कक्षा ५ हमारा अद्भुत संसार अध्याय 2 आइए विचार करें के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
पता कीजिए कि आपके राज्य से होकर कौन-सी नदियाँ बहती हैं? (क) इनका उपयोग किन कार्यों में किया जा रहा है? (ख) क्या उन पर बाँध बनाए गए हैं?
उत्तर

पता कैसे करें: मानचित्रावली में या विद्यालय के दीवार-मानचित्र में अपने राज्य का मानचित्र देखिए और नीली रेखाएँ खोजिए। नाम शिक्षक या किसी बड़े से पूछिए, और यह भी पूछिए कि आपके नगर को जल किस बाँध से मिलता है।

राज्यमुख्य नदियाँउन पर बना एक बाँध
महाराष्ट्रगोदावरी, कृष्णा, भीमा, ताप्तीगोदावरी पर जायकवाड़ी
तेलंगानागोदावरी, कृष्णा, मंजीरागोदावरी पर श्रीराम सागर परियोजना
आंध्र प्रदेशगोदावरी, कृष्णा, पेन्नागोदावरी पर पोलवरम बाँध
ओडिशामहानदी, ब्राह्मणी, शबरीमहानदी पर हीराकुंड
उत्तर प्रदेशगंगा, यमुना, गोमतीरिहंद पर रिहंद बाँध
मध्य प्रदेशनर्मदा, चंबल, बेतवानर्मदा पर इंदिरा सागर / सरदार सरोवर
असमब्रह्मपुत्र, बराककोपिली जलविद्युत परियोजना
कर्नाटककावेरी, कृष्णा, तुंगभद्राकावेरी पर कृष्णराज सागर
तमिलनाडुकावेरी, वैगई, पालारकावेरी पर मेट्टूर बाँध
पंजाबसतलुज, ब्यास, रावीसतलुज पर भाखड़ा बाँध

(क) इनका उपयोग किन कार्यों में होता है। नगरों और गाँवों के लिए पेयजल; नहरों से खेतों की सिंचाई; कारखानों के लिए जल; मछली पकड़ना; नाव से परिवहन; बाँधों पर विद्युत उत्पादन; उत्सव, मेले और पवित्र स्नान; तथा नौका-विहार और पक्षी-दर्शन जैसा पारिस्थितिक पर्यटन।

(ख) क्या उन पर बाँध बनाए गए हैं। हाँ — भारत की लगभग हर बड़ी नदी पर बाँध हैं। अध्याय स्वयं कहता है कि अकेले गोदावरी का जल 900 से अधिक बाँध संग्रहित करते हैं। बाँध शुष्क ऋतु के लिए जल भंडारित करता है, नहरों और नगरों को जल देता है, विद्युत बनाता है और कुछ बाढ़ का जल भी रोक लेता है।

नमूना उत्तर: “मेरे राज्य से गोदावरी और मंजीरा बहती हैं। इनका जल हमारे नगर में पीने के लिए, नहरों से धान के खेतों की सिंचाई के लिए, मछली पकड़ने के लिए और विद्युत बनाने के लिए उपयोग होता है। हाँ, इन पर बाँध बने हैं — गोदावरी पर श्रीराम सागर परियोजना है और हमारे नल का जल उसी से आता है।”

हर राज्य का उत्तर अलग क्यों है: किसी राज्य की नदियाँ उसकी भूमि की बनावट से तय होती हैं और उसके बाँध इस बात से कि कहाँ कोई सँकरी घाटी रोकी जा सकती थी। इसलिए किन्हीं दो राज्यों का उत्तर एक जैसा नहीं होता — किंतु तीन उपयोग सब जगह एक जैसे हैं: पीना, खेती और आजीविका।
प्र2.
अपने दादा-दादी या माता-पिता से अपने क्षेत्र की नदियों से संबंधित कहानियों अथवा उत्सवों के विषय में सूचना प्राप्त कीजिए और विद्यालय में उस पर प्रस्तुति दीजिए।
उत्तर

यह कार्य अच्छी तरह कैसे करें:

