खरगोश पेड़ के नीचे सो रहा था। तभी जोर की आवाज हुई — धम्म! वह चौंककर उठ गया।
पाठ में लिखा है — “खरगोश ने इधर-उधर देखा। उसे कुछ दिखाई नहीं दिया।” आवाज तो हुई, पर उसका कारण नहीं दिखा। इसी से उसे लगा कि आसमान गिर रहा है।
यदि मैं खरगोश के स्थान पर होता —
- मैं पहले रुक जाता। भागता नहीं।
- मैं ऊपर पेड़ की ओर देखता।
- फिर जमीन पर देखता कि गिरा क्या है।
- मुझे वहाँ बड़ा-सा फल दिख जाता। मेरा डर खत्म हो जाता।