मल्हार अध्याय 1 मातृभूमि के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
मातृभूमि सोहनलाल द्विवेदी की देशभक्ति की कविता है। इसमें कवि भारत को अपनी माँ मानकर उसके प्राकृतिक सौंदर्य और गौरवशाली इतिहास का गान करता है। कविता का पहला चित्र प्रकृति का है — ऊँचा हिमालय आकाश चूमता है, चरणों में सिंधु (समुद्र) झूमता है, गंगा-यमुना-त्रिवेणी लहरती हैं, पहाड़ियों से झरने झरते हैं, अमराइयों में कोयल पुकारती है और मलय पवन तन-मन सँवारती है। दूसरा चित्र महापुरुषों का है — इसी भूमि पर रघुपति राम और सीता ने जन्म लिया, श्रीकृष्ण ने वंशी और पवित्र गीता सुनाई, और गौतम बुद्ध ने जग को दया सिखाई। कविता की टेक है — “वह जन्मभूमि मेरी, वह मातृभूमि मेरी।” यह हर छंद के बाद लौटती है और भारत को पुण्य-भूमि, स्वर्ण-भूमि, धर्मभूमि, कर्मभूमि, युद्ध-भूमि और बुद्ध-भूमि कहकर पुकारती है। काव्य-सौंदर्य में मानवीकरण (हिमालय चूमता है, सिंधु झूमता है), अनुप्रास (“पग पग छहर”, “झरने अनेक झरते”) और पुनरुक्
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- कविता की रचना
- मिलान
- अनुमान या कल्पना से
- शब्दों के रूप
- थोड़ा भिन्न, थोड़ा समान
- आपकी बात
- वंशी-से
- आज की पहेली
- झरोखे से
- साझी समझ
- खोजबीन के लिए
- पढ़ने के लिए