कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 2 कर्मधारयसमासः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र१.
कर्मधारय किसे कहते हैं, और वह तत्पुरुष के भीतर क्यों गिना जाता है?
उत्तर

पुस्तक का वाक्य है — कर्मधारयसमासः अपि तत्पुरुषसमासान्तर्गतः भवति। कर्मधारयसमासः नवधा।

पहचान — कर्मधारय वह तत्पुरुष है जिसमें दोनों पद एक ही विभक्ति में (प्रायः प्रथमा में) हों और उनमें विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का सम्बन्ध हो।

प्रश्नकर्मधारय में उत्तर
दोनों पदों की विभक्ति ?एक ही (समानाधिकरण) — नीलः मेघः — दोनों प्रथमा
दोनों में सम्बन्ध ?विशेषण–विशेष्य, या उपमान–उपमेय, या अवधारणा (एक ही वस्तु के दो नाम)
प्रधान पद ?उत्तरपद — इसीलिए तत्पुरुष के भीतर है
विग्रह में क्या जुड़ता है ?कुछ नहीं, या ‘इव’ / ‘एव’ / ‘इति’ — विभक्ति नहीं बदलती

विभक्तितत्पुरुष और कर्मधारय में अन्तर —

विभक्तितत्पुरुषकर्मधारय
विग्रह में विभक्तिपूर्वपद पर अलग विभक्ति — वृक्षस्य मूलम्दोनों पर एक ही विभक्ति — नीलः मेघः
सम्बन्धकारक-सम्बन्ध (का, से, के लिए…)विशेषण-सम्बन्ध (कैसा?)
उदाहरणराजपुरुषः (राजा का पुरुष)महापुरुषः (महान् पुरुष)
‘कर्मधारय’ नाम का अर्थ: इसमें एक ही वस्तु दो ‘कर्म’ (भूमिकाएँ) धारण करती है — मेघ ‘नीला’ भी है और ‘मेघ’ भी; नर ‘नर’ भी है और ‘व्याघ्र-सा’ भी। दोनों पद एक ही वस्तु की बात कर रहे हैं, इसीलिए दोनों की विभक्ति एक रहती है। यही ‘समानाधिकरण’ शब्द का अर्थ है — एक ही अधिकरण (आश्रय) वाले।
प्र२.
कर्मधारय के नौ भेद कौन-से हैं — पुस्तक की पूरी तालिका दीजिए।
उत्तर

पुस्तक की तालिका, नौ भेद, ज्यों-की-त्यों (पृष्ठ 171–172) —

क्र.संकर्मधारयसमासःविग्रहवाक्यम्समासः (समस्तपदम्)
१.विशेषणपूर्वपदःनीलो मेघःनीलमेघः
२.विशेषणोत्तरपदःवैयाकरणः खसूचिःवैयाकरणखसूचिः
३.विशेषणोभयपदःशीतम् उष्णम्शीतोष्णम्
४.उपमानपूर्वपदःमेघ इव श्यामःमेघश्यामः
५.उपमानोत्तरपदःनरः व्याघ्रः इवनरव्याघ्रः
६.अवधारणापूर्वपदःविद्या इव धनम्विद्याधनम्
७.सम्भावनापूर्वपदःआम्रः इति वृक्षःआम्रवृक्षः
८.मध्यमपदलोपःशाकप्रियः पार्थिवःशाकपार्थिवः
९.मयूरव्यंसकादिःअन्यो देशःदेशान्तरम्

