कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
यह क्या है — ‘समासः’ शारदा का दूसरा परिशिष्ट है (पृष्ठ 167–176)। परिशिष्ट पाठ नहीं होता — उसमें न कथा है, न श्लोक, न प्रश्न-खण्ड। यहाँ केवल संस्कृत की एक व्याकरणिक प्रक्रिया — समास — क्रम से समझाई गई है, और उसके हर भेद की उदाहरण-तालिका दी गई है। समास क्या है — पुस्तक का पहला ही वाक्य है ‘समसनं समासः भवति। समसनं नाम सङ्क्षेपणम् इत्यर्थः।’ अर्थात् समास = संक्षेपण । दो, तीन या अधिक अर्थयुक्त पद मिलकर जब एक पद बन जाते हैं, वही समास है — जैसे ‘महा’ + ‘पुरुष’ = महापुरुषः । समास किन में होता है — समास सामान्यतः सुबन्त पदों के बीच होता है, और एक बार में दो-दो सुबन्तों के बीच; केवल द्वन्द्व में एक साथ बहुत-से सुबन्तों का समास हो जाता है (हरिश्च हरश्च गुरुश्च = हरिहरगुरवः)। सबसे बड़ी शर्त यह है कि दोनों पदों में परस्पर अन्वय हो — अन्वय नहीं तो समास भी नहीं। विग्रह — समस्तपद का अर्थ खोलकर बताने वाला
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| पद | अर्थ | उदाहरण | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| समासः | अर्थवान् पदों का एकीभवन — ‘समसनं नाम सङ्क्षेपणम्’ | महा + पुरुष = महापुरुषः | संक्षेप ही समास का प्रयोजन है |
| समस्तपदम् | समास बनने के बाद बना हुआ एक पद | सीतापतिः | इसी से विभक्ति जुड़ती है |
| विग्रहवाक्यम् | समस्तपद का अर्थ खोलने वाला वाक्य | राष्ट्रस्य नायकः | ‘वृत्त्यर्थस्य अवबोधकं वाक्यं विग्रहः’ |
| पूर्वपदम् | समास में पहले प्रयुक्त पद | सीतापतिः में ‘सीता’ | अव्ययीभाव में यही प्रधान |
| उत्तरपदम् | समास में बाद में प्रयुक्त पद | सीतापतिः में ‘पतिः’ | तत्पुरुष में यही प्रधान |
| सुबन्तम् | सुप् (विभक्ति) प्रत्यय से युक्त नाम-पद | सीतायाः, पतिः | समास सुबन्तों के बीच ही होता है |
| प्रातिपदिकम् | विभक्ति-रहित मूल शब्द | सीता, पति, सीतापति | समास बनते ही दोनों पद प्रातिपदिक हो जाते हैं |
| अन्यपदार्थः | समास के दोनों पदों से बाहर का अर्थ | पीताम्बरः = विष्णुः | बहुव्रीहि की पहचान |
| केवलसमासः | तत्पुरुषादि संज्ञाओं से रहित, केवल ‘समास’ संज्ञा वाला | पूर्वं भूतः = भूतपूर्वः | पुस्तक का पहला मुख्य भेद |
| विशेषसमासः | जिसका विशेष नाम है — तत्पुरुष, द्वन्द्व, बहुव्रीहि, अव्ययीभाव | रामदूतः, रामकृष्णौ | पुस्तक का दूसरा मुख्य भेद |
| स्वपदविग्रहः | समास के अपने पदों से किया गया विग्रह | कृष्णसखा → कृष्णस्य सखा | ‘समासघटकपदसहितं वाक्यम्’ |
| अस्वपदविग्रहः | समास से बाहर के पद लाकर किया गया विग्रह | यथामति → मतिम् अनतिक्रम्य | नित्यसमास में यही होता है |
| नित्यसमासः | जिसका विग्रह अपने ही पदों से सम्भव नहीं | यथाशक्ति, अभ्यग्नि | सदा अस्वपदविग्रह |
| प्रधानपदम् | जिस पद का क्रियापद से सीधा अन्वय बने | रामदूतः गच्छति में ‘दूतः’ | समास-निर्णय की कुंजी |
अभ्यास
- समासः
- विग्रहवाक्यम् तथा उसके दो भेद
- समास के मुख्य भेद
- समासस्य निर्णयः
- तत्पुरुषसमासः
- कर्मधारयसमासः
- द्विगुः समासः तथा नञ्-प्रभृतिः तत्पुरुषसमासः
- द्वन्द्वसमासः
- बहुव्रीहिसमासः
- अव्ययीभावसमासः
- पूरे परिशिष्ट का सार