कक्षा ५ हिंदी अध्याय 2 अनुमान और कल्पना के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
कहानी में सिंहासन की मूर्तियाँ उड़कर किसी और जगह चली जाती हैं। वे कहाँ जाती होंगी और वहाँ क्या करती होंगी?
उत्तर

यह कल्पना का प्रश्न है। इसका कोई एक “सही” उत्तर नहीं है। पर आपकी कल्पना कहानी से जुड़ी होनी चाहिए।

कैसे लिखें — तीन चरण:
चरण 1 — तय कीजिए कि मूर्तियाँ कहाँ गईं (कोई एक जगह)।
चरण 2 — बताइए कि वहाँ वे क्या करती हैं।
चरण 3 — यह भी लिखिए कि उनका काम कहानी वाले काम से मिलता-जुलता क्यों है।

अच्छे उत्तर में यह ज़रूर हो — जगह, काम, और यह बात कि मूर्तियाँ अब भी न्याय की रखवाली कर रही हैं।

नमूना उत्तर: मुझे लगता है कि चारों मूर्तियाँ आकाश में उड़कर किसी और देश के किसी और मैदान में उतर गई होंगी। वहाँ भी बच्चे खेलते होंगे। मूर्तियाँ फिर से ज़मीन के नीचे छिप जाती होंगी और सिंहासन को अपने साथ छिपा लेती होंगी। जब कोई सच्चे मन वाला बच्चा वहाँ खेलते-खेलते ठोकर खाएगा, तभी सिंहासन बाहर आएगा। तब तक वे चुपचाप देखती रहती होंगी कि कौन सच बोलता है और कौन दूसरों की बात ध्यान से सुनता है। मुझे लगता है कि वे किसी की परीक्षा लिए बिना कभी सिंहासन किसी को नहीं देतीं।

दूसरा नमूना (छोटा): चारों मूर्तियाँ राजा विक्रमादित्य के पास लौट गई होंगी। वहाँ वे उन्हें बताती होंगी कि आज के राजाओं में से कोई भी उनकी कुर्सी के योग्य नहीं निकला। फिर वे सिंहासन को किसी सुरक्षित जगह रख आती होंगी और नए योग्य व्यक्ति के जन्म की प्रतीक्षा करती होंगी।

ध्यान रखिए: कल्पना करते समय भी कहानी का नियम मत तोड़िए। इस कहानी में मूर्तियाँ रक्षक हैं, बदला लेने वाली नहीं। इसलिए उनका नया काम भी रखवाली या परीक्षा लेने का ही होना चाहिए।
प्र2.
यदि इस कहानी के अंत में राजा सिंहासन पर बैठने में सफल हो जाता तो क्या होता?
उत्तर

अगर राजा बैठ जाता, तो कहानी का अर्थ ही बदल जाता। तब यह पता चलता कि कुर्सी ताकत से मिलती है, साफ़ मन से नहीं।

दो अलग-अलग कल्पनाएँ की जा सकती हैं —

अगर…तब क्या होता
राजा घमंड के साथ ही बैठ जाताप्रजा का भरोसा और टूट जाता। लोग फिर भी लड़के के पास ही जाते। सिंहासन तो मिल जाता, पर सम्मान नहीं मिलता। कहानी की सीख खत्म हो जाती।
राजा सचमुच बदल जाता, फिर बैठतावह पहले दरबारी की ज़मीन लौटाता, झूठ बोलना छोड़ता और किसी को दुख न पहुँचाने का वचन देता। तब उसका बैठना ठीक होता। प्रजा को अपने ही राजा से न्याय मिलने लगता और लड़के को भी दरबार में सम्मान मिलता।

नमूना उत्तर: यदि राजा सिंहासन पर बैठने में सफल हो जाता तो उसका घमंड और बढ़ जाता। वह सोचता कि उसने मूर्तियों को भी हरा दिया। ऐसे में वह पहले जैसे ही काम करता रहता — किसी की ज़मीन ले लेता, बचने के लिए झूठ बोल देता। प्रजा को न्याय फिर भी न मिलता और लोग चुपचाप उसी लड़के के पास जाते रहते। कहानी हमें यह न सिखा पाती कि न्याय की कुर्सी के लिए साफ़ मन चाहिए। मुझे लगता है कि राजा तभी बैठ पाता जब वह सचमुच सुधर जाता — तब वह दिन उसके राज्य के लिए सबसे अच्छा दिन होता।

क्यों यही सही दिशा है: कहानी का अंत जान-बूझकर ऐसा रखा गया है। सिंहासन का उड़ जाना पाठक के मन में एक सवाल छोड़ जाता है — क्या मैं इस कुर्सी पर बैठने लायक हूँ? अगर राजा बैठ जाता, तो यह सवाल कभी पैदा ही न होता।
क्या यह उपयोगी रहा?