शारदा अध्याय 2 सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलम् अर्थः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-06

इस अध्याय के बारे में

पाठ-परिचयः — भारतीय धर्मशास्त्रों में अनेक ऐसी सूक्तियाँ हैं जो मानव-जीवन के यथार्थ तत्त्व का प्रतिपादन करती हैं। उन्हीं में से एक प्रसिद्ध सूत्ररूप वाक्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र में है — “सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलम् अर्थः।” यही वाक्य इस पाठ का शीर्षक और आधार दोनों है। मूल विषय — वास्तविक सुख का आधार धर्म है और धर्मपालन का आधार अर्थ (धन) है। ‘अर्थ’ का तात्पर्य है वह धन जो सब प्रकार के आजीविका-व्यवहार का प्रमुख साधन है। जीवन में धर्मः, अर्थः, सुखम् — इन तीनों का परस्पर सम्बन्ध अविच्छिन्न है। जो न्यायपूर्वक धनोपार्जन करता है, वही धर्मपालन में समर्थ होता है और धर्मपालन से दीर्घकालिक सुख पाता है। धन क्यों आवश्यक है — अन्न, वस्त्र, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्यसेवा आदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन चाहिए। पर्याप्त धन के अभाव में स्वकर्तव्य-पालन कठिन हो जाता है; स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवा, दा

  1. पाठ-बोधः (पाठ्य प्रश्न)
  2. सूक्तीनां श्लोकानां च अर्थः
  3. सर्वं शब्देन भासते
  4. अत्र इदम् अवधेयम्
  5. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  6. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  7. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  8. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  9. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  10. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  11. स्वाध्यायान्मा प्रमदः
  12. यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्
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