  1. दादा-दादी या किसी बड़े के पास बैठकर पूछिए — “हमारी नदी से जुड़ी कोई कहानी या उत्सव है क्या?” उन्हें धीरे-धीरे सुनाने दीजिए।
  2. चार बातें लिख लीजिए: कहानी या उत्सव का नाम, वह कब होता है, लोग क्या करते हैं, और उसमें नदी का क्या महत्व है।
  3. एक छोटी व्यक्तिगत स्मृति भी पूछिए — “जब आप मेरी आयु के थे तो इस उत्सव में क्या करते थे?” कक्षा को यही भाग सबसे अच्छा लगेगा।
  4. दो मिनट की प्रस्तुति तैयार कीजिए। एक चित्र बनाकर दिखाइए। आरंभ कहानी से कीजिए, परिभाषा से नहीं।

भारत के नदी-उत्सव, जिन पर आप बोल सकते हैं:

उत्सवकहाँलोग क्या करते हैं
गोदावरी-पुष्करम्गोदावरी के तट पर, विशेषकर नासिक और राजमुंदरीबारह वर्ष में एक बार; विशाल भीड़ पवित्र स्नान के लिए आती है।
छठबिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंडलोग नदी में खड़े होकर सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
गंगा दशहरा / गंगा आरतीहरिद्वार, वाराणसी, ऋषिकेशजल पर दीप प्रवाहित किए जाते हैं और संध्या को नदी की आरती होती है।
कुंभ मेलाप्रयागराज, हरिद्वार, नासिक, उज्जैनलाखों लोग नदी में स्नान के लिए एकत्र होते हैं; यह विश्व का सबसे बड़ा समागम है।
नौका दौड़केरल, असम, ओडिशाढोल और गीतों के साथ नदी में लंबी नावों की दौड़ होती है।
नर्मदा परिक्रमा, भगीरथ की कथा, चेटीचंडमध्य प्रदेश; उत्तराखंड; सिंधी समाजनदी की परिक्रमा करना, या यह कथा सुनाना कि नदी पृथ्वी पर कैसे आई।

नमूना उत्तर: “मेरी दादी ने मुझे गोदावरी-पुष्करम् के बारे में बताया। यह बारह वर्ष में एक बार आता है। वे कहती हैं कि जब वे छोटी थीं तो पूरा परिवार सूर्योदय से पहले घाट तक पैदल जाता था। तट पर दीपक जल रहे होते थे और लोग गा रहे होते थे। उनकी माँ ने उन्हें बताया था कि नदी माँ के समान है जो खेतों को अन्न देती है, इसलिए बारह वर्ष में एक बार सब उसे धन्यवाद देने आते हैं। दादी कहती हैं कि तब जल इतना स्वच्छ था कि उन्हें जल में खड़े अपने पैर दिखाई देते थे। उन्हें दुःख है कि अब ऐसा नहीं है।”

विज्ञान के अध्याय में ये कहानियाँ क्यों: नदी के जल को नापने की सुविधा आने से बहुत पहले ही लोग जान चुके थे कि नदी की रक्षा करनी चाहिए — और वे उत्सवों, कहानियों तथा इस नियम से उसकी रक्षा करते थे कि नदी में क्या नहीं डाला जाएगा। नदी की देखभाल नया विचार नहीं है। यह बहुत पुराना विचार है, जिसे हम कुछ हद तक भूल गए हैं।
प्र3.
अपने परिवार के बड़ों से पूछिए— (क) जब आप बच्चे थे तो नदियों की स्थिति कैसी थी? (ख) तब से अब तक क्या परिवर्तन हुआ है?
उत्तर

साक्षात्कार कैसे लें: किसी एक बड़े से ये छह प्रश्न पूछिए और उनके शब्द ज्यों-के-त्यों कॉपी में लिखिए। फिर दोनों उत्तर आमने-सामने रखकर पढ़िए।

