कक्षा ५ हिंदी अध्याय 10 अनुमान और कल्पना के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
प्रत्युत्पन्नमति ने मछुआरों से बचने की जो योजना बनाई, यदि वह उसमें सफल न होती तो उसकी अन्य योजना क्या हो सकती थी?
उत्तर

पहले यह याद कर लीजिए कि उसकी पहली योजना क्या थी — मरी हुई मछली बनकर पड़ जाना, क्योंकि मछुआरों को “स्वस्थ और जीवित मछलियाँ ही चाहिए” थीं। यदि यह चाल न चलती, यानी मछुआरे उसे मरी हुई मानकर न फेंकते, तो उसे कोई दूसरा उपाय सोचना पड़ता।

यह कल्पना का प्रश्न है, पर कल्पना कहानी से मेल खानी चाहिए। प्रत्युत्पन्नमति के पास ये उपाय हो सकते थे —

अन्य योजनावह कैसे करतीयह क्यों चल सकती थी
1. जाल के छेद से निकल भागनाशरीर को और सिकोड़कर, जाल के किसी ढीले या फटे हिस्से से फिसलकर पानी में लौट जाना।वह पहले भी शरीर सिकोड़ चुकी थी। जाल में जगह-जगह जोड़ होते हैं और जब वह पानी से बाहर उठाया जाता है, तब कहीं-न-कहीं ढीलापन आ ही जाता है।
2. उछलकर पानी में गिर जानाजिस क्षण जाल ऊपर उठे और वह किनारे के पास हो, पूरी ताकत से उछलना।मछलियाँ उछल सकती हैं। किनारा पास था, इसलिए एक अच्छी छलाँग उसे वापस पानी में पहुँचा सकती थी।
3. बीमार-सी दिखनापंख ढीले छोड़कर, एक ओर लुढ़ककर, बीमार मछली जैसी बन जाना।मछुआरे बीमार मछली भी नहीं ले जाते, क्योंकि वह बिकती नहीं। मछुआरों को “स्वस्थ” मछलियाँ चाहिए थीं।
4. सबसे नीचे दब जानाजाल की सबसे नीचे की तह में, बाकी मछलियों के नीचे दुबक जाना और मौका मिलते ही निकल भागना।जाल में “इतनी सारी” मछलियाँ थीं। मछुआरे एक-एक को देखने में समय लगाते, और उसी बीच उसे मौका मिल सकता था।
5. मछुआरों का ध्यान बँटानाज़ोर से फड़फड़ाकर जाल का एक कोना हिला देना, ताकि मछुआरे उधर देखें और वह दूसरी ओर से खिसक जाए।यह उसकी ‘क्षण भर में उपाय निकालने’ वाली बुद्धि से मेल खाता है।

नमूना उत्तर: यदि मरी हुई बनने की चाल न चलती, तो प्रत्युत्पन्नमति सबसे नीचे की मछलियों के नीचे दुबक जाती और चुपचाप मौका देखती रहती। जैसे ही मछुआरे जाल को किनारे पर पलटते, वह पूरी ताकत से उछलकर पानी में कूद जाती। वह जानती थी कि किनारा पास है और पानी में पहुँचते ही उसे कोई नहीं पकड़ सकता।

हर योजना में एक बात समान है: हर उपाय में वह पहले देखती है, फिर करती है। यही उसका स्वभाव है — “समय पड़ने पर किसी भी उलझन का हल क्षण भर में निकाल लेती थी।” अच्छी योजना वही होती है जो सामने की स्थिति देखकर बने।
प्र2.
क्या आपने समुद्र देखा है? अनुमान लगाकर बताइए कि समुद्र में इतना अधिक जल कहाँ से आता है।
उत्तर

समुद्र का सारा जल मुख्य रूप से नदियों से और वर्षा से आता है। दुनिया की सब बड़ी नदियाँ अंत में समुद्र में ही गिरती हैं, और आकाश से गिरने वाली वर्षा का बहुत बड़ा हिस्सा सीधे समुद्र पर ही बरसता है।

पहले प्रश्न का पहला हिस्सा — यदि आपने समुद्र देखा हो तो बताइए कि कहाँ देखा और कैसा लगा। यदि नहीं देखा, तो कहिए — “मैंने अभी तक समुद्र नहीं देखा, चित्रों में देखा है।” दोनों उत्तर ठीक हैं।

