प्र1.
“रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥” (क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
उत्तर
चेहरे पर मुख्य भाव होता — तीव्र क्रोध (रौद्र भाव), जिसके साथ तिरस्कार और व्यंग्य भी मिला हुआ होता।
कारण यह है कि ये पंक्तियाँ परशुराम के मुख से निकली हैं और उनमें तीन चीज़ें एक साथ हैं —
- क्रोध — ‘रे’ और ‘तोहि’ जैसे तिरस्कारपूर्ण संबोधन।
- चेतावनी — ‘काल बस बोलत’ यानी ‘तू मरने वाला है, तभी ऐसा बोल रहा है’।
- व्यंग्य — ‘धनुही सम तिपुरारि धनु’ में वे लक्ष्मण की ही तुलना दोहराकर उसका उपहास करते हैं।
मंच पर इसे कैसे निभाया जाए — पूरी योजना
| अंश | चेहरे का भाव | स्वर | शरीर की भाषा |
|---|---|---|---|
| “रे नृप बालक” | तीखा तिरस्कार — भौंहें तनी हुई, आँखें सिकुड़ी हुई, होंठ कसे हुए | एकदम ऊँचा और झटकेदार; ‘रे’ पर सबसे अधिक बल | तर्जनी उठाकर सीधे लक्ष्मण की ओर संकेत; एक कदम आगे |
| “काल बस बोलत” | गंभीर चेतावनी — भाव कठोर, पर आँखें स्थिर | स्वर थोड़ा धीमा, पर भारी और ठहरा हुआ | फरसे वाला हाथ हल्का-सा ऊपर उठे |
| “तोहि न सँभार” | तिरस्कार और खीझ | ‘न’ पर विशेष बल, फिर एक छोटा-सा ठहराव | सिर हल्का-सा दाहिनी ओर झटका |
| “धनुही सम तिपुरारि धनु” | व्यंग्य — एक तिरछी, कड़वी मुसकान जो तुरंत मिट जाए | ‘धनुही’ शब्द को खींचकर, चिढ़ाने वाले लहजे में | हथेली उलटकर, मानो लक्ष्मण की बात लौटा रहे हों |
| “बिदित सकल संसार” | दृढ़ घोषणा, गर्व-मिश्रित | स्वर फिर ऊँचा और फैला हुआ; अंत पर पूरा ठहराव | दोनों हाथ चारों ओर फैलाकर — ‘सारा संसार’ |
ध्यान रखने की बात: यह केवल ‘गुस्से का दृश्य’ नहीं है। यदि पूरी दो पंक्तियाँ एक ही स्वर में चीखकर बोल दी जाएँ, तो व्यंग्य मर जाएगा। असली कौशल बीच में स्वर बदलने में है — पहली पंक्ति में क्रोध, दूसरी पंक्ति में व्यंग्य। और ‘धनुही’ शब्द पर आते ही चेहरे पर एक क्षण की कड़वी मुसकान लाइए; उसी एक क्षण से दर्शक समझ जाएगा कि परशुराम लक्ष्मण की बात लौटाकर मार रहे हैं।
नमूना उत्तर (यदि एक-दो वाक्य में लिखना हो): “यदि मैं ये पंक्तियाँ मंच पर बोलता, तो मेरे चेहरे पर तीव्र क्रोध और तिरस्कार का भाव होता — भौंहें तनी हुईं, आँखें लाल और होंठ कसे हुए। ‘रे नृप बालक’ पर मेरा स्वर सबसे ऊँचा होता और उँगली सीधे लक्ष्मण की ओर उठी होती। पर ‘धनुही सम तिपुरारि धनु’ कहते समय चेहरे पर एक कड़वी, व्यंग्य-भरी मुसकान आ जाती, क्योंकि यहाँ परशुराम क्रोध के साथ-साथ लक्ष्मण की तुलना का उपहास भी कर रहे हैं।”