  1. आपके घर के सबसे पास कौन-सी नदी या तालाब था?
  2. जल कैसा दिखता था और क्या उसे पिया जा सकता था?
  3. आप उसका उपयोग किन कामों में करते थे?
  4. उसमें क्या रहता था — मछली, कछुए, पक्षी?
  5. क्या ग्रीष्म ऋतु में भी उसमें जल रहता था?
  6. उसमें अपशिष्ट कौन डालता था और उसकी सफाई कौन करता था?
प्रश्न(क) जब वे बच्चे थे(ख) तब से अब तक क्या बदला
जल की स्वच्छताइतना स्वच्छ कि तली दिखाई देती थी; लोग पीते थेहरा या मटमैला, प्राय: दुर्गंधयुक्त; अब कोई नहीं पीता
उसमें क्या जाता थाबहुत कम अपशिष्ट; कुछ पशुओं की धुलाईनालियों का जल, प्लास्टिक, साबुन का पानी, कभी-कभी कारखानों का अपशिष्ट
मछलियाँ और अन्य जीवनबहुत मछलियाँ, मेंढक, कछुए; अनेक पक्षी आते थेमछलियाँ और पक्षी बहुत कम; मच्छर अधिक
ग्रीष्म में जलवर्षभर बहती थी, मई में पतली हो जाती थीबहुत कम रह जाता है या सूख जाता है; तल से बालू निकाली जाती है
तटवृक्ष, घास, खुली भूमि और सीढ़ियों वाला घाटकिनारे तक मकान और दुकानें; खुली भूमि कम
देखभाल कौन करता थावर्षा से पहले पूरा गाँव मिलकर सफाई करता थाप्राय: कोई नहीं; लोग इसे सरकार का काम मानते हैं
पास का भूमिगत जलकुआँ हर वर्ष अपने आप भर जाता थाबोरवेल हर वर्ष और गहरे होते जा रहे हैं

नमूना उत्तर: “मेरे दादाजी बताते हैं कि जब वे दस वर्ष के थे तो हमारे नगर के पास की नदी स्वच्छ और शीतल थी और पूरा परिवार उसमें नहाता था। वे कपड़े से छोटी मछलियाँ पकड़ते थे। संध्या को बालू के टीले पर पक्षी बैठते थे। आज, वे कहते हैं, नगर के भीतर ही तीन नाले नदी में गिरते हैं। पहले नाले के बाद जल मटमैला हो जाता है। नरकुल में प्लास्टिक फँसा रहता है। नगर के पास मछलियाँ लगभग नहीं बचीं। वे कहते हैं कि नदी अपने आप नहीं बदली — हमने उसे बदला है।”

ऐसे साक्षात्कार क्या सिद्ध करते हैं: यह जानकारी कहीं और से लानी नहीं पड़ती — वह आपके अपने परिवार में मौजूद है। नदी की दुर्दशा एक ही व्यक्ति के जीवनकाल में हो जाती है, अर्थात् उसका कारण मनुष्य है — और इसीलिए उसे मनुष्य रोक भी सकता है।
प्र4.
आपके विचार से पहले के लोग क्यों नदियों के निकट घर बनाते थे और शहरों को बसाते थे? क्या आज भी नदियाँ उसी प्रकार से महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर

लोग नदियों के पास इसलिए बसते थे क्योंकि नदी एक ही स्थान पर सब कुछ दे देती थी — पीने का जल, फसलों और पशुओं के लिए जल, मछली, उपजाऊ समतल मृदा और नावों के लिए मार्ग। और हाँ, नदियाँ आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं — बस अब हमें यह दिखाई नहीं देता, क्योंकि जल घड़े में नहीं, पाइपों और नहरों से आता है।

तब — नदी ही तय करती थी कि नगर कहाँ बसेगा:

  1. जल हाथ से ढोकर लाना पड़ता था, इसलिए लोग पैदल दूरी के भीतर रहते थे।
  2. फसलों को बार-बार जल चाहिए था और नदी के मैदान की मृदा नरम तथा उपजाऊ होती है।
  3. पशुओं को प्रतिदिन जल चाहिए था।
  4. नदी की मछलियाँ निश्चित भोजन थीं।
  5. सड़कें नहीं थीं। नावें ही सामान और लोगों को ले जाती थीं, इसलिए व्यापार नदी के पास ही बढ़ा।
  6. नदी बर्तनों के लिए मिट्टी, निर्माण के लिए बालू और टोकरियों के लिए नरकुल भी देती थी।

अब — क्या बदला और क्या नहीं:

