कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 1 सत्यं शिवं सुन्दरं संस्कृतम् के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-19

इस अध्याय के बारे में

यह क्या है — ‘अन्वयः’ शारदा का पहला परिशिष्ट है (पृष्ठ 161–166)। परिशिष्ट पाठ नहीं होता — उसमें न कथा है, न श्लोक-संग्रह, न प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल यह सिखाया गया है कि श्लोक पढ़ने की एक विधि होती है, और वह विधि क्या है। समस्या क्या है — पुस्तक स्वयं आरम्भ में कहती है — ‘सामान्यतः श्लोकेषु कर्तृपदं कर्मपदं तृतीयादिविभक्त्यन्तं पदं क्रियापदं विशेषणादिकं च छन्दसः अनुगुणं पूर्वापरं भवितुमर्हति।’ अर्थात् श्लोक में पदों का क्रम अर्थ के अनुसार नहीं, छन्द के अनुसार बनता है — इसीलिए पढ़ने वाले को पदों का पारस्परिक सम्बन्ध जोड़ने में कठिनाई (कष्टम्) होती है। समाधान क्या है — ‘अन्वय’ का अर्थ है पदों को गद्य के स्वाभाविक क्रम में सजाना — कर्ता, कर्म, क्रिया। पुस्तक कहती है कि जब तक यह क्रम न बने, तब तक श्लोक का अर्थ समझा ही नहीं जा सकता — ‘तदनन्तरमेव श्लोकस्य अर्थमवगन्तुं शक्यते’। दो विधियाँ — पुस्तक श

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पदअर्थउदाहरणटिप्पणी
अन्वयःश्लोक के पदों को गद्य के स्वाभाविक क्रम में सजानासम्पूर्णकुम्भः शब्दं न करोतिअर्थ लिखने से पहले का पहला काम
पदच्छेदःसन्धि तोड़कर पदों को अलग-अलग करनाशास्त्राण्यधीत्यापि → शास्त्राणि, अधीत्य, अपिअन्वय से भी पहले यही करना पड़ता है
दण्डान्वयःदण्ड (लकीर) की तरह एक ही क्रम में पूरा अन्वय(केचन) शास्त्राणि अधीत्यापि मूर्खाः भवन्तिदण्डवत् अन्वयः दण्डान्वयः
खण्डान्वयःखण्ड-खण्ड करके, प्रश्नोत्तर से किया गया अन्वयकः न करोति ? — सम्पूर्णकुम्भः न करोतिआकाङ्क्षाविधिः भी इसी का नाम है
अध्याहारःश्लोक में न छपा, पर अर्थ के लिए आवश्यक पद जोड़ना(केचन), (भवति), (यथा)जोड़ा हुआ पद कोष्ठक में लिखते हैं
सुप्तं पदम्वह छिपा हुआ पद जिसका अध्याहार करना है‘शास्त्राणि अधीत्यापि के मूर्खाः भवन्ति ?’ का उत्तरपुस्तक का अपना शब्द (पृष्ठ 162)
आकाङ्क्षाअपेक्षित विषय को जानने की इच्छा‘पठति’ सुनकर ‘कः पठति ?’ ‘किं पठति ?’खण्डान्वय के प्रश्न इसी से बनते हैं
योग्यतादो पदों के परस्पर जुड़ने की पात्रता‘गगने पुष्पं विकसति’ — यहाँ योग्यता नहींअर्थ सम्भव हो, तभी अन्वय सम्भव
आसत्तिः (सन्निधिः)पदों का बिना अन्तराल के, पास-पास बोला जाना‘सः पुस्तकं पठति’ एक ही साँस मेंबीच में पाँच निमेष का अन्तर पड़े तो अन्वय टूट जाता है
तात्पर्यम्शब्द से वक्ता का अभीष्ट अर्थ पकड़ना‘शतायुर्भव’ = ‘चिरञ्जीवी भव’अर्थ चूका तो अन्वय भी चूक जाता है
कर्तृपदम्क्रिया करने वाला पद, प्रथमा विभक्ति मेंसम्पूर्णकुम्भः, घटः, विद्वान्, जनःअन्वय में प्रायः सबसे पहले
कर्मपदम्जिस पर क्रिया का फल पड़े, द्वितीया विभक्ति मेंशब्दम्, घोषम्, गर्वम्, साट्टहासम्कर्ता के बाद, क्रिया से पहले
क्रियापदम्वाक्य की क्रियाकरोति, उपैति, जल्पति, भवन्तिदण्डान्वय में सबसे अन्त में — ‘सर्वान्ते क्रियापदं लिखेत्’
विशेषणम् — विशेष्यम्गुण बताने वाला पद और जिसका गुण बताया जाएअर्धः (विशेषण) घटः (विशेष्य)दण्डान्वय में विशेषण पहले, विशेष्य बाद में
क्त्वान्त · ल्यबन्त · तुमुन्नन्त‘त्वा’, ‘य’ और ‘तुम्’ प्रत्यय वाले अव्यय-कृदन्तकृत्वा, गत्वा · अधीत्य, आगत्य · पठितुम्, गन्तुम्स्मृति-श्लोक में इन्हीं का विशेष उल्लेख है
चरणः (पादः)श्लोक का चौथाई भाग‘प्रथमचरणे क्रियापदं किम् ?’खण्डान्वय चरण-दर-चरण चलता है
  1. अन्वयः
  2. दण्डान्वयविधिः
  3. दण्डान्वय
  4. खण्डान्वयविधिः
  5. चत्वारि सहकारि-कारणानि
  6. आकाङ्क्षाविधिः
  7. खण्डान्वय
  8. अन्वय करने की पूरी विधि
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