
ऊँचा, गरजता स्वर; तनी भौंहें; फरसा बार-बार हिलता हुआ; तेज़ चाल। पर राम को देखते समय स्वर और दृष्टि — दोनों एक क्षण के लिए कोमल हो जाएँ।
राजा जनकभय, असहायता, विवशता, और शुरू में शिष्टता“अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।”
शिष्टता के लिए — “जनक बहोरि आइ सिरु नावा।”
झुके कंधे, नीची दृष्टि, हाथ जुड़े हुए; कोई संवाद नहीं, केवल मौन और एक-दो बार सूखे होंठों पर ज़ुबान फेरना। मौन ही उनका सबसे बड़ा अभिनय है।
लक्ष्मणनिर्भीकता, व्यंग्य/उपहास, स्वाभिमान, उग्रता, भ्रातृ-प्रेम“सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥”
“बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं…”
सीधी कमर, स्थिर मुसकान, बिना पलक झपकाए आँखों में आँखें डालकर देखना; स्वर ऊँचा नहीं, पर चुभता हुआ। ‘गोसाईं’ पर हल्का-सा सिर झुकाकर व्यंग्यपूर्ण आदर दिखाइए।
रामसंयम, विनम्रता, मर्यादा, धैर्य, समभाव, संवेदनशीलता“हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥”
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा…”
शांत मुद्रा, हाथ जुड़े हुए, दृष्टि नीची पर स्थिर; स्वर धीमा, सम और स्पष्ट। पूरे दृश्य में चेहरे का भाव लगभग अपरिवर्तित रहे — यही उनका सबसे कठिन अभिनय है
सभा में उपस्थित अन्य राजाभय, ईर्ष्या, कुटिलता, अवसरवादिता, चुप्पी“उठे सकल भय बिकल भुआला॥”
“कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥”
परशुराम के आते ही एक साथ खड़े होना; फिर एक-दूसरे की ओर तिरछी दृष्टि और आपस में फुसफुसाहट; जनक के चुप होने पर होंठों के कोने पर हल्की, छिपी हुई मुसकान।

दो अतिरिक्त पात्र, यदि आप मंचन में उन्हें भी लें —

पात्रभावप्रमाण-पंक्ति
सीताव्यग्रता, प्रतीक्षा, प्रेमजनित भय“अरध निमेष कलप सम बीता॥”
सुनयना (सीता की माता)चिंता, पश्चात्ताप, वात्सल्य“बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥”
यह अभ्यास क्यों दिया गया है: पुस्तक कहती है कि इस कविता में “परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है।” यानी परिस्थिति एक है, पर हर पात्र उसे अलग ढंग से भोगता है। इसी विविधता से नाटकीयता बनती है। यदि सब पात्र एक जैसा व्यवहार करते, तो न संवाद बनता, न संघर्ष — और कविता कविता न रह जाती, केवल समाचार बन जाती।
अभिनय का सुझाव: मंचन में सबसे कठिन भूमिका राम की है। क्रोध और व्यंग्य दिखाना आसान है, पर ‘न हर्ष, न विषाद’ दिखाना कठिन — क्योंकि इसमें कुछ करना नहीं, बल्कि कुछ न करना पड़ता है। जिस विद्यार्थी में सबसे अधिक ठहराव हो, उसे राम की भूमिका दीजिए।
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