हमें क्या चाहिएतबअब
पीने का जलनदी से घड़े में लाया जाता थाआज भी नदी या बाँध का ही जल है — पर पाइप से आता है, इसलिए स्रोत भूल जाते हैं
फसलों के लिए जलखेत नदी के किनारे ही होते थेबाँधों से निकली नहरें उसे सैकड़ों किलोमीटर दूर ले जाती हैं
यात्रानदी में नाव सेअधिकतर सड़क और रेल से — यह बात सचमुच बदल गई है
विद्युतआवश्यकता ही नहीं थीबड़ा भाग नदियों पर बने बाँधों से बनता है
आजीविकामछली पकड़ना, खेती, नाव चलानाखेती, मछली पकड़ना, जल चाहने वाले कारखाने और पारिस्थितिक पर्यटन
प्रश्न के दूसरे भाग का सच्चा उत्तर: नदियाँ पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि अब खिलाने के लिए लोग कहीं अधिक हैं और चलाने के लिए कारखाने भी। बदला केवल नदी के प्रति हमारा दृष्टिकोण है। जब जल घड़े में आता था, तब सबको दिखता था कि वह कितना मूल्यवान है। जब वह नल से आता है, तो अनंत लगने लगता है — और इसीलिए व्यर्थ बहता है और प्रदूषित होता है।
स्वयं जाँचिए: भारत के पाँच बड़े नगरों के नाम लीजिए और उनकी नदियाँ खोजिए — दिल्ली और यमुना, कोलकाता और हुगली, पटना और गंगा, अहमदाबाद और साबरमती, राजमुंदरी और गोदावरी। इनमें से लगभग कोई भी नदी से दूर नहीं बसा।
प्र5.
यदि आप अपने शहर या गाँव में नदियों की सुरक्षा के लिए एक नया नियम बनाएँ तो क्या नियम बनाएँगे?
उत्तर

मेरा एक नियम: “कोई नाला और कोई अपशिष्ट नदी में नहीं जाएगा — दूषित जल की हर बूँद नदी तक पहुँचने से पहले साफ की जाएगी, और जो व्यक्ति नदी में कुछ फेंकेगा, वही उसे निकालेगा।”

मैंने यही नियम क्यों चुना:

  1. अध्याय तीन चीज़ों को नदी बिगाड़ने वाला बताता है — अपशिष्ट, प्लास्टिक और दूषित जल। तीनों एक ही द्वार से भीतर आते हैं: नाला और तट।
  2. यदि वह एक द्वार बंद कर दिया जाए तो नदी स्वयं स्वस्थ होने लगती है, क्योंकि बहती नदी नया मैल न मिलने पर अपने आप निर्मल होती जाती है।
  3. इस नियम की जाँच कोई भी कर सकता है। इसके लिए किसी मशीन की आवश्यकता नहीं — केवल तट पर चलकर देखना है।

यह नियम व्यवहार में कैसे चलेगा:

  • हर नाला किसी शोधन-टंकी या नरकुल-क्यारी में गिरे, सीधे नदी में नहीं।
  • हर घाट पर कूड़ेदान और पूजा-सामग्री के लिए अलग पात्र हों, और जल में अपशिष्ट डालने पर अर्थदंड हो।
  • हर कक्षा से एक ‘नदी-प्रहरी’ बने, जो महीने में एक बार तट के एक भाग की जाँच करके सूचना दे।
  • कारखाने वर्ष में एक बार दिखाएँ कि वे जो जल छोड़ रहे हैं वह स्वच्छ है।
  • घाट पर एक बोर्ड लगे जो बताए कि इस सप्ताह जल स्नान के लिए सुरक्षित है या नहीं।

अन्य अच्छे नियम, जिन्हें आप चुन सकते हैं:

नियमइससे क्या होगा
तट से 50 मीटर के भीतर कोई निर्माण नहींबाढ़ में नदी को फैलने की जगह मिलेगी और तट हरा रहेगा
दोनों तटों पर वृक्षों की पंक्ति लगाना और उसकी रक्षा करनाबहाव मंद होगा, मिट्टी थमेगी और पक्षियों को घर मिलेगा
घाट पर प्लास्टिक की थैली और बोतल पूर्णत: वर्जितवह अपशिष्ट रुकेगा जो कभी नहीं गलता
हर भवन में वर्षा जल संचयन अनिवार्यनदी से कम जल निकालना पड़ेगा और भूमिगत जल का पुनर्भरण होगा
महीने में एक दिन सामूहिक नदी-सफाईनदी फिर से सबकी ज़िम्मेदारी बन जाएगी
अच्छा नियम कैसा होता है: वह सरलता से समझ में आए, उसकी जाँच सरल हो, और वह कारण को ठीक करे, लक्षण को नहीं। जल में से प्लास्टिक निकालना अच्छा है; उसे जल तक पहुँचने ही न देना उससे कहीं अच्छा है।
प्र6.
उस समय के बारे में सोचिए जब आपने जल को व्यर्थ किया था। आप इससे अलग क्या कर सकते थे?
उत्तर

