प्र1.
नाम देना भी सृजन है। ऊपर दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए और इसे एक नाम दीजिए।
उत्तर
पहले चित्र को ठीक से देख लीजिए। पुस्तक के पृष्ठ 30 पर जो चित्र छपा है, उसमें दूर तक फैली सूखी रेत है, पीछे बंजर-भूरी पहाड़ियाँ हैं और बीचोंबीच रेत से निकला एक हरा पौधा खड़ा है, जिस पर एक लंबी डंडी पर सफ़ेद फूल खिले हैं। आसपास छोटे-छोटे हरे अंकुर भी बिखरे दिख रहे हैं।
नाम देने से पहले तीन प्रश्न पूछिए:
- चित्र में सबसे पहले आँख कहाँ जाती है? — रेत के बीच खड़े हरे पौधे और उसके सफ़ेद फूल पर।
- चित्र में सबसे बड़ा विरोध क्या है? — चारों ओर सूखा-बंजर, और ठीक बीच में हरा-भरा जीवन।
- यह चित्र कौन-सा भाव जगाता है? — आश्चर्य और आशा। जहाँ कुछ न उगने की उम्मीद हो, वहाँ भी जीवन रास्ता खोज लेता है।
अब जो नाम इन तीनों को एक साथ पकड़ ले, वही सबसे अच्छा नाम है।
| संभावित नाम | यह नाम क्या पकड़ता है |
|---|---|
| रेत में मुसकान | सूखे और जीवन का विरोध, और वह भी कोमल शब्द में — कविता की “हरी दूब पुलकी-मुसकाई” की याद दिलाता है। |
| बंजर में जीवन | सीधा, स्पष्ट और चित्र का मुख्य भाव। |
| एक बूँद का चमत्कार | पाठ से जोड़ता है — शायद यहाँ भी किसी एक बूँद ने ही यह हरियाली जगाई हो। |
| हार नहीं मानी | पौधे के साहस को मनुष्य के गुण की तरह दिखाता है। |
| रेगिस्तान का फूल | छोटा, याद रह जाने वाला और चित्र का ठीक-ठीक वर्णन। |
नमूना उत्तर: मैं इस चित्र को नाम दूँगा — “रेत में मुसकान”। कारण यह कि पूरे चित्र में जहाँ तक नज़र जाती है, केवल सूखी रेत और नंगी पहाड़ियाँ हैं। ऐसी जगह पर एक नन्हे पौधे का हरा होकर सफ़ेद फूल खिला देना ऐसा ही है जैसे उदास चेहरे पर अचानक मुसकान आ जाए। यह चित्र बताता है कि परिस्थिति कितनी भी कठिन हो, जीवन अपना रास्ता बना ही लेता है।
नाम देना सृजन क्यों है: नाम देते समय आप चित्र की सैकड़ों चीज़ों में से चुनते हैं कि सबसे ज़रूरी क्या है। यही चुनाव कला है। इसीलिए “एक पौधा” जैसा नाम कमज़ोर है — वह केवल बताता है; जबकि “रेत में मुसकान” कुछ महसूस कराता है।