पृष्ठ 95 पर दो तसवीरें हैं। दोनों में बादल हैं और उन्हीं बादलों की आकृति पर पतली रेखाएँ खींचकर एक में मछली और दूसरे में बंदर का मुँह बना दिया गया है।
पृष्ठ 96 पर दो चौकोर बक्से बने हैं। उनमें बादल की आकृतियाँ बिंदुओं वाली रेखा से बनी हैं और कुछ हिस्से पहले से गहरे बने हुए हैं —
करने का तरीका — चरण दर चरण:
- चरण 1: पहले पूरा बक्सा ध्यान से देखिए और पहचानिए कि उसमें कौन-सा जीव छिपा है।
- चरण 2: पेंसिल हल्के हाथ से पकड़िए और बिंदुओं के ऊपर-ऊपर रेखा खींचते जाइए। एक ही जगह से शुरू करके एक ही दिशा में चलिए, बीच में मत कूदिए।
- चरण 3: जहाँ रेखा टेढ़ी-मेढ़ी है (जैसे बिल्ली के रोएँ), वहाँ जल्दी मत कीजिए — छोटे-छोटे टुकड़ों में खींचिए।
- चरण 4: पूरी रेखा बन जाने पर एक बार पीछे हटकर देखिए कि आकार बना या नहीं। कोई हिस्सा छूट गया हो तो जोड़ लीजिए।
- चरण 5: अब रंग भरिए। भालू में भूरा और बिल्ली में सलेटी या नारंगी अच्छा लगेगा। बचे हुए हिस्से में हलका नीला भरिए — वही आकाश है।
- चरण 6: अंत में नीचे अपने चित्र का नाम लिख दीजिए — जैसे “बादल का भालू”।
यह गतिविधि क्यों दी गई है: बादल हर बार नया आकार बनाते हैं। कभी वे हाथी जैसे लगते हैं, कभी नाव जैसे। यह अभ्यास हमें ध्यान से देखना सिखाता है — कि साधारण चीज़ में भी आकार छिपे होते हैं, बस देखने वाली आँख चाहिए। यही आँख चाचा अरूप के पास भी थी, तभी तो उन्होंने बील, पक्षी और हाथियों के झुंड का इतना सुंदर वर्णन लिखा।
आगे कीजिए: किसी शाम छत पर लेटकर बादल देखिए और जो आकार दिखें उन्हें कॉपी में उतार लीजिए। दो-चार दिन में आपकी अपनी ‘बादल-चित्रों’ की एक छोटी पुस्तिका बन जाएगी।