नमूना उत्तर: “पिछली गर्मियों में मैं मंजन करते समय नल खुला छोड़ देता था, और यह कई सप्ताह तक हर सुबह होता रहा। मैं ब्रश लेकर खड़ा रहता और जल यों ही नाली में बहता रहता। एक दिन मेरी दादी ने नल के नीचे एक मग रख दिया ताकि मैं देख सकूँ कि कितना जल जा रहा है — मेरे मंजन करने भर के समय में वह मग चार बार भर गया। मैं इससे अलग यह कर सकता था: ब्रश गीला कीजिए, नल बंद कीजिए, मंजन कीजिए और केवल कुल्ला करने के लिए नल खोलिए। अब मैं एक मग जल से काम चला लेता हूँ और नल बंद रहता है। मेरे छोटे भाई ने भी यही करना शुरू कर दिया है।”

हम प्राय: जल कहाँ-कहाँ व्यर्थ करते हैं और उसके स्थान पर क्या करें:

जल कहाँ व्यर्थ होता हैइसके स्थान पर क्या करें
मंजन करते या हाथ में साबुन लगाते समय नल खुला रहनानल बंद कीजिए, मग का उपयोग कीजिए। अकेले इसी से प्रतिदिन कई लीटर बचते हैं।
देर तक फव्वारे के नीचे नहाना, या पूरी बाल्टी भरकर आधी ही काम में लेनाएक बाल्टी और मग से नहाइए; उतना ही भरिए जितना चाहिए।
टपकते नल की मरम्मत न करानाउसी दिन बताइए। धीरे-धीरे टपकता नल एक दिन में एक बाल्टी बहा देता है।
छत की टंकी का बहनाफ्लोट वाल्व या अलार्म लगवाइए और समय पर मोटर बंद कीजिए।
पाइप चलाकर स्कूटर या आँगन धोनाबाल्टी और कपड़े से पोंछिए। आँगन धोने के स्थान पर झाड़ू लगाइए।
गिलास का आधा जल फेंक देनाउतना ही लीजिए जितना पीना है; बचा हुआ पौधों में डालिए।
दोपहर की तेज धूप में पौधों को सींचनाप्रात: या संध्या को सींचिए, जिससे कम जल उड़े।
फल-सब्ज़ी धोने का जल फेंक देनाउसे एक पात्र में रखकर पौधों में डालिए — अध्याय स्वयं यही सुझाव देता है।
यह प्रश्न पूछा ही क्यों गया है: कारखानों और नगरों को दोष देना सरल है। किंतु अध्याय अभी-अभी दिखा चुका है कि वह जल कितनी दूर से आया है और उसके लिए लोगों ने क्या-क्या छोड़ा है। यह जान लेने के बाद एक मग जल बहा देना पहले जैसा नहीं लगता। अपनी आदत को पहचानना पहला वास्तविक कदम है; दूसरा कदम है मग।
प्र7.
क्या आप दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुओं से एक सादा जल निस्यंदक (वॉटर फिल्टर) बना सकते हैं? इसमें आप क्या-क्या सम्मिलित करेंगे और क्यों?
उत्तर

हाँ। सादा निस्यंदक परतों वाला एक स्तंभ होता है — सबसे ऊपर कपड़ा, फिर रुई, फिर महीन बालू, फिर मोटी बालू, फिर छोटे रोड़े और सबसे नीचे कंकड़। ऊपर से गंदा जल डालने पर नीचे से अधिक स्वच्छ जल निकलता है।

इसे कैसे बनाएँ:

