मल्हार अध्याय 2 गोल के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
गोल मेजर ध्यानचंद का लिखा हुआ संस्मरण है, यानी अपने जीवन की सच्ची यादों का लेखा। यह उनकी आत्मकथा ‘गोल’ का एक अंश है और पूरा पाठ ‘मैं’ शैली में यानी स्वयं खिलाड़ी की ज़बानी कहा गया है। पहली घटना (सन् 1933): पंजाब रेजिमेंट और ‘सैंपर्स एंड माइनर्स टीम’ के मुक़ाबले में एक विरोधी खिलाड़ी ने गुस्से में ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक दे मारी। पट्टी बाँधकर लौटे ध्यानचंद ने उसकी पीठ थपथपाकर कहा — “इसका बदला मैं ज़रूर लूँगा”, और फिर एक के बाद एक छह गोल कर दिए। यही उनका ‘बदला’ था। जीवन-परिचय: जन्म सन् 1905 में प्रयाग में, बाद में परिवार झाँसी आ बसा। 16 साल की उम्र में ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में साधारण सिपाही बने। सूबेदार मेजर तिवारी के बार-बार कहने पर हॉकी खेलना शुरू किया — तब तक वे एक नौसिखिया खिलाड़ी थे। बर्लिन ओलंपिक, 1936: लांस नायक ध्यानचंद को भारतीय हॉकी टीम का कप्तान बनाया गया। उनका खेल देख
अभ्यास
- मेरी समझ से
- मिलकर करें मिलान
- पंक्तियों पर चर्चा
- सोच-विचार के लिए
- संस्मरण की रचना
- शब्दों के जोड़े, विभिन्न प्रकार के
- बात पर बल देना
- आपकी बात
- समाचार-पत्र से
- डायरी का प्रारंभ
- आज की पहेली
- झरोखे से
- साझी समझ
- खोजबीन के लिए
- पढ़ने के लिए