पूरी भरी हुई तालिका इस प्रकार है (पहली पंक्ति पुस्तक ने स्वयं उदाहरण के रूप में दी है) —
| भाव / मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
|---|---|---|---|
| चिंता | “बिधि अब सँवरी बात बिगारी” | सीता की माता सुनयना | पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित |
| क्रोध | “अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥” | परशुराम | अपने आराध्य शिव का धनुष खंडित होकर धरती पर पड़ा देखना — “देखे चापखंड महि डारे॥” उनके लिए यह धार्मिक और व्यक्तिगत, दोनों तरह की चोट है। |
| व्यग्रता | “भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥” | सीता | परशुराम का क्रोधी स्वभाव सुनकर राम के लिए भय; धनुष राम ने तोड़ा है और मुनि तोड़ने वाले को शत्रु कह चुके हैं। प्रतीक्षा के कारण आधा पल भी कल्प जैसा लंबा लग रहा है। |
| भय | “अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं।” (तथा “उठे सकल भय बिकल भुआला॥” और “सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”) | राजा जनक (तथा सभा के सभी राजा, नगरवासी, देव-मुनि) | परशुराम के कठोर वचन, अपमानजनक संबोधन और पूरे राज्य को उलट देने की धमकी। भय इतना है कि राजा उत्तर तक नहीं दे पाते। |
| संयम / विनम्रता | “हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥” तथा “नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥” | श्रीराम | स्वभावगत धैर्य और मर्यादा; वे जानते हैं कि उत्तेजना से स्थिति बिगड़ेगी और सभा में सीता, सुनयना, जनक तथा नगरवासी सब उपस्थित हैं। इसलिए सत्य स्वीकार करते हुए भी वे शालीन बने रहते हैं। |
| ईर्ष्या / कुटिलता | “कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥” | सभा में उपस्थित अन्य (कुटिल) राजा | वे स्वयं शिव-धनुष नहीं उठा सके थे और स्वयंवर में अपमानित हुए थे। जनक को संकट में देखकर उन्हें अपने अपमान का बदला-सा लगा, इसलिए वे मन-ही-मन प्रसन्न हुए। |
हर पंक्ति क्यों चुनी गई — संक्षिप्त तर्क
- क्रोध: ‘अति रिस’ और ‘बचन कठोरा’ — दोनों शब्द सीधे क्रोध के हैं, और ‘जड़’ संबोधन क्रोध की मात्रा बता देता है। यह पंक्ति टूटे धनुष को देखने के ठीक बाद आती है, इसलिए कारण और भाव दोनों एक साथ सिद्ध हो जाते हैं।
- व्यग्रता: व्यग्रता का अर्थ है बेचैनी। सीता कुछ बोलती नहीं, कुछ कर नहीं सकतीं — इसलिए उनकी बेचैनी समय के माप में प्रकट होती है, जो व्यग्रता का सबसे सूक्ष्म चित्रण है।
- भय: ‘अति डरु’ में भय का नाम स्वयं मौजूद है। और भय केवल जनक तक सीमित नहीं है — “सुर मुनि नाग नगर नर नारी” वाली चौपाई बताती है कि वह पूरे लोक में फैला हुआ है।
- संयम/विनम्रता: इसके लिए दो पंक्तियाँ ज़रूरी हैं — एक जो भीतर की स्थिति बताए (‘न हरषु बिषादु’) और एक जो बाहर का व्यवहार दिखाए (‘दास तुम्हारा’)। संयम भीतर होता है, विनम्रता बाहर दिखती है।
- ईर्ष्या/कुटिलता: ‘मन माहीं’ शब्द सबसे महत्वपूर्ण है — यह हर्ष चेहरे पर नहीं आया। ईर्ष्या हमेशा भीतर ही रहती है, इसीलिए वह पहचानी नहीं जाती और इसीलिए तुलसी को ‘कुटिल’ विशेषण जोड़ना पड़ा।