प्र1.
कविता में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार कक्षा में अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए— “आसमान में उड़ता सागर, लगा बिजलियों के स्वर्णिम पर, बजा नगाड़े जगा रहे हैं, बादल धरती की तरुणाई।”
उत्तर
पहले सीधा-सादा अर्थ (भावार्थ): समुद्र का जल भाप बनकर ऊपर उठ गया है और बादल के रूप में आकाश में तैर रहा है — कवि को लगता है मानो पूरा सागर ही आकाश में उड़ रहा हो। उसने उड़ने के लिए बिजली की चमक के सुनहरे पंख लगा रखे हैं। बादल गरजते हुए ऐसे चल रहे हैं जैसे नगाड़े बजा रहे हों, और उस नाद से वे सोई हुई धरती की तरुणाई यानी जवानी-हरियाली को जगा रहे हैं।
| कविता का शब्द | वास्तव में क्या | कवि ने क्या बना दिया | अलंकार |
|---|---|---|---|
| उड़ता सागर | बादल | बादल पर सीधे सागर का नाम रख दिया — ‘सागर के समान’ नहीं कहा, ‘सागर ही है’ कहा | रूपक |
| बिजलियों के स्वर्णिम पर | बिजली की सुनहरी चमक | चमक को उड़ने वाले सुनहरे पंख बना दिया | रूपक |
| बजा नगाड़े | मेघ-गर्जना | गड़गड़ाहट को नगाड़े की थाप बना दिया | रूपक |
| जगा रहे हैं बादल | वर्षा से हरियाली लौटना | बादल जगाने वाले और धरती सोई हुई युवती | मानवीकरण |
चर्चा में यह बात ज़रूर उठाइए: ये पंक्तियाँ केवल आँख से नहीं, कान से भी दिखाई देती हैं। ‘उड़ता सागर’ और ‘स्वर्णिम पर’ हमें दृश्य देते हैं — नीला-काला विस्तार और सुनहरी लकीर। ‘बजा नगाड़े’ हमें ध्वनि देता है। यही मिलकर वर्षा के आगमन को एक उत्सव जैसा बना देते हैं — जैसे कहीं मेला लगने वाला हो और उसकी सूचना नगाड़ा पीटकर दी जा रही हो।
अपने शब्दों में कहने का एक ढंग: “मुझे लगता है कवि बादलों के आने को किसी बारात या जुलूस की तरह देख रहा है — आगे-आगे नगाड़े बज रहे हैं, ऊपर सुनहरी बिजली चमक रही है, और यह पूरा जुलूस धरती को नींद से जगाने आ रहा है।”