कक्षा ४ हिंदी अध्याय 6 पत्र की यात्रा के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
प्राचीन काल में संदेश या पत्र भेजने के कौन-कौन से तरीके थे?
उत्तर

पुस्तक के अनुसार चार तरीके थे—

  1. दूत — संदेश या पत्र भेजने के लिए व्यक्ति-विशेष होते थे, जिन्हें दूत कहा जाता था। कम दूरी के लिए दूत पैदल ही जाकर पत्र पहुँचा देते थे।
  2. पक्षी — लंबी दूरी के लिए पक्षियों, विशेषकर कबूतरों द्वारा पत्र भेजे जाते थे।
  3. बारी-बारी दौड़ने वाले दूत — अति आवश्यक पत्राचार के लिए दूत बारी-बारी से दौड़कर पत्र पहुँचाते थे।
  4. अश्वदूत — लंबी दूरी तक संदेश पहुँचाने के लिए अश्वदूत अर्थात् घुड़सवारों द्वारा भी पत्र भेजे जाते थे।
क्यों अलग-अलग तरीके: दूरी के हिसाब से तरीका बदल जाता था। पास के गाँव के लिए पैदल दूत काफी था। दूर के नगर के लिए घोड़ा या कबूतर चाहिए था, क्योंकि वे तेज़ होते हैं।
प्र2.
‘बारी-बारी से दौड़कर’ पत्र पहुँचाने का तरीका क्या था? वह जल्दी क्यों पहुँचता था?
उत्तर

इस तरीके में एक दूत पत्र लेकर कुछ निश्चित दूरी तक दौड़ता था। उसके बाद वह दूसरे संदेशवाहक को पत्र पकड़ा देता था। फिर दूसरा दूत आगे दौड़ता था।

क्यों जल्दी पहुँचता था: एक ही आदमी बहुत दूर तक नहीं दौड़ सकता, वह थक जाता है। पर जब हर दूत थोड़ी दूरी दौड़े, तो कोई नहीं थकता और सब पूरी तेज़ी से दौड़ते हैं। इसी से पत्र बहुत जल्दी पहुँच जाता था।
ध्यान दीजिए: यह तरीका केवल अति आवश्यक पत्राचार के लिए काम में लाया जाता था, क्योंकि इसमें कई दूत लगते थे।
प्र3.
भारत में डाक विभाग की स्थापना कब हुई? आज पत्र भेजने के लिए कौन-सी सुविधा उपलब्ध है?
उत्तर

भारत में डाक विभाग की स्थापना सन् 1854 में हुई। इसके बाद देशभर में डाकघर खोले गए।

आज इस यात्रा में स्पीड पोस्ट जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं।

क्यों डाकघर खोले गए: जब हर नगर और गाँव में डाकघर खुल गया, तब हर व्यक्ति चिट्ठी भेज सका। पहले तो केवल राजा-महाराजा ही दूत भेज पाते थे।
जोड़कर देखिए: पुराने समय में दूत पैदल या घोड़े पर जाता था। आज चिट्ठी डाक पेटी, डाकघर और डाकिया भैया/बहना के रास्ते से पते पर पहुँचती है।
क्या यह उपयोगी रहा?