इससे पता चलता है कि यहाँ प्रकृति कोई घूमने की जगह नहीं, बल्कि वही स्थान है जहाँ लोग रहते हैं, काम करते हैं, वस्त्र पहनते हैं, नाचते हैं और कमाते हैं।
- वे आस-पास उगने वाली चीज़ों से वस्तुएँ बनाते हैं। बेंत और बाँस की टोकरियाँ, घास की झाड़ू, मिट्टी के मटके, बाँस के करघे पर बुना कपड़ा। कुछ भी दूर की किसी फैक्ट्री से नहीं आता।
- वे वन से घर बनाते हैं। घर बाँस के हैं, खंभों पर खड़े हैं, छप्पर से ढके हैं — भारी वर्षा और पहाड़ी भूमि के अनुरूप।
- कौशल परिवार में ही रहता है। स्त्री सबके सामने खुले में बुनाई कर रही है। बुनाई घर पर, माँ से बेटी को सिखाई जाती है, और हर समुदाय का अपना नमूना होता है।
- वे वन्य जीवों के साथ भूमि साझा करते हैं। बाज़ार से कुछ ही कदम पर झाड़ियों में हाथी खड़ा है और शाखा पर धनेश बैठा है। किसी ने उन्हें भगाया नहीं है।
- उनके पर्व प्रकृति के साथ चलते हैं। चित्र का बिहू नृत्य खेती-वर्ष का पर्व है — नया मौसम, बुआई और फसल।
- अनेक समुदाय साथ-साथ रहते हैं। एक छोटे-से दृश्य में कम से कम चार अलग-अलग पारंपरिक पोशाकें दिखती हैं। हर एक की अपनी बुनाई, अपना शिरोवस्त्र, अपनी भाषा।
- बाज़ार मिलने का स्थान है। लोग यहाँ अपना बनाया सामान बेचने, ज़रूरत का सामान खरीदने, मिलने, नाचने और बातें करने आते हैं — सब एक ही जगह।
नमूना उत्तर: चित्र से पता चलता है कि पूर्वोत्तर के लोग अपनी लगभग सारी आवश्यकताएँ आस-पास की पहाड़ियों और वनों से ही लेते हैं — घर के लिए बाँस, टोकरी के लिए बेंत, झाड़ू के लिए घास, और वहीं करघे पर बुने जा रहे कपड़े के लिए सूत। हाथी और धनेश जैसे वन्य जीव गाँव के ठीक पास हैं, और कोई उनसे डरा या नाराज़ नहीं दिखता। उनका पर्व बिहू खेती के मौसम से जुड़ा है। इसलिए प्रकृति उनके जीवन से अलग कोई चीज़ नहीं है। वह एक साथ उनका घर भी है, उनका काम भी, उनका पहनावा भी और उनका पंचांग भी।
यह जीवन-शैली क्यों महत्वपूर्ण है: जब किसी परिवार का भोजन, घर और कमाई पास के वन से ही आती है, तो उस वन की रक्षा करना कोई उपकार नहीं, सीधी समझदारी है। अध्याय में प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाकर रहने का यही अर्थ है — जितना चाहिए उतना लेना, फिर उग आने के लिए पर्याप्त छोड़ देना, और उन जंतुओं के लिए जगह रखना जो वहाँ पहले से थे।