हर भेद क्या कह रहा है —

भेदपहचानअर्थ
१. विशेषणपूर्वपदविशेषण पहले, विशेष्य बाद मेंनीला मेघ
२. विशेषणोत्तरपदविशेषण बाद मेंवैयाकरण जो ‘खसूचि’ (आकाश में उँगली दिखाने वाला, अर्थात् व्यर्थ बड़बोला) है
३. विशेषणोभयपददोनों पद विशेषणशीत और उष्ण — दोनों गुण
४. उपमानपूर्वपदइव लगता है, उपमान पहलेमेघ के समान श्याम
५. उपमानोत्तरपदइव लगता है, उपमान बाद मेंव्याघ्र के समान नर
६. अवधारणापूर्वपददोनों एक ही वस्तु — रूपकविद्या ही धन है
७. सम्भावनापूर्वपदइति लगता है — ‘यह नाम का’आम्र नामक वृक्ष
८. मध्यमपदलोपबीच का पद लुप्तशाकप्रिय पार्थिव → ‘प्रिय’ लुप्त होकर शाकपार्थिवः
९. मयूरव्यंसकादिपदों का क्रम बदल जाता हैअन्य देश → देशान्तरम् (‘अन्य’ आगे चला गया, रूप भी बदला)
पुस्तक की छपाई पर दो टिप्पणियाँ (जैसा छपा है वैसा ही ऊपर दिया गया है) —
• भेद ६ में पुस्तक ने विग्रह छापा है ‘विद्या इव धनम्’। ‘अवधारणा’ का अर्थ ही ‘एव’ है, अतः व्याकरण की दृष्टि से यहाँ ‘विद्या एव धनम्’ अपेक्षित है (जैसे — पुरुषः एव व्याघ्रः = पुरुषव्याघ्रः)। ‘इव’ हो तो वह उपमान होगा, अवधारणा नहीं। ऊपर तालिका में मुद्रित पाठ ही रखा गया है; परीक्षा में विग्रह लिखते समय विद्या एव धनम् लिखना अधिक सुरक्षित है और शिक्षक से पुष्टि कर लीजिए।
• भेद ९ का नाम शास्त्रीय ग्रन्थों में ‘मयूरव्यंसकादि’ ही है — यह एक आकृतिगण है, अर्थात् इसमें ऐसे बहुत-से समास आते हैं जिनका क्रम या रूप नियम से बाहर बदल जाता है।
‘शाकपार्थिवः’ को मध्यमपदलोप क्यों कहते हैं: पूरा अर्थ है ‘शाकप्रियः पार्थिवः’ — शाक जिसे प्रिय है, वह राजा। समास बनने पर बीच का पद ‘प्रिय’ गायब हो गया और केवल ‘शाक + पार्थिव’ बचा। ऐसे समास का विग्रह करते समय लुप्त पद को लौटाना पड़ता है, वरना अर्थ ‘शाक रूपी राजा’ जैसा गलत निकलेगा।
प्र३.
अभ्यास के लिए (स्वयं करें) — कर्मधारय
उत्तर
सूचना — ये प्रश्न पुस्तक में नहीं हैं। केवल स्वयं जाँच के लिए, उत्तर सहित।
समस्तपदम्विग्रहःकर्मधारय का भेद
महापुरुषःमहान् पुरुषःविशेषणपूर्वपदः
पीताम्बरम्पीतम् अम्बरम्विशेषणपूर्वपदः (ध्यान दीजिए — यही पद बहुव्रीहि में ‘पीताम्बरः = विष्णुः’ हो जाता है)
कृष्णसर्पःकृष्णः सर्पःविशेषणपूर्वपदः
चन्द्रमुखीचन्द्रः इव मुखं यस्याःयह कर्मधारय नहीं, बहुव्रीहि है — क्योंकि प्रधान ‘वह स्त्री’ है
मुखचन्द्रःमुखम् एव चन्द्रःअवधारणापूर्वपदः (रूपक)
सिंहपुरुषःसिंहः इव पुरुषःउपमानपूर्वपदः
पुरुषसिंहःपुरुषः सिंहः इवउपमानोत्तरपदः
गङ्गानदीगङ्गा इति नदीसम्भावनापूर्वपदः
कृष्णश्वेतम्कृष्णं च श्वेतं चविशेषणोभयपदः
ऊपर की चौथी पंक्ति ही असली परीक्षा है: ‘चन्द्रमुखी’ में विग्रह के अन्त में ‘यस्याः’ आ गया — जैसे ही विग्रह में यस्य/यस्याः/येन जैसा सर्वनाम आए, समझ लीजिए कि प्रधान पद समास के बाहर है, और वह बहुव्रीहि है, कर्मधारय नहीं। कर्मधारय में ऐसा कोई सर्वनाम नहीं आता।
क्या यह उपयोगी रहा?