मल्हार अध्याय 1 सोच-विचार के लिए

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कविता को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए। 1. कोयल कहाँ रहती है?
उत्तर

कोयल आम के घने बगीचों यानी अमराइयों में रहती है।

कविता की पंक्ति है — “अमराइयाँ घनी हैं, कोयल पुकारती है।” ‘अमराई’ का अर्थ है आम के पेड़ों का झुरमुट। घने पेड़ों में कोयल को छाया भी मिलती है, आम के बौर और फल भी, और छिपने की जगह भी — इसीलिए वह वहीं रहना पसंद करती है।

जानने योग्य: कोयल अपना घोंसला नहीं बनाती। वह कौए के घोंसले में अंडे रख देती है और कौआ ही उन्हें सेता है।
प्र2.
तन-मन कौन सँवारती है?
उत्तर

मलय पवन तन-मन सँवारती है।

पंक्ति है — “बहती मलय पवन है, तन-मन सँवारती है।” मलय पवन वह हवा है जो दक्षिणी भारत के मलय पर्वत से चलती है। वहाँ चंदन के वन हैं, इसलिए यह हवा ठंडी भी होती है और सुगंधित भी। ऐसी हवा शरीर की थकान मिटा देती है (तन सँवारना) और मन को ताज़गी तथा प्रसन्नता से भर देती है (मन सँवारना)।

प्र3.
झरने कहाँ से झरते हैं?
उत्तर

झरने भारत की पहाड़ियों से झरते हैं।

कवि कहता है — “झरने अनेक झरते जिसकी पहाड़ियों में।” यहाँ ‘जिसकी’ शब्द मातृभूमि यानी भारत के लिए आया है। पहाड़ों पर जमी बर्फ़ पिघलकर और वर्षा का पानी ऊँचाई से नीचे गिरकर अनेक झरने बनाता है, और वही आगे चलकर नदियों का रूप ले लेता है।

प्र4.
श्रीकृष्ण ने क्या सुनाया था?
उत्तर

श्रीकृष्ण ने वंशी (बाँसुरी) की मधुर धुन और पवित्र गीता का उपदेश सुनाया था।

पंक्ति है — “श्रीकृष्ण ने सुनाई, वंशी पुनीत गीता।” ‘पुनीत’ का अर्थ है पवित्र। महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन का मन डगमगा गया था, तब श्रीकृष्ण ने उसे कर्म और कर्तव्य का जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता कहलाया।

दो चीज़ें एक पंक्ति में: बाँसुरी कान को मीठी लगती है और गीता मन को दिशा देती है। कवि दोनों को एक साथ रखकर बताता है कि इस भूमि पर कला भी जन्मी और ज्ञान भी।
प्र5.
गौतम ने किसका यश बढ़ाया?
उत्तर

गौतम बुद्ध ने अपनी मातृभूमि भारत का यश बढ़ाया।

पंक्तियाँ हैं — “गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया, जग को दया सिखाई, जग को दिया दिखाया।” यहाँ ‘जिसका’ भारत के लिए आया है। बुद्ध ने संसार को दया और अहिंसा का पाठ पढ़ाया तथा ज्ञान का दीपक दिखाया। उनके कारण सारी दुनिया भारत को आदर से देखने लगी — इसी को कवि ‘सुयश बढ़ाना’ कहता है।

प्र6.
“नदियाँ लहर रही हैं / पग पग छहर रही हैं” — ‘लहर’ का अर्थ होता है— पानी का हिलोरा, मौज, उमंग, वेग, जोश। ‘छहर’ का अर्थ होता है— बिखरना, छितराना, छिटकना, फैलना। कविता पढ़कर पता लगाइए और लिखिए— कहाँ-कहाँ छटा छहर रही हैं?
उत्तर

छटा भारत के कोने-कोने में, पग-पग पर छहर रही है।

पंक्तियाँ हैं — “जगमग छटा निराली, पग पग छहर रही हैं।” ‘पग-पग’ का अर्थ है ‘हर कदम पर’। यानी भारत में जहाँ भी पैर रखिए, वहीं कोई-न-कोई सुंदर दृश्य बिखरा मिलेगा। कविता में ये स्थान गिनाए गए हैं—

  • हिमालय की ऊँची चोटियों पर, जो आकाश को छूती हैं;
  • चरणों में झूमते सिंधु यानी समुद्र के किनारे;
  • गंगा, यमुना और त्रिवेणी संगम के तटों पर;
  • पहाड़ियों में, जहाँ अनेक झरने झरते हैं;
  • झाड़ियों में, जहाँ चिड़ियाँ मस्त होकर चहक रही हैं;
  • घनी अमराइयों में, जहाँ कोयल पुकारती है।
भाषा की बात: ‘छहर’ शब्द का अर्थ है बिखरना या फैलना। सुंदरता को यहाँ पानी की तरह बहता और बिखरता हुआ दिखाया गया है — यही इस शब्द का कमाल है।
प्र7.
किसका पानी लहर रहा है?
उत्तर

गंगा, यमुना और त्रिवेणी — इन नदियों का पानी लहर रहा है।

पंक्तियाँ हैं — “गंगा यमुन त्रिवेणी, नदियाँ लहर रही हैं।” ‘लहर’ का अर्थ है पानी का हिलोरा लेना, मौज में बहना। इसी के साथ कविता के आरंभ में सिंधु यानी समुद्र भी हिमालय के चरणों में झूमता हुआ दिखाया गया है — “नीचे चरण तले झुक, नित सिंधु झूमता है।”

‘लहर’ के दो अर्थ: यह शब्द पानी की तरंग के लिए भी आता है और मन की उमंग के लिए भी। यहाँ दोनों अर्थ साथ चलते हैं — नदियाँ पानी की लहरों में भी हैं और अपनी मौज में भी।
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