  1. प्लास्टिक की खाली बोतल लीजिए और किसी बड़े से उसकी तली कटवा लीजिए।
  2. बोतल को उलटा कर लीजिए — ढक्कन वाला भाग नीचे रहे। ढक्कन में एक छोटा छेद कर दीजिए, या ढक्कन हटाकर मुँह पर कपड़ा बाँध दीजिए।
  3. इस उलटी बोतल को एक गिलास या जग पर टिका दीजिए।
  4. अब परतें इस क्रम में भरिए, नीचे (गले) से ऊपर की ओर: छोटे कंकड़, फिर मोटी बालू, फिर महीन बालू, फिर रुई की मोटी तह और सबसे ऊपर स्वच्छ सूती कपड़े की तह।
  5. पहले एक बार स्वच्छ जल डालकर बालू धो लीजिए और वह जल फेंक दीजिए।
  6. अब गँदला जल धीरे-धीरे कपड़े पर डालिए और नीचे इकट्ठा होने वाले जल को देखिए।
कपड़ा रुई महीन बालू मोटी बालू कंकड़ गँदला जल डालिए स्वच्छ जल निकलता है
बोतल का निस्यंदक — बड़े कण ऊपर रुकते हैं और सबसे महीन कण नीचे।
परतवह क्यों रखी जाती है
कपड़ा (सबसे ऊपर)पत्ते, कीड़े और बड़े तैरते कण रोक लेता है, और बालू को उछलने नहीं देता।
रुईछोटे तैरते कणों को रोकती है और जल की गति धीमी कर देती है, जिससे नीचे की परतों को काम करने का समय मिलता है।
महीन बालूमुख्य काम यही करती है। इसके कणों के बीच बहुत छोटे रिक्त स्थान होते हैं, जिनमें महीन मिट्टी फँस जाती है।
मोटी बालूमध्यम आकार के कण रोकती है और महीन बालू को नीचे बहने से बचाती है।
छोटे रोड़े और कंकड़पूरे स्तंभ को थामे रखते हैं और स्वच्छ जल को सरलता से नीचे निकलने देते हैं।
लकड़ी का कोयला (यदि उपलब्ध हो, एक अतिरिक्त परत)कोयला दुर्गंध और रंग हटा देता है। इसे महीन बालू और मोटी बालू के बीच रखिए।
क्रम महत्वपूर्ण क्यों है: नीचे जाते-जाते परतें मोटी होती जाती हैं। जल को सबसे छोटे रिक्त स्थान सबसे ऊपर मिलते हैं और बड़े नीचे, इसलिए मैल एक साथ नहीं, चरणों में अलग होता है। यदि कंकड़ ऊपर रख दिए जाएँ तो सारी मिट्टी सीधे नीचे चली जाएगी और निस्यंदक कुछ भी नहीं करेगा।
एक आवश्यक चेतावनी: यह निस्यंदक मिट्टी और तैरता मैल हटाता है। यह रोगाणु नहीं हटाता और न ही उन वस्तुओं को हटाता है जो जल में घुल चुकी हैं — गतिविधि 3 की शक्कर याद कीजिए। छाने हुए जल को पीने से पहले उबालना आवश्यक है।
प्र8.
कल्पना कीजिए कि आप नदी के समीप एक नया नगर बनाने की योजना बना रहे हैं। आप निम्नलिखित के लिए क्या कदम उठाएँगे? (क) नदी को स्वच्छ रखने के लिए (ख) भारी वर्षा के दौरान बाढ़ से बचाव के लिए (ग) यह सुनिश्चित करने के लिए कि गर्मियों में भी प्रत्येक व्यक्ति के लिए सदैव पर्याप्त जल उपलब्ध रहे।
उत्तर

मेरे नए नगर की योजना, तीनों शीर्षकों के अनुसार।

(क) नदी को स्वच्छ रखने के लिए

  1. मकानों से पहले मल-जल शोधन संयंत्र बनाए जाएँगे। नगर का कोई नाला बिना साफ हुए नदी में नहीं गिरेगा।
  2. सभी कारखाने नगर के नीचे की ओर बनेंगे और प्रत्येक अपना जल स्वयं साफ करके छोड़ेगा। हर महीने जाँच होगी और परिणाम सार्वजनिक बोर्ड पर लगेगा।
  3. हर घर और हर गली में दो कूड़ेदान — गीला और सूखा — तथा प्रतिदिन संग्रह, ताकि कुछ भी तट पर फेंकना न पड़े।
  4. पूरे नगर में प्लास्टिक की थैलियाँ और एक बार काम आने वाला प्लास्टिक वर्जित रहेगा।
  5. स्वच्छ और प्रकाशयुक्त घाट बनेंगे, जिन पर सीढ़ियाँ, कूड़ेदान और पूजा-सामग्री के लिए अलग पात्र होंगे।
  6. दोनों तटों पर वृक्षों और घास की चौड़ी हरित पट्टी छोड़ी जाएगी। उसके भीतर कुछ भी नहीं बनेगा।
  7. हर वार्ड से दो और हर विद्यालय से एक सदस्य लेकर एक नागरिक नदी-समिति बनेगी।

