प्र1.
पढ़ने के लिए — ‘पुष्प की अभिलाषा’ (माखनलाल चतुर्वेदी): “चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ, / चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ, / चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि डाला जाऊँ, / चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ, / मुझे तोड़ देना वनमाली! / उस पथ में देना तुम फेंक। / मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने, / जिस पथ जावें वीर अनेक।” — इस कविता को पढ़िए और इसका भाव समझिए।
उत्तर
भावार्थ: इस कविता में एक फूल स्वयं बोल रहा है। वह कहता है कि मुझे कोई बड़ी जगह नहीं चाहिए —
- मैं देवकन्या के गहनों में गूँथा जाना नहीं चाहता;
- मैं प्रेमी की माला में पिरोकर किसी को ललचाना नहीं चाहता;
- मैं राजाओं के शव पर चढ़ाया जाना भी नहीं चाहता;
- और मैं देवताओं के सिर पर चढ़कर अपने भाग्य पर इतराना भी नहीं चाहता।
उसकी एक ही इच्छा है — “मुझे तोड़ देना वनमाली! उस पथ में देना तुम फेंक।” यानी हे माली, मुझे तोड़कर उस रास्ते पर फेंक देना जिस रास्ते से वे वीर गुज़रते हैं जो मातृभूमि पर अपना सिर चढ़ाने, यानी प्राण न्योछावर करने जा रहे हैं। फूल चाहता है कि उन वीरों के चरणों की धूल उस पर पड़े — यही उसके जीवन की सबसे बड़ी सफलता होगी।
मुख्य भाव: देश पर मर मिटने वालों का सम्मान संसार के सारे सुखों, सारे वैभव और स्वर्ग से भी बड़ा है। एक छोटा-सा फूल भी यदि देशभक्तों के काम आ जाए तो उसका जन्म सार्थक हो जाता है।
काव्य-सौंदर्य:
- मानवीकरण — फूल मनुष्य की तरह बोल रहा है और अपनी इच्छा बता रहा है।
- ‘चाह नहीं’ की चार बार आवृत्ति — पहले चार बार ‘नहीं’ कहकर कवि पाँचवीं पंक्ति में जो ‘हाँ’ कहता है, वह और भी ज़ोरदार हो जाता है।
- ‘शीश चढ़ाना’ — यह मुहावरा है, जिसका अर्थ है प्राणों का बलिदान कर देना।
‘मातृभूमि’ से संबंध: दोनों कविताओं में मातृभूमि सबसे ऊपर है। सोहनलाल द्विवेदी उसे “युद्ध-भूमि” और “बुद्ध-भूमि” कहकर उसका गौरव गाते हैं; माखनलाल चतुर्वेदी उसी भूमि पर मर मिटने वालों के मार्ग की धूल बनना चाहते हैं।