शारदा अध्याय 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-06

इस अध्याय के बारे में

पाठ-परिचय — पाठ का आरम्भ एक छोटे गद्यांश से होता है : ‘संस्कृतं भारतदेशस्य सम्पदस्ति। अस्मिन् भारतीयानां ज्ञानवैभवं सञ्चितमस्ति।’ अर्थात् संस्कृत भारत की सम्पत्ति है, इसी में भारतीयों का ज्ञानवैभव संचित है, संस्कृत पढ़ने से मनुष्य सुसंस्कृत बनता है, और भारतीय भाषाओं को भली-भाँति पढ़ने के लिए संस्कृत अत्यन्त अपेक्षित है। इसी विषय को लेकर कवि ने यह सुन्दर गीत रचा है। विधा तथा रचयिता — यह गीत है, कोई कथा या संवाद नहीं। छह श्लोकों की चारों पंक्तियाँ ‘…संस्कृतम्’ पर समाप्त होती हैं — यही आवृत्ति गीत को लय और बल देती है। रचयिता पण्डित वासुदेव-शास्त्री द्विवेदी ने सरल संस्कृत में अनेक ग्रन्थ लिखे और ‘परमार्थसुधा’ नामक संस्कृत-पत्रिका का सम्पादन भी किया। विषयवस्तु — छहों श्लोक संस्कृत के छह पक्षों को गिनाते हैं — (१) राष्ट्रीय एकता तथा भारतीयता, (२) मन-वाणी का संस्कार तथा सद्गुण, (३) विश्वबन्धुत्व

  1. पाठ-परिचयः
  2. गीतम्
  3. सर्वं शब्देन भासते
  4. अत्र इदम् अवधेयम्
  5. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  6. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  7. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  8. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  9. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  10. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  11. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  12. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  13. स्वाध्यायान्मा प्रमदः
  14. यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्
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