प्र1.
कविता को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए— बारिश की पहली बूँद से धरती का हर्ष कैसे प्रकट होता है?
उत्तर
पहली बूँद गिरते ही धरती का हर्ष चार तरह से प्रकट होता है, और कवि ने चारों को मनुष्य के हाव-भाव की तरह दिखाया है —
| कविता की पंक्ति | धरती का हर्ष किस रूप में दिखा |
|---|---|
| “अंकुर फूट पड़ा धरती से, नव-जीवन की ले अँगड़ाई।” | धरती नींद से जाग जाती है। जैसे सोया आदमी उठते ही अँगड़ाई लेता है, वैसे ही धरती के भीतर का जीवन अंकुर बनकर बाहर निकल आता है। |
| “धरती के सूखे अधरों पर, गिरी बूँद अमृत-सी आकर।” | प्यास से सूखे होंठों पर पानी की बूँद पड़ने जैसा सुख। बूँद को ‘अमृत-सी’ कहा गया है, यानी वह केवल पानी नहीं, जीवन देने वाली चीज़ है। |
| “वसुंधरा की रोमावलि-सी, हरी दूब पुलकी-मुसकाई।” | यह सबसे सीधा प्रमाण है। हरी दूब धरती के रोएँ हैं — वे पुलक उठे यानी ख़ुशी से रोमांचित हो गए, और धरती मुसकरा पड़ी। |
| “बूढ़ी धरती शस्य-श्यामला बनने को फिर से ललचाई।” | बूढ़ी और थकी धरती में फिर से नई उमंग जाग जाती है — वह दोबारा फ़सलों से लहलहाने के लिए ललच उठती है। |
ध्यान देने की बात: कवि कहीं भी सीधे यह नहीं कहता कि “धरती ख़ुश हो गई।” वह ख़ुशी के लक्षण दिखाता है — अँगड़ाई, रोमांच, मुसकान, ललक। इसी को मानवीकरण कहते हैं, और यही इस कविता की जान है।