(ख) भारी वर्षा के दौरान बाढ़ से बचाव के लिए

  1. दोनों तटों पर चौड़ा निर्माण-मुक्त क्षेत्र रहेगा। नदी को फैलने के लिए जगह चाहिए; जगह न देने पर वह हमारे घर ले लेती है।
  2. नीची भूमि, पुराने तालाब और प्राकृतिक नाले कभी नहीं पाटे जाएँगे — बाढ़ का जल वहीं जाना चाहिए।
  3. नगर के नीचे वाले भागों में तालाब और खुले उद्यान बनाए जाएँगे, जो भारी वर्षा में जल रोक सकें।
  4. वर्षा-जल की चौड़ी नालियाँ मल-जल की नालियों से अलग बनेंगी और हर वर्षा से पहले साफ की जाएँगी।
  5. हर सतह को सीमेंट से ढकने के स्थान पर छिद्रयुक्त ब्लॉक, बगीचे और खुली मृदा रखी जाएगी, ताकि वर्षा भूमि में रिस सके।
  6. ऊपर की ढलानों पर वृक्ष लगाए जाएँगे — वृक्ष वर्षा के जल को मंद करते हैं और मिट्टी को जल सोखने में सहायता देते हैं, ठीक जैसा पृष्ठ 32 के चित्र में दिखाया गया है।
  7. चेतावनी की व्यवस्था होगी, स्थान खाली करने के मार्ग चिह्नित होंगे और राहत केंद्र ऊँचाई पर बनेंगे।

(ग) गर्मियों में भी सबके लिए पर्याप्त जल सुनिश्चित करने के लिए

  1. हर भवन के लिए वर्षा जल संचयन अनिवार्य होगा — छत का जल टंकी में और अतिरिक्त जल पुनर्भरण गर्त में जाएगा।
  2. नगर के तालाब और झीलें जीवित रखी जाएँगी और उनसे गाद निकाली जाएगी; ये वर्षा को संचित करती हैं और भूमिगत जल का पुनर्भरण करती हैं।
  3. रिसाव तुरंत ठीक कराया जाएगा। अनेक नगरों में बहुत सा जल घरों तक पहुँचने से पहले ही टूटी पाइपों से बह जाता है।
  4. उपयोग किए हुए जल को शोधित करके उद्यानों, पार्कों और निर्माण-कार्य में लगाया जाएगा, जिससे स्वच्छ जल पीने के लिए बचे।
  5. जल-मापी लगेंगे, हर परिवार को विवेकपूर्ण उपयोग सिखाया जाएगा और सार्वजनिक स्थानों पर जल ए.टी.एम. लगाए जाएँगे।
  6. घरों, खेतों और कारखानों के बीच जल का न्यायसंगत बँटवारा तय होगा, और एक निश्चित मात्रा में जल सदा नदी में बहता रहेगा।
  7. भूमिगत जल उतना ही निकाला जाएगा जितना वर्षा उसे लौटा सके।
तीनों भाग एक साथ क्यों हैं: ये तीन अलग समस्याएँ दिखती हैं, पर इनका उत्तर एक ही है — जल के लिए जगह छोड़िए। नालियों में इतनी जगह कि दूषित जल साफ हो सके, तटों पर इतनी जगह कि बाढ़ का जल फैल सके, और भूमि में इतनी जगह कि वर्षा रिस सके। जो नगर नदी से एक-एक मीटर छीन लेता है, वह गर्मियों में प्यासा रहता है और वर्षा में डूब जाता है।
इसका चित्र बनाइए: ऊपर से दिखता एक सरल नक्शा बनाइए। बीच में नदी, दोनों ओर हरित पट्टी, उससे हटकर बसा नगर, निकास से पहले शोधन संयंत्र, नीचे की ओर कारखाने, नीची भूमि में तालाब और उद्यान, और छतों पर वर्षा-जल की टंकियाँ। सुंदर चित्र से अधिक महत्वपूर्ण नामांकन (लेबल) हैं।
क्या यह उपयोगी रहा?