अब समझिए कि पानी वहाँ पहुँचता कैसे है। यह एक गोल चक्र है, जो कभी रुकता नहीं —

  1. सूरज की गरमी से समुद्र का पानी भाप बनता है। भाप हल्की होती है, इसलिए ऊपर उठ जाती है।
  2. ऊपर ठंड में भाप जमकर बादल बन जाती है।
  3. बादल हवा के साथ ज़मीन की ओर बढ़ते हैं और वर्षा करते हैं।
  4. वर्षा का पानी पहाड़ों से नाले और नदियाँ बनकर बहता है। पहाड़ों की बर्फ़ पिघलकर भी नदियों में मिलती है।
  5. सारी नदियाँ बहती हुई अंत में समुद्र में जा गिरती हैं। इस तरह पानी फिर वहीं पहुँच जाता है जहाँ से चला था।
समुद्र बादल बादल भाप हवा बादल ले जाती है वर्षा नदी पहाड़
जल-चक्र — समुद्र से भाप उठती है, बादल बनते हैं, वर्षा होती है, नदियाँ बहती हैं और पानी फिर समुद्र में लौट आता है।
पानी का स्रोतवह समुद्र तक कैसे पहुँचता है
नदियाँगंगा, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, कावेरी — सब अंत में समुद्र में मिल जाती हैं। नदियाँ दिन-रात, बारहों महीने पानी लाती रहती हैं।
वर्षाधरती का लगभग तीन-चौथाई भाग समुद्र है, इसलिए बरसने वाला अधिकतर पानी सीधे समुद्र पर ही गिरता है।
पहाड़ों की बर्फ़गरमी में हिमालय जैसी बर्फ़ पिघलकर नदियों में आती है और नदियों के साथ समुद्र तक पहुँचती है।
ज़मीन के भीतर का पानीज़मीन के नीचे बहता हुआ पानी भी धीरे-धीरे रिसकर समुद्र में मिलता रहता है।
तो समुद्र भरता क्यों नहीं? क्योंकि जितना पानी उसमें आता है, लगभग उतना ही भाप बनकर उड़ भी जाता है। इसीलिए समुद्र का स्तर लगभग एक-सा बना रहता है। इसी चक्र को जल-चक्र कहते हैं।
एक रोचक बात: समुद्र का पानी खारा होता है और नदियों का मीठा। नदियाँ बहते-बहते ज़मीन से थोड़े-थोड़े नमक के कण साथ ले आती हैं। पानी तो भाप बनकर उड़ जाता है, पर नमक वहीं रह जाता है। लाखों वर्षों में यही नमक इकट्ठा होकर समुद्र को खारा बना देता है।
प्र3.
अपनी सूझ-बूझ के कारण प्रत्युत्पन्नमति मछुआरों से बच गई। मान लीजिए कि वह तैरकर पास के सरोवर में अपनी मित्र अनागतविधाता के पास पहुँच गई। दोनों में आपस में क्या-क्या बातचीत हुई होगी? अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है, पर बातचीत कहानी से जुड़ी होनी चाहिए। दोनों मछलियाँ मित्र थीं, इसलिए बातचीत में मिलने की खुशी, बीती घटना, यद्भविष्य का दुख और आगे की सीख — ये चारों बातें आनी चाहिए।

नमूना उत्तर (कल्पित संवाद):

कौनक्या कहा होगा
अनागतविधाता“प्रत्युत्पन्नमति! तुम? मुझे तो लगा था कि अब तुमसे कभी भेंट न होगी। आओ, पास आओ।”
प्रत्युत्पन्नमति“सखी, मैं रात भर तैरती रही हूँ। बहुत थक गई हूँ। पर मैं जीवित हूँ — यही बहुत है।”
अनागतविधाता“मछुआरे सचमुच आ गए थे क्या?”
प्रत्युत्पन्नमति“हाँ, ठीक सवेरे। उन्होंने बड़ा जाल डाला और सरोवर की सारी मछलियाँ खींच लीं। मैं भी जाल में थी।”
अनागतविधाता“फिर तुम निकलीं कैसे?”
प्रत्युत्पन्नमति“उनकी बातचीत से मैं समझ गई कि उन्हें केवल जीवित मछलियाँ चाहिए। मैंने उसी क्षण शरीर सिकोड़ लिया, आँखें बंद कर लीं और मरी हुई-सी पड़ गई। उन्होंने मुझे मरा हुआ समझकर पानी में फेंक दिया।”
अनागतविधाता“तुम्हारी बुद्धि ने आज तुम्हें बचा लिया। पर सच कहूँ — मेरा मन काँप रहा है। एक पल की देर हो जाती तो?”
प्रत्युत्पन्नमति“सच कह रही हो। उस दिन मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी थी। अब समझी कि खतरे से पहले हट जाना ही सबसे अच्छा उपाय है।”
अनागतविधाता“और यद्भविष्य? वह कहाँ है?”
प्रत्युत्पन्नमति“(धीमे स्वर में) वह नहीं बच सकी, सखी। वह वहीं पड़ी रही और कहती रही कि भाग्य में जो लिखा होगा वही होगा। मछुआरे उसे और उसकी साथी मछलियों को ले गए।”
अनागतविधाता“बहुत बुरा हुआ। हमने उसे कितना समझाया था। भाग्य पर भरोसा रखना बुरा नहीं, पर हाथ-पैर न हिलाना बुरा है।”
प्रत्युत्पन्नमति“अब से हम दोनों एक साथ रहेंगी। तुम पहले से सोचना, मैं मौके पर सँभालूँगी।”
अनागतविधाता“ठीक कहा। यही दो बातें मिलकर जीवन बचाती हैं — पहले से सोचना और समय पर करना। चलो, अब विश्राम कर लो।”
यह संवाद ठीक क्यों है: इसमें कोई बात कहानी से बाहर नहीं गई। जाल, मछुआरों की चाहत, मरी हुई बनने की चाल, यद्भविष्य का अंत — सब पाठ से लिया गया है। कल्पना केवल इतनी है कि दोनों की भेंट हुई और उन्होंने यह सब आपस में कहा।
संवाद लिखने का तरीका: (1) बाईं ओर बोलने वाले का नाम लिखिए। (2) फिर छोटी रेखा (–) या अल्प विराम लगाइए। (3) फिर उसकी बात लिखिए। (4) यदि बोलते समय कोई भाव या काम दिखाना हो, तो उसे कोष्ठक में लिखिए — जैसे “(धीमे स्वर में)”।
क्या यह उपयोगी रहा?