प्र1.
“आइए, हम एक क्रियाकलाप करते हैं। आप सभी खड़े हो जाइए और अपनी भुजाओं को फैला लीजिए। अब कूदिए! अपने-अपने स्थान पर दौड़िए।” उन्होंने प्रश्न किया, “आप हिल-डुल पाने में कैसे समर्थ हो पाते हैं?”
उत्तर
हम ऊर्जा के कारण हिल-डुल पाते हैं — और वह ऊर्जा हमें अपने खाए हुए भोजन से मिलती है।
चरण दर चरण देखिए कि क्या होता है।
- प्रात: आप नाश्ता करते हैं — रोटी, चावल, दाल, दूध, केला।
- शरीर के भीतर वह भोजन टूटता है।
- भोजन से शरीर को ऊर्जा मिलती है।
- पेशियाँ उसी ऊर्जा से हड्डियों को खींचती हैं।
- इसी से भुजाएँ फैलती हैं, पैर धक्का देते हैं, और आप कूदते तथा दौड़ते हैं।
भोजन → शरीर में ऊर्जा → पेशियाँ कार्य करती हैं → हम गति करते हैं
उत्तर भोजन ही क्यों है: कक्षा के सभी विद्यार्थियों ने नाश्ता किया था। इसीलिए वे खड़े हो सके, भुजाएँ फैला सके, कूद सके और दौड़ सके। भोजन न होता तो ऊर्जा न होती, और ऊर्जा न होती तो गति भी न होती। शिक्षक कक्षा को यही समझाना चाहती थीं।
क्या आप जानते हैं? जब हम बैठे हों, सो रहे हों या सोच रहे हों, उस समय भी हमारा मस्तिष्क ऊर्जा का उपयोग करता है। अर्थात् शरीर कभी पूरी तरह बंद नहीं होता — वह दिन-रात ऊर्जा खर्च करता रहता है।