प्र1.
“मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है।” “मैंने तो अपना बदला ले लिया है।” इन दोनों वाक्यों में क्या अंतर है? ध्यान दीजिए और बताइए। सही पहचाना! दूसरे वाक्य में एक शब्द कम है। उस एक शब्द के न होने से वाक्य के अर्थ में भी थोड़ा अंतर आ गया है। हम अपनी बात पर बल देने के लिए कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे— ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ आदि। पाठ में से इन शब्दों वाले वाक्यों को चुनकर लिखिए। ध्यान दीजिए कि यदि उन वाक्यों में ये शब्द न होते तो उनके अर्थ पर इसका क्या प्रभाव पड़ता।
उत्तर
पहले दोनों वाक्यों का अंतर: पहले वाक्य में ‘ही’ है। उससे अर्थ बनता है — “बदला मैं ले चुका हूँ, अब कुछ बाक़ी नहीं; तुम्हें डरने की ज़रूरत नहीं।” दूसरे वाक्य में केवल सूचना है — “मैंने बदला ले लिया है।” यानी ‘ही’ बात को पक्का और अंतिम बना देता है।
ऐसे शब्दों को व्याकरण में निपात कहते हैं। ये अपने आप में कोई अर्थ नहीं रखते, पर जिस शब्द के बाद लग जाएँ, उस पर ज़ोर डाल देते हैं। पाठ में से चुने हुए वाक्य—
| पाठ का वाक्य | बल देने वाला शब्द | वह क्या जोड़ता है | यह शब्द हटा दें तो |
|---|---|---|---|
| “खेल में तो यह सब चलता ही है।” | तो, ही | यह बात सामान्य है, इसमें नई या चौंकाने वाली कोई बात नहीं। | “खेल में यह सब चलता है।” — केवल सूचना रह जाती, वह ‘आम बात है’ वाला भाव चला जाता। |
| “जिन दिनों हम खेला करते थे, उन दिनों भी यह सब चलता था।” | भी | आज तो होता ही है, तब भी होता था — बात दोनों समयों पर लागू है। | “उन दिनों यह सब चलता था।” — आज से जोड़ने वाला पुल टूट जाता। |
| “मेरे इतना कहते ही वह खिलाड़ी घबरा गया।” | ही | तुरंत, उसी क्षण। | “मेरे इतना कहने पर वह घबरा गया।” — तेज़ी और तुरंतपन खत्म हो जाता। |
| “अब हर समय मुझे ही देखता रहता…” | ही | केवल मुझे, और किसी को नहीं — उसका पूरा ध्यान बँट गया। | “अब हर समय मुझे देखता रहता।” — ‘केवल’ वाला भाव और उसका डर हल्का पड़ जाता। |
| “मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है।” | तो, ही | जहाँ तक मेरी बात है — मेरा काम पूरा हो चुका। | “मैंने अपना बदला ले लिया है।” — बात सपाट हो जाती, उसमें छिपा मज़ाक और आश्वासन न रहता। |
| “…शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।” | ही | केवल दो — छह नहीं। तुम्हारे गुस्से ने ही तुम्हें ज़्यादा हराया। | “दो गोल से हराता।” — ‘केवल दो’ वाली चुटकी खत्म हो जाती। |
| “मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं।” | तो | विनम्रता — जो सब समझते हैं, वैसा कोई जादू मेरे पास नहीं है। | “मेरे पास कोई गुरु-मंत्र नहीं है।” — विनम्रता और अपनापन कम हो जाता। |
| “लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।” | ही | यही तीन, इनके सिवा कुछ नहीं। | “…सबसे बड़े मंत्र हैं।” — बात कही तो जाती, पर उसमें दावे का ज़ोर न रहता। |
| “आज मैं जहाँ भी जाता हूँ बच्चे व बूढ़े मुझे घेर लेते हैं।” | भी | हर जगह, चाहे कहीं भी जाऊँ। | “जहाँ जाता हूँ…” — ‘हर जगह’ वाला विस्तार सिमट जाता। |
| “इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था।” | ही | केवल मैं — इसी भ्रम को लेखक हटाना चाहता है। | “…सारे गोल मैं करता था।” — पूरा वाक्य ही उलटा अर्थ देने लगता। |
| “जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई।” | भी | निखार के साथ-साथ एक और चीज़ — तरक्की — भी जुड़ती गई। | “…तरक्की मिलती गई।” — दोनों बातों का साथ-साथ बढ़ना उतना स्पष्ट न होता। |
| “…उसके साथ भी बुराई की जाएगी।” | भी | जैसा उसने किया, वैसा उसके साथ भी — बात लौटकर उसी पर आती है। | “उसके साथ बुराई की जाएगी।” — ‘जैसा किया वैसा भरा’ वाला भाव मिट जाता। |
निष्कर्ष: ‘ही’ प्रायः सीमा बाँधता है (केवल यही), ‘भी’ जोड़ता है (यह भी, वह भी) और ‘तो’ बात को अलग करके सामने रखता है (जहाँ तक इसकी बात है)। छोटे-से शब्द, पर वाक्य का पूरा भाव बदल देते हैं।
करके देखिए: एक वाक्य लीजिए — “राम आया।” अब लिखिए — “राम ही आया।” (और कोई नहीं), “राम भी आया।” (दूसरों के साथ), “राम तो आया।” (कम-से-कम राम आ गया, बाकी का पता नहीं)। एक ही वाक्य के तीन अर्थ!