मल्हार अध्याय 3 पहली बूँद के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-05

इस अध्याय के बारे में

पहली बूँद गोपालकृष्ण कौल की लिखी एक प्रकृति-कविता है। इसमें पावस (वर्षा ऋतु) के पहले ही दिन धरती पर गिरी पहली बूँद और उससे जागे नए जीवन का चित्र है। हर छंद के अंत में एक ही टेक लौटती है — “पहली बूँद धरा पर आई।” पहला छंद: पावस का प्रथम दिवस है, पहली बूँद धरती पर गिरती है और उसी क्षण धरती से अंकुर फूट पड़ता है — मानो नया जीवन अँगड़ाई ले रहा हो। दूसरा छंद: धरती के “सूखे अधरों” पर बूँद अमृत-सी आकर गिरती है। हरी दूब वसुंधरा की रोमावलि (शरीर के रोएँ) जैसी लगती है, जो पुलककर मुसकरा उठती है — यानी धरती रोमांचित हो गई है। तीसरा छंद: बादल “आसमान में उड़ता सागर” हैं, बिजलियाँ उनके स्वर्णिम पंख हैं और मेघ-गर्जना नगाड़ों की ध्वनि है, जो धरती की तरुणाई यानी जवानी-हरियाली को जगा रही है। चौथा छंद: नीला आकाश किसी की नीली आँखों -सा है और काले बादल उन आँखों की काली पुतलियाँ । करुणा से पिघलकर वे आँसू (वर्षा)

  1. मेरी समझ से
  2. मिलकर करें मिलान
  3. पंक्तियों पर चर्चा
  4. सोच-विचार के लिए
  5. कविता की रचना
  6. शब्द एक अर्थ अनेक
  7. अनेक शब्दों के लिए एक शब्द
  8. शब्द पहेली
  9. आपकी बात
  10. समाचार माध्यमों से
  11. सृजन
  12. इन्हें भी जानें
  13. खोजबीन
  14. आइए इंद्रधनुष बनाएँ
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