प्र1.
हमारे बहुत-से पर्व ऋतुओं से संबंधित हैं। आइए देखते हैं कि क्या आप इन पर्वों का उन ऋतुओं से मिलान कर सकते हैं जिनमें उन्हें मनाया जाता है? 1. पोंगल, मकर संक्रांति 2. होली 3. दीपावली 4. बैसाखी, गुड़ी पड़वा, विशु, रोंगाली बिहू — (क) वसंत — जब फूल खिलते हैं (ख) शरद — जब उपज प्रप्त होती हैं (ग) नव वर्ष और उपज या पैदावार का उत्सव (घ) शीत
उत्तर
1 → (घ) 2 → (क) 3 → (ख) 4 → (ग)
| क्रमांक | पर्व | उत्तर | ऋतु | मिलान का कारण |
|---|---|---|---|---|
| 1. | पोंगल, मकर संक्रांति | (घ) | शीत | ये जनवरी के मध्य में पड़ते हैं, वर्ष के सबसे ठंडे भाग में। शरीर गर्म रखने के लिए तिल के लड्डू, गजक, गुड़ और खिचड़ी खाई जाती है और साफ़ आकाश में पतंगें उड़ाई जाती हैं। |
| 2. | होली | (क) | वसंत — जब फूल खिलते हैं | होली फाल्गुन की पूर्णिमा को, फरवरी-मार्च में आती है, ठीक तब जब पलाश और सेमल खिलते हैं और खेत सरसों से पीले रहते हैं। होली के रंग वसंत के ही रंग हैं। |
| 3. | दीपावली | (ख) | शरद — जब उपज प्राप्त होती है | दीपावली अक्तूबर-नवंबर में, खरीफ़ की फ़सल कटकर घर आ जाने के बाद पड़ती है। भंडार भरे होते हैं, इसलिए दीप जलाकर उत्सव मनाया जाता है। |
| 4. | बैसाखी, गुड़ी पड़वा, विशु, रोंगाली बिहू | (ग) | नव वर्ष और उपज या पैदावार का उत्सव | चारों अप्रैल के मध्य में पड़ते हैं। ये पंजाब, महाराष्ट्र, केरल और असम में नववर्ष का आरंभ हैं और साथ ही रबी की फ़सल कटने का उत्सव भी। |
हमारे पर्व ऋतुओं पर क्यों टिके हैं: सैकड़ों वर्षों तक भारत में लगभग सभी लोग खेती से जीवन चलाते थे। वर्ष के सबसे बड़े क्षण बुवाई और कटाई के होते थे, और वे क्षण मौसम तय करता है। इसलिए पर्व उन्हीं क्षणों के आस-पास बने — फ़सल सुरक्षित घर आने पर एक पर्व, वर्ष बदलने पर एक पर्व, फूल लौटने पर एक पर्व। हमारा पर्वों का कैलेंडर वास्तव में ऋतुओं का ही कैलेंडर है।
1 और 4 को ध्यान से देखिए: दोनों उपज के पर्व हैं, इसलिए दोनों (ग) में जाते हुए लग सकते हैं। अंतर यह है कि पोंगल और मकर संक्रांति जनवरी की ठंड में पड़ते हैं — इसलिए वे शीत के साथ जाते हैं। बैसाखी, गुड़ी पड़वा, विशु और रोंगाली बिहू अप्रैल में पड़ते हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में नववर्ष भी हैं — इसलिए वे (ग) के साथ जाते हैं।