कथा-सार: कई साल पहले ओलंपिक खेलों के दौरान सौ मीटर की एक विशेष दौड़ हुई। आरंभिक रेखा पर नौ प्रतिभागी खड़े थे और सभी को कोई-न-कोई शारीरिक विकलांगता थी। सीटी बजी और सब दौड़ पड़े। तभी एक छोटा लड़का ठोकर खाकर लड़खड़ाया, गिरा और रो पड़ा। उसकी पुकार सुनकर बाकी सब प्रतिभागी दौड़ना छोड़कर लौट आए। उन्होंने उसे दोबारा खड़ा किया, उसके आँसू पोंछे और धूल साफ़ की। फिर सबने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और साथ मिलकर दौड़ लगाई — और सब के सब एक साथ अंतिम रेखा तक पहुँच गए। दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए। अब सवाल यह था कि किसी एक को स्वर्ण पदक कैसे दिया जाए? निर्णायकों ने बढ़िया हल निकाला — सबको स्वर्ण पदक दिया गया। उस दिन तालियाँ थमने का नाम ही नहीं ले रही थीं।
मुख्य भाव: जीत से भी बड़ी कोई चीज़ होती है — मनुष्यता और मित्रता। नौ बच्चों में से हर एक जीत सकता था, पर उन्होंने अकेले जीतने के बजाय साथ चलना चुना। जिस दौड़ में कोई पीछे न छूटे, वही सबसे सुंदर दौड़ है।
| इस रचना की खास बात | कहानी में कहाँ | वह क्या कहती है |
|---|---|---|
| पहली पंक्ति में ही जिज्ञासा | “एक आश्चर्यजनक घटना हुई” | पाठक आगे पढ़ने के लिए बँध जाता है। |
| मोड़ (टर्निंग पॉइंट) | “सब के सब लौट आए।” | यहीं से दौड़ प्रतियोगिता न रहकर मित्रता की कहानी बन जाती है। |
| छोटा-सा दृश्य, बड़ी बात | “उसके आँसू पोंछे, धूल साफ़ की।” | बड़ी-बड़ी बातें कहे बिना, केवल दो काम दिखाकर पूरी करुणा सामने रख दी गई। |
| निर्णायकों की सूझ | “सबको स्वर्ण पदक देकर समस्या का बढ़िया हल ढूँढ़ निकाला।” | नियम भी तब बदले जा सकते हैं जब सामने कोई इससे बड़ी बात हो। |