प्र1.
हम जिन प्लास्टिक के रैपर और थैलियों को कचरे में फेंकते हैं, उनका अंत में क्या होता है?
उत्तर
उनमें से लगभग सब किसी नाली में पहुँचते हैं, नाली उन्हें नदी तक ले जाती है और नदी सागर तक। जहाँ उन्हें फेंका गया था, वहाँ वे बहुत कम बचते हैं।
एक टॉफी के रैपर के पीछे-पीछे चलिए।
- आप उसे सड़क या विद्यालय के मैदान में गिरा देते हैं।
- हवा उसे सड़क किनारे की नाली में उड़ा ले जाती है, या पहली वर्षा उसे बहा ले जाती है।
- नाली नाले में गिरती है और नाला नदी में।
- नदी में वह रैपर हज़ारों दूसरे रैपरों के साथ तैरता है। पृष्ठ 29 का चित्र देखिए — जल बोतलों, पैकेटों और थैलियों से ढका हुआ है।
- कुछ प्लास्टिक डूबकर कीचड़ में फँस जाता है और वर्षों वहीं पड़ा रहता है। कुछ को मछलियाँ, पशु या कछुए भोजन समझकर निगल लेते हैं।
- शेष सागर तक पहुँच जाता है, जहाँ वह बहुत लंबे समय तक तैरता रहता है।
प्लास्टिक इतनी बड़ी समस्या क्यों है: केले का छिलका कुछ सप्ताह में गल जाता है। प्लास्टिक गलता ही नहीं। वह केवल छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता है और वे टुकड़े वर्षों तक जल और मृदा में बने रहते हैं। जो जंतु प्लास्टिक की थैली निगल लेता है, उसका पेट पचा नहीं पाता और अवरुद्ध रह जाता है। नाली में फँसा प्लास्टिक नाली को भी रोक देता है, जिससे अगली भारी वर्षा में सड़क पर पानी भर जाता है।
आप क्या कर सकते हैं: बाज़ार के लिए कपड़े का थैला ले जाइए, अपनी बोतल और स्टील का टिफिन रखिए, स्ट्रॉ मत लीजिए और रैपर कूड़ेदान के अतिरिक्त कहीं मत फेंकिए। अध्याय सीधी बात कहता है — पारिस्थितिकी के अनुकूल उत्पादों का उपयोग करके अपशिष्ट पहले से ही कम कीजिए।